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कब तक चलेगी दागियों की राजनीति

Posted On: 9 Jan, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Shiv Kumar Rayउत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह जैसे लोगों को पार्टी और मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाकर मुख्यमंत्री मायावती ने अपने तेवर के मुताबिक ही काम किया था, लेकिन बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल कराकर भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव के पहले ही अपनी छवि पर बड़ा दाग जरूर लगा लिया। अब भले ही चारों तरफ से आलोचना झेलने और अपनी ही पार्टी में विरोध के स्वर उठने के बाद भाजपा ने बाबू सिंह कुशवाहा की सदस्यता स्थगित कर दी हो, लेकिन पार्टी के लिए इस नुकसान की भरपाई करना इतना आसान नहीं होगा। बता दें कि बाबू सिंह कुशवाहा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले के आरोपी हैं। पिछले दिनों सीबीआइ ने उनके कई ठिकानों पर छापा भी मारा। पिछले लोकसभा चुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे ये साफ बताते हैं कि जनता अब जागरूक हो रही है और राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को भले ही दाग अच्छे लगते हों, लेकिन जनता को साफ-सुथरी छवि के उम्मीदवार ही ज्यादा पसंद हैं।


राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम घोटाले में तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा पर गंभीर आरोप हैं। नवंबर 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद जब सीबीआइ ने अपनी जांच शुरू की तो उसने लगभग दस हजार करोड़ रुपये के एनआरएचएम के बजट में हुए घोटाले में बाबू सिंह कुशवाहा की भूमिका को प्रमुख माना। ऐसा माना जा रहा है कि इस बड़े बजट से लगभग दो हजार करोड़ रुपये का गोलमाल किया गया है। कुछ वक्त पहले खुद भाजपा के नेता किरीट सोमैया ने बाबू सिंह कुशवाहा के एनआरएचएम घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री मायावती पर हमला बोला था। भाजपा में शामिल दूसरे दागी पूर्व मंत्री बादशाह सिंह को लोकायुक्त की सिफारिश पर श्रम मंत्री के पद से मुख्यमंत्री मायावती ने हटाया गया था। शुरुआती जांच में बादशाह सिंह पर भी भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोप सही पाए गए थे। बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह को पार्टी से निकालकर जहां बहुजन समाज पार्टी चुनाव से पहले दाग-धब्बों को साफ करने में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ दागी नेताओं को पार्टी में शामिल कराना भाजपा के लिए गले की फांस बन गया है। इससे पहले भी भाजपा ने माया मंत्रिमंडल से निकाले गए अवधेश कुमार वर्मा और दद्दन मिश्र को पार्टी में शामिल कराकर विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार घोषित कर दिया। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में दागी नेताओं को पार्टी में शामिल करने पर मचा बवाल अभी थमा नहीं है।


पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज और मुख्तार अब्बास नकवी जैसे कई नेता पार्टी के इस फैसले पर नाराज हैं। प्रदेश के गोरखपुर संसदीय सीट से सांसद योगी आदित्यनाथ ने भी इस मसले को लेकर पार्टी आलाकमान को साफ चेतावनी दे दी थी। इस फैसले के बाद आदित्यनाथ ने खुद के राजनीति में बने रहने के फैसले पर सवाल उठाए थे। यह बात अलग है कि भाजपा के महासचिव विनय कटियार अब बाबू सिंह कुशवाहा और बादशाह सिंह की वकालत करते नजर आ रहे थे। कटियार का कहना था कि कुशवाहा और बादशाह दोनों पर कोई दोष या मुकदमा नहीं है और इन सभी मामलों में खुद मायावती जिम्मेवार हैं। विनय कटियार चाहे जो भी कहें, लेकिन इतना तय है कि अपने इस फैसले से भाजपा खुद सवालों के घेरे में हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव में बसपा की स्थिति चाहे मजबूत हो या कमजोर, लेकिन भ्रष्टाचार या दूसरे आपराधिक मामलों में संतरी हो या मंत्री, मायावती ने सभी लोगों पर बेझिझक कार्रवाई करके अपनी छवि साफ-सुथरा बनाने के साथ ही प्रदेश की जनता को यह संदेश तो दे ही दिया है कि पार्टी में कोई भी फैसला लेने से पहले उन्हें किसी को भरोसे में लेने की जरूरत नहीं है और न ही उनके फैसलों पर पार्टी में कोई सवाल उठाने की हैसियत रखता है। बसपा के लोगों का यह मानना है कि राज्य में कानून व्यवस्था को लेकर उनकी पार्टी पर जनता भरोसा करती है। बसपा पर जनता का भरोसा तो चुनाव नतीजों के बाद पता चलेगा, लेकिन इतना तय है कि प्रदेश की राजनीति में हर राजनीतिक दल चुनाव के मैदान में अपनी छवि को साफ-सुथरा दिखाने में जुटा है और यही वजह है कि बाहुबली नेता डीपी यादव को लेकर समाजवादी पार्टी में भी तकरार साफ दिखाई दी।


बसपा से नाता तोड़ चुके बाहुबली विधायक डीपी यादव को लेकर समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव का साफ कहना है कि वह डीपी यादव जैसे लोगों को पार्टी में शामिल नहीं होने देंगे। समाजवादी पार्टी के शासन के समय भले ही कानून व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हों, लेकिन अब पार्टी के युवा नेता अखिलेश यादव ने साफ कह दिया है कि कानून व्यवस्था के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ नहीं किया जाएगा और जो भी कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करेगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बसपा से बाहर निकाले गए लोगों को भाजपा में शामिल करने के फैसले पर जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष शरद यादव ने भी ऐतराज जताया है और उनका कहना है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक भ्रष्ट राजनेता को भाजपा में जगह दी गई। शरद यादव का कहना है कि दागी राजनेताओं को उत्तर प्रदेश चुनाव में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। कुल मिलाकर दागी राजनेताओं के मसले पर बसपा और सपा फूंक-फूंककर कदम रख रही है, लेकिन ऐसे में भाजपा का यह फैसला चौंकाने वाला है। दागी नेताओं को पार्टी में शामिल करने के फैसले से भाजपा को कितना नुकसान होता है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि दागी और बाहुबली नेताओं को राजनीतिक दल में शामिल करने से क्या लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर नहीं होगी? राजनीति के बदलते दौर में जब बाहुबलियों और दागी नेताओं को जनता ने सबक सिखाना शुरू कर दिया है तो क्या ऐसे कदम किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती साबित नहीं होंगे?


सवाल चुनावी नफे नुकसान का ही नहीं, देश की राजनीतिक शुचिता का भी है। लेकिन कांग्रेस हो या भाजपा या फिर कोई दूसरा राजनीतिक दल, अक्सर यह देखने में आता है कि लोकसभा या विधानसभा चुनावों के सीटों की गणित में दागी और बाहुबलियों की मदद ले ही लेते हैं और इसके बाद कई बार यह कुतर्क भी सुनने को मिलता है कि हम ऐसे लोगों को सुधरने का एक मौका दे रहे हैं। कानून की वजह से अगर ऐसे दागी और बाहुबली नेताओं को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पाता है तो अक्सर राजनीतिक पार्टियां उनकी पत्नियों या फिर दूसरे नजदीकी रिश्तेदारों को उम्मीदवार बना देती हैं। वैसे इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता ही कहा जाएगा कि पिछले कुछ चुनावों में जनता ने बाहुबलियों और दागी नेताओं को सबक सिखाना शुरू कर दिया है। इसके पीछे एक बड़ी वजह देश में निर्वाचन आयोग जैसी संस्था का पारदर्शी और मजबूत होना भी है। चाहे फर्जी मतदान पर रोक की बात हो या फिर जनता का मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का मसला हो, ऐसे सभी काम आज निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता की वजह से ही संभव हो सके हैं। कई चरणों में विधानसभा और लोकसभा चुनाव कराने के फैसले से इन चुनावों में सुरक्षा-व्यवस्था भी चाक-चौबंद रहती है। इन सुधारों के बावजूद निर्वाचन आयोग जैसी संस्था को अभी और भी ज्यादा प्रभावी और सशक्त बनाने की जरूरत है। इन सुधारों के बाद ही देश की आम जनता लोकसभा या राज्य की विधानसभाओं में अपनी नुमाइंदगी करने वाले सही व्यक्ति का चुनाव कर सकेगी।


लेखक डॉ. शिव कुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं


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