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भयावह भ्रष्टाचार का उपचार

Posted On: 2 Jun, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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Gurcharan Das  भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आर्थिक, प्रशासनिक और न्यायिक सुधारों पर जोर दे रहे हैं गुरचरण दास


आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की गिरफ्तारी से यह फिर से स्मरण हो जाता है कि भारत में भ्रष्टाचार जिंदा है और फल-फूल रहा है। सीबीआइ के अधिवक्ता के अनुसार, जगन चार साल की छोटी-सी अवधि में ही धन कुबेर हो गए। उन्होंने अपने पिता राजशेखर रेड्डी के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए अपनी कंपनियों में काले कारनामे करने वाले लोगों को धन निवेश करने को मजबूर किया। कुछ साल पहले कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कैबिनेट मंत्री, ताकतवर राजनेता, मुख्यमंत्री के बेटे, वरिष्ठ अधिकारी और कंपनियों के सीइओ भ्रष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खा रहे होंगे। भारत में भ्रष्टाचार कोई नई चीज नहीं है। नया यह है कि हम किस प्रकार इससे निपट रहे हैं। सीबीआइ बेहद प्रभावशाली लोगों की गिरफ्तारी से भी नहीं डर रही है। इस बदलाव का क्या कारण है? मेरे विचार में यह बदलाव अधीर और आत्मविश्वास से भरपूर मध्यम वर्ग की प्रतिक्रिया, सुप्रीम कोर्ट व कैग की सक्रियता और इनका समर्थन करने वाले मीडिया के कारण आया है। नजरिये में इस बदलाव का उद्घोष अन्ना हजारे के आंदोलन में भी हुआ था।


हालांकि एक भी आरोपी को अब तक सजा नहीं मिल पाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में जीत तब तक नहीं मिलेगी जब तक आरोपियों के खिलाफ तेजी से अदालती कार्यवाही नहीं चलेगी और दोषी पाए जाने वाले को सजा नहीं मिलेगी। इस बीच लोकपाल बिल फिर से ठंडे बस्ते में चला गया है और अन्ना हजारे ने हुंकार भरी है कि वह एक और अनशन करेंगे। उनके आंदोलन में खामी यह है कि उन्होंने सारे अंडे एक ही टोकरी में रख लिए हैं। इसलिए उनकी सफलता का पैमाना लोकपाल बिल के पारित होने या न होने पर निर्भर करता है, किंतु भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अनेक कदम उठाने की आवश्यकता है। इनमें प्रशासनिक, न्यायपालिका और पुलिस सुधारों की आवश्यकता है। यही नहीं, अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के मूल कारण पर भी शांत हैं। भ्रष्टाचार अधिकारियों और राजनेताओं को अत्यधिक अधिसत्ता सौंपने का नतीजा है। इसके कारण उद्यमियों और राजनेताओं में एक अलग तरह के पूंजीवाद की संस्कृति विकसित हो रही है। जगन मोहन रेड्डी मामले की जड़ में भी यही संस्कृति है। भ्रष्टाचार का जवाब है आर्थिक सुधार। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण से राजनेताओं और अधिकारियों के हाथ से निकलकर फैसले लेने की शक्ति बाजार को मिल जाती है।


उद्यमियों के बीच प्रतिस्पर्धा ही यह तय करती है कि किस चीज का उत्पादन किया जाए, किसके द्वारा किया जाए, किस कीमत पर किया जाए और इसकी क्या गुणवत्ता हो। भारत में भ्रष्टाचार का बोलबाला इसलिए है, क्योंकि यहां आर्थिक सुधार अधूरे हैं। भ्रष्टाचार उन्हीं क्षेत्रों में फैला है जिनमें सरकार सुधार लागू नहीं कर पाई है, जैसे खनन, रियल एस्टेट, शिक्षा, ढांचागत सुविधाओं का निर्माण और सरकारी खरीद। उदाहरण के लिए पिछले कुछ सालों में दो मुख्यमंत्री-मधु कोड़ा और बीएस येद्दयुरप्पा खनन घोटाले में जेल जा चुके हैं। दूसरी तरफ जिन क्षेत्रों में सरकार सुधार लागू कर चुकी है उनमें भ्रष्टाचार बहुत कम हो गया है। 1991 में आर्थिक सुधार शुरू होने से पहले भारत में अब से भी अधिक भ्रष्टाचार था। सरकार का अर्थव्यवस्था में अधिक हस्तक्षेप था और यहां लाइसेंस राज का शासन चलता था। उन दिनों भ्रष्टाचार इसलिए अधिक बढ़ गया था कि सरकारी अधिकारी के हस्ताक्षर कराना एक बड़ा भारी काम माना जाता था। उन दिनों कोई भी काम शुरू करने से पहले लाइसेंस, परमिट और कोटा हासिल करने के लिए इस प्रकार के दर्जनों कागजों की आवश्यकता पड़ती थी। इस भ्रष्टाचार को सूटकेस भ्रष्टाचार भी कहा जाता था, क्योंकि घूस की रकम सूटकेस में रखकर ले जाई जाती थी। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए 1966 में सरकार ने संथानम कमेटी का गठन किया। उच्च पदों पर भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकपाल का विचार संथानम कमेटी की ही देन थी। विडंबना यह है कि स्पष्ट तौर पर टीम अन्ना ने यह रिपोर्ट नहीं पढ़ी है और इसीलिए वह भ्रष्टाचार की जड़ तक नहीं पहुंची है। न ही यह रपट हमारे राजनेताओं ने पढ़ी है। यहां तक कि सुधारवादियों ने भी बाजार प्रतिस्पर्धा और मुक्त उद्यमिता के समर्थन में जनमत जुटाने का प्रयास किया है। इसलिए जब भी कुछ गड़बड़ होती है तो लोग तुरंत अधिकारियों को और अधिक अधिसत्ता देने की वकालत करने लगते हैं। दो साल पहले एक जनमत संग्रह में आठ प्रमुख शहरों के 83.4 फीसदी लोगों ने कहा था कि उदारीकरण के बाद भ्रष्टाचार बढ़ा है। इससे यही सिद्ध होता है कि लोग अब भी भ्रष्टाचार और सुधार के अभाव में सहसंबंध स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। टेलीकॉम में सबसे बड़ा घोटाला कैसे हुआ? यह वह क्षेत्र है जिसमें संभवत: सुधारों की सबसे सफल गाथा लिखी गई है।


पूरी दुनिया में भारत में मोबाइल की दरें सबसे कम हैं और ग्राहकों की संख्या के मामले में इसका विश्व में दूसरा स्थान है। इस सफलता के पीछे बाजार प्रतिस्पर्धा का हाथ है। तब 2जी घोटाले की व्याख्या कैसे की जा सकती है? जिस एक चीज पर बाजार का नियंत्रण नहीं था, वह था रेडियो स्पेक्ट्रम। यह घोटाला टाला जा सकता था अगर लाइसेंस खुली, पारदर्शी निविदा प्रक्रिया के तहत दिए जाते। बहुत से अर्थशास्त्री भ्रष्टाचार का संबंध व्यापार करने की आर्थिक स्वतंत्रता से जोड़ते हैं, जहां जनता और व्यवसाय राजनेताओं व नौकरशाहों की दया पर निर्भर नहीं करते। इस स्वतंत्रता का आकलन हेरिटेज फाउंडेशन करती है, जबकि भ्रष्टाचार सूचकांक का आकलन ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल करती है। 2010 में विश्व के सबसे कम भ्रष्ट देश व्यापारिक स्वतंत्रता के संबंध में भी शीर्ष दस में शामिल थे। इनमें न्यूजीलैंड, सिंगापुर, डेनमार्क, कनाडा, स्वीडन, फिनलैंड और आइसलैंड शामिल हैं। हमें भ्रष्टाचार के सही कारणों को समझ कर सुधारों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए आर्थिक सुधारों के अलावा जांच एजेंसियों को स्वायत्त बनाने के लिए पुलिस सुधार, जल्द न्याय दिलाने के लिए न्यायिक सुधार और सुशासन लाने के लिए प्रशासनिक सुधारों की भी आवश्यकता है। और अंत में, अपराधियों के राजनीति में प्रवेश पर रोक लगाने के लिए राजनीतिक सुधारों की सख्त आवश्यकता है।


कब लौटेगा काला धन

लेखक गुरचरण दास प्रख्यात स्तंभकार हैं


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