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प्लेनेट एक्स का रहस्य

Posted On: 19 Jun, 2012 Others में

जागरण मेहमान कोनाविभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों व विद्वानों के विचारों को उद्घाटित करता ब्लॉग

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क्या सौरमंडल के छोर पर कोई ऐसा ग्रह छुपा हुआ है, जिसका आकार पृथ्वी से चार गुना बड़ा है। एक ब्राजीली खगोल वैज्ञानिक का दावा है कि यह ग्रह वही रहस्यमय प्लेनेट-एक्स है, जिसके अस्तित्व के बारे में एक दशक से अटकलें लगाई जा रही हैं। लेकिन अभी तक उसकी उपस्थिति का कोई प्रमाण नहीं मिला है। रिओ दि जनैरो स्थित ब्राजीली वेधशाला के खगोल वैज्ञानिक रोडनी गोम्स का कहना है कि हमारे सौरमंडल में सबसे दूरवर्ती ग्रह नेपच्यून के आगे काइपर बेल्ट में छोटे-छोटे बर्फीले पिंडों की अनियमित कक्षाओं को देखकर लगता है कि कोई बड़ा ग्रह सूरज के चक्कर काट रहा है। काइपर बेल्ट में मौजूद पिंड सौरमंडल की उत्पत्ति के समय के अवशेष माने जाते हैं। गोम्स ने इस बेल्ट में 92 खगोलीय पिंडों की कक्षाओं की नापजोख करने के बाद पाया कि कम से कम छह पिंड ऐसे हैं, जो अपनी निर्धारित कक्षाओं से भटके हुए हैं। गोम्स ने पिछले दिनों अमेरिकी एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की बैठक को बताया कि इन पिंडों की अनियमित कक्षा का कारण यह है कि कोई बड़ा ग्रह इन्हें अपनी ओर खींच रहा है। उसके गुरुत्वाकर्षण की वजह से ही ये पिंड अनियमित कक्षाओं में विचरण कर रहे हैं, उनका अनुमान है कि यह ग्रह आकार में लगभग नेपच्यून के बराबर है।


पृथ्वी से इसकी दूरी 225 अरब किलोमीटर हो सकती है। दूरी बहुत अधिक होने के कारण इसे पृथ्वी से देख पाना मुश्किल है। ठोस सबूतों के अभाव में गोम्स की बातों पर यकीन नहीं किया जा सकता, लेकिन कुछ खगोल वैज्ञानिकों ने उनके गणित की सराहना की है। हमारे सौरमंडल के सातवें ग्रह, यूरेनस की खोज 1781 में हुई थी और आठवां ग्रह, नेपच्यून 1846 में खोजा गया था। नेपच्यून की खोज के बाद बहुत से खगोल वैज्ञानिक यह सोचने लगे कि कहीं इसकी कक्षा के आगे कोई और ग्रह तो नहीं है। 19वीं सदी के मध्य में इस ग्रह की तलाश शुरू हो गई। एक और ग्रह की मौजूदगी की संभावना से प्रेरित होकर अमेरिकी खगोल वैज्ञानिक पर्सिवल लोवेल ने 1906 में नए ग्रह की तलाश शुरू कर दी। उन्होंने ही सबसे पहले प्लेनेट एक्स की अवधारणा रखी। उनके मुताबिक गैस प्रधान विशाल ग्रहों, खासकर यूरेनस और नेपच्यून की कक्षाओं में गड़बड़ी एक विशाल अदृश्य ग्रह के गुरुत्वाकर्षण की वजह से हो रही होगी। 1930 में नौवें ग्रह प्लूटो की खोज के बाद सबने यह मान लिया कि प्लेनेट एक्स की तलाश का काम पूरा हो चुका है। 1978 में वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि प्लूटो इतना छोटा है कि उसके गुरुत्वाकर्षण का आसपास के बड़े ग्रहों पर कोई असर नहीं पड़ता। इसके बाद दसवें ग्रह की खोज शुरू हो गई।


नब्बे के दशक में वोएजर अंतरिक्ष यान द्वारा की गई जांच से पता चला कि यूरेनस की कक्षा में देखी गई अनियमितताओं का कारण कुछ और है। दरअसल नेपच्यून के द्रव्यमान को ज्यादा आंकने से यह गड़बड़ी हुई। इस नई जानकारी के बाद दसवें ग्रह की खोज बंद कर दी गई। 1992 में प्लूटो जैसे अनेक बर्फीले पिंडों की खोज के बाद इस पर बहस छिड़ गई कि क्या प्लूटो को ग्रह माना जाए या उसे क्षुद्रग्रहों की श्रेणी में रखा जाए। इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन ने 2006 में प्लूटो से ग्रह का दर्जा भी छीन लिया। इस तरह प्लेनेट एक्स ने खगोल वैज्ञानिकों की जिज्ञासा को बरकरार रखा। पृथ्वी पर प्रलय की भविष्यवाणी से लोगों को भयभीत करने के लिए कुछ शरारती तत्व भी प्लेनेट एक्स का नाम लेते हैं। ये तत्व अक्सर यह प्रचार करते रहे हैं कि यह ग्रह पृथ्वी से टकराकर बड़ी तबाही मचाएगा। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय की आम राय यह है कि प्लेनेट एक्स का कोई अस्तित्व नहीं है। हालांकि कुछ खगोल वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि हमारी पर्यवेक्षण क्षमता अभी इतनी शक्तिशाली नहीं है कि हम काइपर बेल्ट के आगे की वस्तुएं ठीक से देख सकें। अत: वहां बड़े ग्रहों की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता।


लेखक मुकुल व्यास स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं


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