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कांग्रेस के अलगाववादी टोटके

Posted On: 4 Nov, 2011 Others में

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Hriday Narayan Dixitमुस्लिम आरक्षण की पहल को सांप्रदायिक राजनीति की पराकाष्ठा मान रहे है हृदयनारायण दीक्षित


गरीबी और अमीरी पथनिरपेक्ष वास्तविकताएं हैं। राष्ट्रीय विकास दर मजहब या धर्म आधारित नहीं होती, प्रतिव्यक्ति आय भी नहीं। अर्थशास्त्र का कोई भी सिद्धात धर्म, मत, मजहब को मान्यता नहीं देता, लेकिन अर्थशास्त्री प्रधानमत्री मनमोहन सिह की सरकार मजहब आधारित आरक्षण की तैयारी में है। कानून मत्री सलमान खुर्शीद ने बताया है कि केंद्र सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल करने की कोशिश कर रहा है और इस मामले को सोनिया गाधी और प्रधानमत्री खुद देख रहे हैं। खुर्शीद ने केंद्रीय सेवाओं में मुसलमानों को छह प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा भी की है। कानून मत्री के इस बयान से ‘सांप्रदायिक वोट बैंक’ की राजनीति में भूचाल है। मुलायम सिह ने सच्चर कमेटी और रंगनाथ आयोग के बहाने काग्रेस को धोखेबाज बताया है। वह मुसलमानों के साथ हो रही कथित नाइंसाफी के खिलाफ मैदान में हैं। बसपा प्रमुख प्रधानमत्री को चिट्ठी लिखकर मुस्लिम आरक्षण माग चुकी हैं। उत्तार प्रदेश सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनाव निकट हैं। मुस्लिम वोट बैंक हथियाने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। भ्रष्टाचार के अखिल भारतीय मुद्दे से पीड़ित काग्रेस ने जनता का ध्यान हटाने व मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने के लिए ‘मजहबी आरक्षण का जिन्न’ जगाया है।


संप्रग अपनी अलोकप्रियता से भयभीत है। दूरसचार घोटाले की सुई घूम-फिरकर प्रधानमत्री कार्यालय तक पहुंच रही है। सोनिया काग्रेस मुस्लिम लीग होने की जल्दबाजी में है। उसने जवाहरलाल नेहरू की काग्रेस से भी नाता तोड़ लिया है। अल्पसख्यक आरक्षण पर सविधान सभा की बहस में प. नेहरू ने कहा था, ‘सभी वर्ग अपनी-अपनी विचार प्रणाली अपनाकर समूह बना सकते हैं, लेकिन मजहब आधारित अल्पसख्यक-बहुसख्यक वर्गीकरण नहीं किया जा सकता।’ उन्होंने कहा था कि हम न केवल उस बात का परित्याग करने जा रहे हैं जो बुरी है, बल्कि हम इसे सदा के लिए समाप्त कर अपनी पूरी शक्ति के साथ यह दृढ़निश्चय कर रहे हैं। प. नेहरू ने मजहबी आरक्षण की बात को सदा के लिए पूरी शक्ति और दृढ़निश्चय के साथ खत्म किया था। प. नेहरू के बाद बोले तजम्मुल हुसैन [बिहार] ने कहा-‘स्थान-रक्षण की व्यवस्था किसी के लिए भी नहीं होनी चाहिए।’


सोनिया काग्रेस राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा पर है। प. नेहरू ने मजहबी आरक्षण की जिस कल्पना को दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ ‘सदा के लिए’ दफनाया था, उन्हीं की पौत्र-वधू सोनिया गाधी ने उसे फिर कुरेद दिया है। सच्चर कमेटी बनाने के उद्ेदश्य राजनीतिक थे। इसकी रिपोर्ट भयावह थी। मसलन मुसलमान हीनभाव में रहते हैं, हरेक दाढ़ी वाले को आइएसआइ एजेंट माना जाता है। मुसलमानों को सरकारी और गैरसरकारी सस्थाओं में ‘सदेह’ के साथ देखा जाता है। पुलिस-प्रशासन, लोक सेवा आयोग, अस्पतालों और स्कूलों में उनके साथ भेदभाव होता है आदि। यहा एक काल्पनिक मनोविज्ञान है और भारतीय राष्ट्र-राज्य पर अपमानजनक आरोप हैं। कमेटी ने अनुसूचित जातियों-जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी आपत्तिकी। सिफारिश की गई थी कि कम मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र भी अनारक्षित किए जाने चाहिए। कथित हीनभाव, प्रशासनिक और गैर-मुस्लिमों द्वारा किए जा रहे कल्पित भेदभाव के विरुद्ध ही सोनिया की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने विवादास्पद ‘सांप्रदायिक हिंसा लक्षित’ विधेयक बनाया है। सच्चर रिपोर्ट ऐसी ही वोट बैंक राजनीति का मसौदा थी।


सविधान की उद्देश्यिका में हरेक व्यक्ति के लिए ‘आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक न्याय’ की प्रतिभूति है। भारतीय राष्ट्र पथनिरपेक्ष है, लेकिन केंद्र ने 2008-09 में पहली दफा बजट को भी ‘सांप्रदायिक’ बनाया। मुस्लिम आबादी वाले 90 जिलों और 338 नगरों/कस्बों के लिए 3780 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा हुई। केंद्रीय वित्तामत्री ने मदरसा शिक्षा के लिए 80 करोड़ व राष्ट्रीय अल्पसख्यक वित्ता विकास निगम के लिए 75 करोड़ रुपये के साथ सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के लिए 1000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया। जनवरी 2008 में ही आर्थिक मामलों की मत्रिमंडलीय समिति ने अल्पसख्यक संप्रदाय के छात्रों के लिए 1868 करोड़ रुपये की घोषणा की। केंद्र ने समूचे मुस्लिम संप्रदाय को अतिगरीब, अतिपिछड़ा मान लिया है। बेशक मुसलमानों का बड़ा वर्ग अभावग्रस्त है, लेकिन हिंदुओं, सिखों और अन्य समुदायों में भी भयकर गरीबी है। राष्ट्रीय विकास के लाभ का समान वितरण न होने से देश की 75-80 प्रतिशत जनता अभावग्रस्त है। गरीबी और पिछड़ापन राष्ट्रीय समस्या है। मुसलमानों का पिछड़ापन राष्ट्र से भिन्न समस्या नहीं है। सच तो यह है कि वे ‘विशेष राजनीतिक संप्रदाय’ के रूप में ही ‘वोट बैंक’ माने जा रहे हैं।


‘मुस्लिम आरक्षण’ वोट बैंकवादी राजनीति का हथियार है। यहा मूलभूत प्रश्न है कि क्या ऐसा आरक्षण सांप्रदायिक राजनीति की अंतिम इच्छा है। इसके बाद गरीबी, सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों पर सांप्रदायिक उन्मादी राजनीति नहीं होगी। डॉ. अंबेडकर ने लिखा था, ‘1938 में जिन्ना ने 14 मागें रखीं। यह नई सूची देखकर भी नहीं कहा जा सकता कि उनकी मागों का अंत क्या होगा? एक साल के भीतर ही 1939 में उन्होंने हर चीज में 50 फीसदी हिस्सा फिर से मागा।’ मुस्लिम लीग अंग्रेजों से जितना मागती थी वे उससे ज्यादा देते थे। आधुनिक सांप्रदायिक राजनीति भी अंग्रेजी रास्ते पर है। मुसलमान बुनियादी सुविधाएं मागते हैं, सरकार मदरसा अनुदान देती है। वे रोजगार और मूलभूत अवसर मागते हैं, लेकिन सरकार राष्ट्रतोड़क सांप्रदायिक हिंसा विधेयक लाती है। वे भारत का विकास चाहते हैं, भाईचारे के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, सरकार उन्हें अलगाववादी आरक्षण देने को तैयार है। वोट बैंकवादी दल ही उनकी तरफ से नई मागें रखते हैं, फिर इन्हीं मागों की पूर्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। मुसलमान उनके लिए वोट बैंक हैं। चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री हैं। उनका वोट इस तरह के अलगाववादी टोटकों से ही लिया जाता है।


देश की सबसे बड़ी समस्या यहा की ‘सांप्रदायिक वोट बैंक राजनीति’ है। दुनिया के किसी भी देश की राजनीति सांप्रदायिक अलगाववाद नहीं बढ़ाती। भारत की राजनीति ही क्षेत्रवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिकता की पोषक है। देश के हरेक गरीब, पिछड़े, अनुसूचित को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय दीजिए। मुसलमान इसी देश के अभिन्न परिजन हैं, उन्हें अलग ‘विशेष राजनीतिक प्राणि समूह’ न मानिए। उन्हें अलग से चिह्नित करना उनका और राष्ट्र का अपमान है।


लेखक हृदयनारायण दीक्षित उत्तर प्रदेश विधानपरिषद के सदस्य हैं


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