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टीम अन्ना को सही जवाब

Posted On: 18 Apr, 2012 Others में

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Nripendra Misraभ्रष्टाचार और काले धन से निपटने के अधूरे एजेंडे को पूरा करना टीम अन्ना को सही जवाब मान रहे हैं नृपेंद्र मिश्रा


भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और विदेश से काला धन वापस लाने के मुद्दे पर गत वर्ष बाबा रामदेव और टीम अन्ना के जोरदार प्रदर्शन और रामदेव के खिलाफ की गई पुलिस कार्रवाई से हमें अनेक सबक मिलते हैं। भ्रष्टाचार के कैंसर से निपटने और काला धन देश में वापस लाने के लिए गंभीरता और कार्रवाई, दोनों की जरूरत है। इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान केंद्र सरकार ने सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की चुनौती से निपटने के लिए कुछ उपाय किए हैं। फिर भी आम धारणा है कि सरकार भ्रष्टाचार से निपटने में अक्षम है और इस वजह से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।


दिसंबर 2010 में संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पांच सूत्रीय एजेंडे की घोषणा की थी, जिसमें भ्रष्टाचार के मामलों को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में निपटाना भी शामिल था। इसके अलावा सरकारी खरीद में पूर्ण पारदर्शिता लाने को भी रेखांकित किया गया था। साथ ही भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने वाले को पूरी सुरक्षा प्रदान करना, तमाम कांग्रेसी मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों से विवेकाधीन कोटा वापस लेना, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए एक खुली व प्रतिस्प‌र्द्धी व्यवस्था कायम करना और उच्च पदों पर विराजमान तमाम कांग्रेसियों को तड़क-भड़क से दूर रहते हुए सादा जीवन बिताने को एजेंडे में स्थान दिया गया था। इस एजेंडे के क्रियान्वयन की समीक्षा की जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए केंद्र सरकार को अभी बहुत कुछ करना बाकी है। भ्रष्टाचार के मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था अभी शुरू ही नहीं की गई है। यहां तक कि आपराधिक मामले के आरोपी जनप्रतिनिधियों के मामलों को एक निश्चित समयसीमा में निपटाने की योजना भी धराशायी हो गई। इसके अलावा चुनाव सुधार की मांग लंबे समय से लंबित है, खासतौर से अपराधियों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने की मांग। इस मुद्दे पर भी सरकार निष्कि्रय है।


यह कैसी अन्नागीरी


सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने की दिशा में मंत्रिमंडल सक्रिय है, किंतु नए पब्लिक प्रोक्योरमेंट कानून को सरकार में शामिल निहित स्वार्थो के जोरदार विरोध का सामना करना पड़ेगा। विवेकाधिकार शक्तियां हटाने की दिशा में कुछ प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन ये हर स्तर और हर जगह लागू नहीं किए गए हैं। इस संबंध में जो थोड़ी-बहुत प्रगति हुई भी है, वह जनता तक नहीं पहुंची है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की खुली और प्रतिस्पर्धी व्यवस्था भी अभी परीक्षण के स्तर तक ही पहुंच पाई है। चावला कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है, किंतु यह एक जटिल मुद्दा है और इस पर अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए समय और विशेषज्ञता की आवश्यकता है। इसी प्रकार तड़क-भड़क से दूर रहना और सादा जीवन बिताने के दिशा-निर्देश भी धूल फांक रहे हैं। पिछले साल बाबा रामदेव के बाद टीम अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन चला। एक बार फिर कानून एवं व्यवस्था और सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियों के घालमेल से सरकार भ्रमित हो गई। इससे पहले कि अन्ना मजबूत लोकपाल के लिए अपना अनशन शुरू कर पाते, सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया। गिरफ्तारी के बाद भारी जनविरोध के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। रामलीला मैदान में टीम अन्ना की मांगों के समर्थन में एक लाख से ऊपर की भीड़ जुटी।


संसद में टीम अन्ना की लोकपाल की मांग पर पूरे दिन बहस चली और किसी तरह एक प्रस्ताव पारित कर सरकार ने अपनी जान बचाई। अन्ना के अनशन से उत्साहित टीम अन्ना ने मान लिया कि अब वह देश के राजनीतिक चेहरे को भी बदल सकती है। उनका पहला प्रयोग हिसार में हुआ। यहां भी प्रभावी लोकपाल लाने के प्रयास में कानून एवं व्यवस्था की चुनौती का सामाजिक-राजनीतिक चुनौती के साथ घालमेल कर दिया गया। अंतत: लोकपाल बिल लोकसभा में पारित हो गया और अब राज्यसभा में लंबित है। संभवत: वर्तमान स्वरूप में यह पारित न हो सके। यह समझ से परे है कि जिस मसले को आसानी से हल किया जा सकता है, उसे राजनीतिक प्रयासों से कैसे उलझाया जा सकता है। लोकपाल और लोकायुक्त संस्थानों को व्यापक अधिकारों के साथ गठित करने की आवश्यकता नहीं है। हमें भारत के संघीय चरित्र का भी मान रखना है, खासतौर पर तब जबकि राज्यों में पहले ही लोकायुक्त का प्रावधान है और अब महज उनकी शक्तियों में बढ़ोतरी की जरूरत है। लोकपाल को शिकायत निवारण के नागरिक अधिकार कानून के साथ मिलाने की आवश्यकता नहीं है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक सार्वजनिक सेवा को समयबद्ध सारणी में बांधना है। बहुत से राज्यों ने खुद का सिटिजन चार्टर पहले ही बना लिया है। हद से हद, केंद्र सरकार एक मॉडल लोकायुक्त का प्रारूप तैयार कर सकती है, जिसे राज्य स्वीकार करें। दरअसल, टीम अन्ना के सुझाए बहुत से उपायों का राज्यों की स्वीकार्यता या फिर प्रशासनिक व वित्तीय व्यावहारिकता और प्रभावी क्रियान्वयन के संबंध में उचित परीक्षण नहीं हुआ है। पिछले माह टीम अन्ना के कुछ सदस्यों ने सांसदों के बारे में अशोभनीय टिप्पणियां की हैं। असल में यह जरूरी नहीं है कि किसी समूह की टिप्पणियों का संसद संज्ञान ले ही।


अन्ना आंदोलन का एक वर्ष


संसद की शुचिता और श्रेष्ठता कायम रखने के लिए सदस्य इसी प्रकार का कानून बना सकते हैं, जैसा राष्ट्रीय झंडे आदि की अवमानना की स्थिति में लागू होता है। टीम अन्ना की टिप्पणियों पर बहस करके हमारी संसद ने सामाजिक कार्यकर्ता के एक समूह को अनावश्यक मान्यता दी है, जिससे उन्हें राजनीतिक लाभ ही मिला है। जो व्यक्ति या संस्थाएं संसदीय संस्थानों को कमजोर करते हैं वे नि:संदेह लोकतंत्र पर हमला करते हैं, किंतु लोकतंत्र के चक्के को चलाने वाले संस्थानों को अधिक जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। टीम अन्ना को असल जवाब यही हो सकता है कि सरकार उसकी मुख्य मांगों पर जल्द से जल्द उचित फैसला ले। सरकार को इस संबंध में विधि आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग आदि के उपयोगी सुझावों पर अमल करते हुए लोकपाल के वर्तमान मसौदे में ही सुधार करना चाहिए। संसद में न्यायपालिका, चुनाव, खाद्य सुरक्षा, शिकायत निवारण,लोकपाल और लोकायुक्त जैसे अनेक महत्वपूर्ण लंबित बिलों को देखते हुए सरकार को जल्द से जल्द उचित कदम उठाकर इनका निपटारा करना चाहिए अन्यथा फिर से लोगों का गुस्सा उबल सकता है। संसद समय की कमी में लोकपाल बिल को अधिक समय तक लंबित नहीं रख सकती। आखिर यह पुरानी मान्यता भी है-आलोचकों को शांत करने के लिए शब्द के बजाय कार्रवाई प्रभावी उपाय है।


लेखक नृपेंद्र मिश्रा ट्राई के पूर्व चेयरमैन हैं


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