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मजहबी आरक्षण की आग

Posted On: 6 Dec, 2011 Others में

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मुस्लिम आरक्षण की फिर से तेज हुई पैरवी से विघटनकारी शक्तियों को प्रोत्साहन मिलता देख रहे हैं बलबीर पुंज


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के सिर पर आते ही मुस्लिम मतों में सेंधमारी के पैंतरे शुरू हो गए हैं। बसपा ने प्रधानमत्री को पत्र लिखकर मुसलमानों के लिए आरक्षण व्यवस्था करने की माग करते हुए जरूरत पड़ने पर सविधान सशोधन करने की सलाह दी। पत्र के जवाब में प्रधानमत्री ने लिख भेजा कि उत्तर प्रदेश चाहे तो आध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल की तर्ज पर मुसलमानों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है। इसके लिए सविधान में सशोधन करने की आवश्यकता भी नहीं है। बसपा से बाजी मारने की फिराक में काग्रेस ने मुसलमानों को पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित 27 प्रतिशत कोटे में से छह प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है, वहीं अन्य अल्पसख्यकों के लिए मात्र 2.4 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित किया गया है। मुस्लिमों के लिए अलग से आरक्षण का प्रश्न लबे समय से प्राय: हर चुनाव में सेक्युलर दलों का ऐसा झुनझुना रहा है जो मुस्लिम समुदाय को भी लुभाता रहा है, किंतु क्या मजहब के आधार पर आरक्षण सवैधानिक मूल्यों व उन प्रतिबद्धताओं के साथ दगाबाजी नहीं है, जिसे दलितों, पिछड़ों व वचितों के उत्थान के लिए तय किया गया था?


आध्र प्रदेश मजहब के आधार पर मुसलमानों के लिए आरक्षण करने वाला पहला राज्य है। सन 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मजहब विशेष के लिए रोजगार आरक्षित करने के मद्रास सरकार के निर्णय को निरस्त करते हुए उसे ‘साप्रदायिक निर्णय’ बताया था। सन 2004 में तत्कालीन राजशेखर रेड्डी सरकार ने विभाजित भारत के इतिहास में मजहब के आधार पर आरक्षण का एक नया अध्याय जोड़ा। केंद्र में प्रारंभिक 45 वर्ष और आध्र प्रदेश में 35 वषरें तक कथित पथनिरपेक्षी काग्रेस पार्टी का अबाधित शासन रहा था। अल्पसख्यकों की हितैषी होने का दावा करने वाली काग्रेस के राज में मुसलमानों की स्थिति मे कोई बदलाव क्यों नहीं आया? यह काग्रेस की विफलता रही या फिर मुसलमानों ने पिछड़ेपन का आवरण ओढ़ रखा है? भारतीय सविधान का अनुच्छेद 14 सबको समान अवसर देने का वचन देता है तो अनुच्छेद 15[1] के द्वारा यह विश्वास दिलाया गया है कि जाति, धर्म, सस्कृति या लिग के आधार पर राज्य किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा। मुसलमानों को बहुसख्यकों के बराबर स्वतत्रता और रोजगार का अधिकार प्राप्त है। प्रश्न उन बुनियादी समस्याओं के निराकरण का है, जिन्हे मुस्लिम समुदाय के कठमुल्ले मजहब की आड़ में पोषित करते हैं। बुर्का प्रथा, बहुविवाह, मदरसा शिक्षा, जनसख्या अनियत्रण जैसी समस्याओं को दूर किए बगैर मुसलमानों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने की कवायद वस्तुत: एक छलावा मात्र है, किंतु यक्ष प्रश्न यह भी है कि मुसलमानों को यह छलावा समझ में क्यों नहीं आता? इसमें उनका क्या हित है?


मुस्लिमों को नौकरी में आरक्षण देने वालों का तर्क है कि उनकी आबादी [13.5 प्रतिशत] की तुलना में आइएएस जैसे उच्च प्रशासनिक पदों पर उनकी भागीदारी चार प्रतिशत से भी कम है। उनका कुतर्क है कि ऐसा उनके साथ भेदभाव किए जाने के कारण हुआ है। भारतीय प्रशासनिक सेवा में नौकरी पाने के लिए स्नातक होना अनिवार्य है, जबकि स्वय रंगनाथ मिश्रा आयोग की रपट में स्नातक मुस्लिमों का अनुपात केवल 3.6 बताया गया है। इस प्रतियोगी युग में मदरसों के अरबी-फारसी इल्म को ही यथेष्ट माना जाए तो सरकारी नौकरियों में भेदभाव की शिकायत भी नहीं होनी चाहिए। हिंदू और मुसलमानों की साक्षरता दर के साथ जनसख्या वृद्धि दर की तुलना करें तो मुसलमानों के पिछड़ेपन का भेद खुल जाता है। केरल की औसत साक्षरता दर 90.9 है। मुस्लिम साक्षरता दर 89.4 प्रतिशत होने के बावजूद मुस्लिम जनसख्या की वृद्धि दर 36 प्रतिशत है, जबकि हिंदुओं में यह दर 20 प्रतिशत है। महाराष्ट्र में मुस्लिम साक्षरता दर 78 प्रतिशत होने के साथ ही जनसख्या वृद्धि दर हिंदुओं की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है। छत्तीसगढ़ में साक्षरता 82.5 प्रतिशत तो जनसख्या दर हिंदुओं की तुलना में 37 प्रतिशत अधिक है। ससाधन सीमित हों और खाने वालों की सख्या बढ़ती जाए तो कैसी स्थिति होगी? इसकी कीमत वास्तविक पिछड़ा वर्ग क्यों चुकाए?


मुस्लिमों के लिए आरक्षण वस्तुत: उस मर्ज का इलाज ही नहीं है, जिससे मुस्लिम समुदाय ग्रस्त है। विडंबना यह है कि सेक्युलर दल अवसरवादी राजनीति के कारण उस मानसिकता को स्वीकारना नहीं चाहते। क्या मुसलमानों को आरक्षण देने से पूरे समुदाय की मूलभूत समस्याएं खत्म हो जाएंगी? मुसलमानों का एक बड़ा भाग गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ेपन और गदगी मे गुजर-बसर करने को अभिशप्त है। मुस्लिम नेता अपने समुदाय के लोगों को जनसख्या नियत्रण के तरीके अपनाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। वे अपनी बढ़ी आबादी के बूते सियासी दलों के साथ ‘ब्लैकमेलिग’ की स्थिति में हैं। वस्तुत: मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग अनियत्रित आबादी के बूते भारत में इस्लामी साम्राज्य कायम करने का सपना सजोए बैठे हैं। क्या कारण है कि इस देश में जहा कहीं भी मुसलमान अल्पसख्यक हैं, वे कानून एवं व्यवस्था और सविधान के साथ प्रतिबद्ध होने का दावा करते हैं; किंतु जहा कहीं भी वे बहुसख्या में आते हैं, शरीयत ही उनके लिए सविधान बन जाता है?


यहा इतिहास का एक दौर याद आ रहा है। अंतिम निजाम मीर उस्मान अली खा 1911 में गद्दी पर बैठा। सन 1932 तक सर्वे सेटलमेंट डिपार्टमेंट मराठी भाषा में काम करता था। गद्दी पर आते ही मीर उस्मान ने अपने को दूसरा औरंगजेब कहना शुरू कर दिया और हिंदुओं को नौकरी से निकालना प्रारंभ कर दिया। मराठी, तेलगू और कन्नड़ भाषा को हटाकर उर्दू चलाने के लिए सख्त कानून बनाए। हिंदू मदिरों का निर्माण तो दूर, उनके पुनरुद्धार पर भी रोक लगा दी गई। 1922 में जब तुर्किस्तान में कमाल-अता-तुर्क ने मुस्लिम खलीफाओं की गद्दी खत्म कर दी, तब हैदराबाद के इस निजाम ने सारी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा बनने का सपना देखा और लिखा-सारे मुस्लिम शासक नजरों से ओझल हो जाने के बाद ऐ उस्मान! मुसलमानों को अब तुमसे ही उम्मीद है। परेशानी यही है कि काग्रेस खुद को मुसलमानों का एकमात्र हितैषी मानती है और यह मानकर बैठी है कि मुसलमान भी उसी के सहारे सुरक्षित हैं। वस्तुत: मुस्लिम समाज का सबसे अधिक बेड़ा गर्क काग्रेस की तुष्टीकरण की नीति से हुआ है और इससे देश में विभाजनकारी शक्तियों को प्रोत्साहन मिला है। मजहब के आधार पर आरक्षण उसी खतरे को निमत्रण देना है।


लेखक बलबीर पुंज राज्यसभा के सदस्य हैं


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