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आम आदमी और उद्यमी

Posted On: 24 Jan, 2012 Others में

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Bharat Jhunjhunwalaआर्थिक सुधारों का चरित्र जनविरोधी होने के कारण कांग्रेस के सहयोगी दलों को इनका विरोध करते देख रहे हैं डॉ. भरत झुनझुनवाला


उद्यमियों की शिकायत है कि केंद्र सरकार को लकवा-सा मार गया है। ठोस कदम उठाने में सरकार नाकाम है। कांग्रेस के पास किसी भी सदन में कोई कानून पारित करने की अपनी संख्या नहीं है। सरकार सपा, बसपा, तृणमूल तथा द्रमुक पर निर्भर है। इन सहयोगियों से समर्थन न मिलने के कारण सरकार आगे नहीं बढ़ पा रही है।


विचारणीय विषय है कि सहयोगी पार्टियां सरकार को नए कानून लाने में समर्थन क्यों नहीं दे रही हैं? कारण दिखता है कि सरकार द्वारा प्रस्तावित सुधार मुख्यत: जनविरोधी हैं। गांधी परिवार की चकाचौंध की आड़ में कांग्रेस इन जनविरोधी कानूनों को लागू करने की हिम्मत फिर भी कर सकती है, परंतु सहयोगी पार्टियों के लिए यह कठिन है। अत: सहयोगी पार्टियां पीछे हट रही हैं और सरकार लकवाग्रस्त है।


सरकार द्वारा विदेशी निवेश को खोलने की पहल की गई थी। तृणमूल कांग्रेस के विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा। तृणमूल ने इस नीति का विरोध किया, चूंकि ममता बनर्जी के आकलन में यह जनविरोधी थी। सही है कि रिटेल में विदेशी कंपनियों के प्रवेश से विदेशी माल कुछ सस्ता उपलब्ध हो जाएगा, परंतु विदेशी माल की खरीद शहरी मध्य वर्ग के लोग अधिक करते हैं, गरीब और ग्रामीण कम। कहा जा रहा है कि विदेशी निवेश से किसानों के लिए नया बाजार खुल जाएगा। यह लाभ कितना होगा इसका कोई ब्यौरा सरकार ने जनता के सामने प्रस्तुत नहीं किया। यह लाभ भी उन चुनिंदा किसानों को मिलेगा जो बड़ी कंपनियों से अनुबंध करने में सक्षम होंगे। इसके विपरीत विदेशी निवेश से नुक्कड़ की दुकान, ढुलाई, मंडी आदि में लगे तमाम लोगों का रोजगार छिन जाएगा।


दूसरी नीति भूमि अधिग्रहण की है। सही है कि वर्तमान कानून की तुलना में प्रस्तावित कानून अच्छा है, परंतु इसमें कई गंभीर खामियां हैं विशेषकर यह कि निजी उद्यमियों द्वारा किसानों की जमीन जबरन छीनी जा सकती है। अत: यह पॉलिसी गरीब किसान के विरोध में अमीर भूमि डेवलपर के पक्ष में है।


तीसरी प्रस्तावित नीति जीएसटी [गुड्स एंड सर्विस टैक्स] की है। सरकार चाहती है कि सभी वस्तुओं पर एक ही दर से बिक्री कर लागू किया जाए। इस परिवर्तन के लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है चूंकि बिक्री कर उनके द्वारा ही वसूल किया जाता है। आर्थिक विकास की दृष्टि से जीएसटी उपयुक्त है परंतु यह जनविरोधी है। जीएसटी व्यवस्था में गरीब की साइकिल और अमीर की मर्सिडीज कार पर एक ही दर से टैक्स वसूल किया जाएगा। माल का आयात करने वाले कमजोर राज्य जैसे सिक्किम तथा माल का निर्यात करने वाले सुदृढ़ राज्य जैसे महाराष्ट्र को भी एक ही दर से टैक्स वसूल करना होगा। इससे कमजोर राज्यों की स्वायत्तता समाप्त हो जाएगी। चौथी पॉलिसी पेट्रोलियम सब्सिडी की है। सरकार ने पेट्रोल के दाम पर से नियंत्रण हटा लिया है। अब डीजल की बारी है, परंतु डीजल के दाम बढ़ने का प्रभाव सीधा आम आदमी पर पड़ेगा। उसके द्वारा खरीदे गए माल की ढुलाई बढ़ेगी और उसे दाम ज्यादा देना होगा। मैं डीजल के दाम की वृद्धि की वकालत करता हूं, लेकिन साथ-साथ आम आदमी पर पड़ने वाले भार की भरपाई की भी वकालत करता हूं। सरकार आम आदमी द्वारा खरीदी गई वस्तुओं पर टैक्स घटाने को तैयार नहीं है परंतु उस पर डीजल का भार बढ़ाने को तैयार है।


लकवाग्रस्त पांचवीं पॉलिसी विनिवेश की है। आर्थिक सुधारों का मूल सिद्धांत है कि व्यापार में सरकार की भूमिका छोटी होनी चाहिए। सार्वजनिक इकाइयों को निजी उद्यमियों को बेच देना चाहिए जिससे इनके संचालन में मंत्रियों और नौकरशाहों का दखल समाप्त हो जाए। तब सरकार को इनके घाटे की भरपाई के लिए जनता पर टैक्स नहीं लगाना पड़ेगा। सरकार ने निजिकरण के स्थान पर विनिवेश की पॉलिसी बनाई है। सार्वजनिक इकाइयों की कमान मंत्रियों के ही हाथ में रहेगी। ऊपर से बिक्री किए गए शेयर से मिली रकम से सरकारी खचरें को पोषित किया जा सकेगा। छठी पॉलिसी ऊर्जा नाम पर आम आदमी को त्रासदी देने की है। तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र एवं अरुणाचल में लोअर सियांग जलविद्युत जैसी परियोजनाओं से आम आदमी को त्रास पहुंचता है। इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव स्थानीय लोग झेलते हैं। उत्पादित बिजली को दिल्ली के शॉपिंग माल जगमग करने के लिए भेजा जाता है। सातवीं पॉलिसी जनलोकपाल कानून के अनकहे विरोध की है। वास्तव में यह कानून कांग्रेस को स्वयं लाना था। ऐसा करने के स्थान पर कांग्रेस इसे उलझाने में लगी हुई है। सरकार नहीं चाहती कि भ्रष्टाचार रोकने में आम आदमी शिरकत कर सके।


उपरोक्त सभी नीतियां आम आदमी के विरुद्ध और अमीरों के लिए हितकारी हैं। इसलिए संप्रग सरकार की सहयोगी पार्टियां इनका विरोध कर रही हैं। ध्यान दें कि शिक्षा का अधिकार तथा भोजन का अधिकार जैसे कानूनों के कार्यान्वयन में कोई विरोध नहीं हुआ। इससे प्रमाणित होता है कि समस्या जनविरोधी नीतियों की है। वैश्विक आर्थिक संकट ने समस्या को ज्यादा गहरा बना दिया है। वैश्विक तेजी के समय देशों में विदेशी निवेश आ रहा था। हमारे निर्यात ठीक-ठाक चल रहे थे। ऐसी परिस्थिति में जनविरोधी नीतियों को लागू करने से आम आदमी का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई विदेशी निवेश से पैदा हुए रोजगार से हो जाती है। श्रमिक की नौकरी चली जाए पर उसे बेरोजगारी भत्ता मिल जाए तो उसका आक्रोश थम जाता है। आम आदमी को पिछले कई वषरें में जो त्रास दिया जा रहा है, वह तीव्र आर्थिक विकास से कुछ ढक गया था। वैश्विक मंदी के कारण अब इन नीतियों के दुष्प्रभाव पर पर्दा डालना संभव नहीं रह गया है। मेरा तर्क यह नहीं है कि कांग्रेस सर्वत्र जनविरोधी है। कांग्रेस ने ऋण माफी और रोजगार गारंटी कार्यक्रम के माध्यम से आम आदमी को राहत पहुंचाई है, परंतु इससे वर्तमान में लंबित नीतियों का जनविरोधी चरित्र समाप्त नहीं होता है। मेरी दृष्टि में कांग्रेस की तुलना में भाजपा ज्यादा जनविरोधी है। अंतर यह है कि कांग्रेस जनविरोधी नीतियों के साथ रोजगार गारंटी योजना चलाती है। भाजपा जनविरोधी नीतियों के साथ जनहितकारी कदम नहीं उठाती।


उद्यमियों द्वारा पॉलिसी पैरालिसिस को उठाया जाना उचित है। लंबित नीतियों के क्रियान्वयन से उद्यमियों को निश्चित तौर पर लाभ कमाने का अवसर मिलेगा। अत: विषय आम आदमी बनाम उद्यमी का बनता है। दोनों प्रमुख पार्टियों को ऐसा मॉडल बनाना चाहिए कि उद्यमी भी लाभ कमाएं और जनहित भी हासिल हो। यदि ऐसा नहीं होता तो नीतियों का लकवाग्रस्त होना ही उत्तम है।


लेखक डॉ. भरत झुनझुनवाला आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं


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