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मजबूरी के रूप में बढ़ती दूरी

Posted On: 10 Feb, 2012 Others में

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Kripashankar Chaubey ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच तेज होती तकरार का राजनीतिक निहितार्थ तलाश रहे हैं कृपाशंकर चौबे


कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच तकरार घटने के बजाय लगातार बढ़ती ही जा रही है। कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने गत दिवस कहा कि पश्चिम बंगाल के वित्ता मंत्री अमित मित्रा का यह दावा गलत है कि केंद्र सरकार से राज्य सरकार को अभी तक एक पैसे की भी मदद नहीं मिली, जबकि तथ्य यह है कि 20 मई 2011 से 6 फरवरी 2012 के बीच लगभग 23,694 करोड़ रुपए पश्चिम बंगाल को जारी किए गए हैं। इसके पहले तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी केंद्र सरकार पर राज्य सरकार की वित्ताीय मदद नहीं करने का आरोप लगाया था। ममता ने तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी आलोचना की थी। हालांकि प्रधानमंत्री की आलोचना के लिए उन्होंने सिंगुर के किसान आंदोलन का संदर्भ उठाया था। ममता ने कहा था कि सिंगुर के किसानों की जमीन जबरन अधिगृहीत किए जाने के खिलाफ कोलकाता के मेट्रो चैनल पर उन्होंने 26 दिनों तक अनशन किया था तो उसी दौरान प्रधानमंत्री कोलकाता आए थे, पर उन्होंने मुझसे [ममता से] मिलने की जहमत नहीं उठाई थी। बंगाल के किसानों को वह घटना ममता ने फिर याद दिलाकर प्रकारांतर से यह भी जताने की कोशिश की कि कांग्रेस किसानों की हितचिंतक नहीं रही है।


बहरहाल, असीम मित्रा ने जिस ढंग से अभिषेक मनु सिंघवी की आलोचना की अथवा ममता ने जिस अंदाज में प्रधानमंत्री की आलोचना की उससे साफ है कि तृणमूल कांग्रेस अब कांग्रेस से पिंड छुड़ाना चाहती है। दरअसल कांग्रेस से दूरी बनाना अब ममता की मानो मजबूरी है। ममता को लगता है कि भ्रष्टाचार के जितने संगीन आरोप कांग्रेस पर लगे हैं उसे देखते हुए उसके साथ रहने से तृणमूल कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा। ममता बनर्जी इस नुकसान से बचना चाहेंगी, क्योंकि व्यक्तिगत जीवन में वह अपनी साफ-सुथरी छवि के लिए भारतीय राजनीति में जानी जाती हैं। उनकी छवि का लाभ तृणमूल कांग्रेस को जिस तरह बंगाल में मिला उसी तरह के लाभ की उम्मीद उनकी पार्टी दूसरे राज्यों में भी करती है। ममता बनर्जी को पता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही कांग्रेस के लिए वापसी करना कठिन है, इसीलिए उन्होंने पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारे।


परमाणु करार से लेकर केंद्र सरकार जब भी संकट में पड़ी, ममता बनर्जी ने संप्रग सरकार का सहयोग कर गठबंधन धर्म का निर्वाह किया, लेकिन पश्चिम बंगाल में गत आठ महीने से जब उनकी सरकार खुद आर्थिक मुश्किल में है तो उन्हें महसूस हो रहा है कि केंद्र सरकार सहयोग का हाथ नहीं बढ़ा रही है। इसीलिए वह कांग्रेस से नाराज हैं। उनकी नाराजगी की दो ठोस वजहें हैं। पहली वजह यह है कि कई अहम मुद्दों पर केंद्र उनकी पार्टी से कोई मशविरा नहीं करता। तीस्ता जल बंटवारे की संधि पर भी राज्य सरकार को विश्वास में नहीं लिया गया था। ममता से कहा गया था कि तीस्ता से 25 हजार क्युसेक पानी बांग्लादेश को दिया जाएगा, जबकि प्रस्तावित संधि में पचास हजार क्युसेक पानी देने की बात कही गई। इससे नाराज होकर ममता बनर्जी ने अपनी ढाका यात्रा रद्द कर दी थी और वह संधि नहीं हो पाई थी।


दूसरी वजह यह है कि बंगाल के लिए केंद्रीय आर्थिक मदद के प्रश्न पर संप्रग सरकार सिर्फ बातों की राजनीति कर रही है। इससे ममता बनर्जी की मुश्किल बढ़ती जा रही है। ममता की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उन्हें उत्ताराधिकार में आर्थिक तौर पर दीवालिया प्रदेश मिला है। हर क्षेत्र में सुधार के लिए जो न्यूनतम धन चाहिए वह भी सरकार के पास नहीं है। पूर्ववर्ती वाम सरकार द्वारा लिए गए कर्ज का ब्याज ही हर माह 15000 करोड़ रुपए देने पड़ रहे हैं। राज्य की बदहाल आर्थिक अवस्था सुधारने के लिए उसे 20000 करोड़ रुपए का विशेष आर्थिक पैकेज चाहिए, पर केंद्र उसे मुहैया नहीं करा रहा है, जबकि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चुनावी सभा में इस पैकेज का आश्वासन दिया था। केंद्रीय वित्तामंत्री प्रणब मुखर्जी के साथ इस पैकेज को हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री और राज्य के वित्तामंत्री कई बार बैठकें कर चुके हैं, पर नतीजा सिफर रहा। ममता बनर्जी को बोध हो गया है कि संप्रग का दूसरा सबसे बड़ा घटक होने के बावजूद उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। इसी कारण तृणमूल कांग्रेस ने पेट्रोलियम पदाथरें की कीमतों में बढ़ोत्तारी के सवाल पर केंद्र सरकार से बाहर निकल आने तक की धमकी दे डाली थी। ईंधन कीमतें बढ़ाने के फैसले को ममता कठोर मानती हैं।


पेट्रोलियम पदाथरें में बढ़ी कीमतों का मुखर विरोध तृणमूल कांग्रेस ने यह जताने के लिए किया था कि जनता पर जब भी कोई बोझ आएगा तो वह जनता के साथ खड़ी होंगी, क्योंकि उनकी राजनीति का मुख्य आधार ही मां, माटी, मानुष है। तृणमूल कांग्रेस इस आरोप को खारिज करती है कि वह दबाव की राजनीति कर रही है।?उसका तर्क यह है कि यदि उसे दबाव की राजनीति करनी होती तो लोकसभा में 18 सांसदों के समर्थन के एवज में वह केंद्र में तीन से ज्यादा कैबिनेट मंत्री पद हासिल कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। केंद्र में संप्रग का सहयोगी घटक होने के बावजूद उसे जब भी यह महसूस होता है कि कोई फैसला आम जनता के हितों के प्रतिकूल है तो वह कठोर रुख भी अपनाने के लिए तैयार है। रिटेल सेक्टर में विदेशी पूंजी निवेश का तृणमूल कांग्रेस ने इसलिए मुखर होकर विरोध किया, क्योंकि उससे खुदरा कारोबार में लगे करोड़ों लोगों के सड़क पर आ जाने की आशंका थी। अक्सर इस तरह के विरोध के जरिए तृणमूल कांग्रेस खुद को आम जनता के निकट दिखाने की कोशिश करती है। तृणमूल कांग्रेस को अब महसूस हो रहा है कि कांग्रेस से दूरी में ही उसकी और साथ ही आम जनता की भलाई है।


लेखक कृपाशंकर चौबे वरिष्ठ पत्रकार हैं


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