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आदाब अर्ज़ है!

Posted On: 7 Sep, 2011 Others में

चातकआओ खोजें हिंदुस्तान

chaatak

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“आदाब अर्ज़ है! अमाँ मियां तुम ऐसे शुतुरमुर्ग की तरह मुंह लटकाए क्यों बैठे हो?” हमेशा की तरह मिर्ज़ा ने आँखें नचाते हुए कहा| “क्या कोई सगे वाला अल्लाह को प्यारा हो गया?”
ग़ालिब ने नज़रें ऊपर उठाई और मिर्ज़ा को बैठने का इशारा करते हुए बोले- मौके की नजाकत को समझो मियां अभी सियासी सरगर्मियां और बढ़नी हैं और न जाने कितना तिया-पांचा होना है ऐसे में दिल्ली हाई-कोर्ट में हुए धमाकों ने तो मानो सियासतदानों को एक और मौका दे दिया है|
अच्छा, तो आपने भी खबर सुन ही ली, लानत भेजो इन शैतान की औलादों को! नामुराद इस्लाम का नाम ले के सारी गैर इस्लामिक हरकतें करते हैं और जलालत हम उठाते हैं| हमें तो ये भूले भी ज़माना गुजर गया कि हमारी नस्लें गैर मुल्क में पैदा हुई थीं| दादे-परदादे यही कहते-कहते जन्नत नशीं हो गए कि हिन्दुस्तान ही मादरे-वतन है, इससे गद्दारी कौम से गद्दारी होगी, लेकिन पाकिस्तानी कठमुल्ले न जाने कौन सी घूटी पिलाते हैं लोगों को कि वे अपने मुल्क और कौम से गद्दारी करके हमारे लिए रोज़ नयी मुसीबतें पैदा करते रहते हैं| मिर्जा ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी में उंगलियाँ फेरते हुए कहा|
सही कहते हो मिर्ज़ा, मानो अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए ग़ालिब ने अपने लगभग गंजे हो चले सर पर हाथ फिराया, मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि किसी गैर मुल्क की यादें हमारी रगों में होंगी| हमारी तो जड़ें भी यहीं हैं तने, टहनियां और पत्ते भी यहीं हैं|
“लेकिन क्या इस बात से इनकार कर सकते हो कि हर बार आतंकी हमले हमारे बीच रह रहे गद्दारों की कारगुजारियों के कारण ही होते हैं?” मिर्ज़ा के चेहरे पर अब स्वाभाविक खुशमिजाजी की जगह चिंता की लकीरें नज़र आने लगीं|
क्या जवाब दूं? ग़ालिब ने मानो सवाल से बचने की कोशिश की|
‘जवाब देने की जरूरत भी नहीं| सही तो ये हैं कि हमारे रहनुमाओं ने हमें हिन्दुस्तानी बनने ही नहीं दिया|’ मिर्ज़ा की कडवाहट मानो दिल से निकल कर जुबान पर आने लगी| अव्वल तो बुखारी जैसे कौम के रहनुमा हैं जिन्हें बोलने तक की तमीज नहीं और उस पर हमारे खैरख्वाह सियासतदान जिन्हें हमारे बीच फैली अशिक्षा का फायदा उठाना खूब आता है| पिछले ६४ साल से हम सिर्फ कठपुतली वोट बैंक बनकर रह गए| न हमने कोशिश की और न इन लोगों ने हमें मुल्क की मुख्य धारा से मिलने दिया| हम सिर्फ मुसलमान बनकर रह गए अपनी नजर में भी और दूसरों की नज़र में भी|
मिर्ज़ा ने मानो ग़ालिब की सोच को दिशा दे दी- हमारी मजबूरी भी देखो कि हम इस बात को इस चारदीवारी में तो कर सकते हैं लेकिन मंच पे खड़े होकर नहीं| आश्चर्य नहीं कि मुल्क का समर्थन करने के लिए हमें काफिर ही घोषित कर दिया जाय| हमें शायद आदत हो चुकी है कि हम कभी कौम के ठेकेदारों के तो कभी सियासी रहनुमाओं के हाथ की कठपुतली बने रहें और हर बार जब आतंकी हमले हों तो अपने गिरहबानों में झाँक कर तय करे कि कोई छीटा हमारे ऊपर तो नहीं पड़ रहा|
आदत ही कह सकते हो मियां वरना क्या ऐसा है कि जुबान में हकीकत बयानी की जुर्रत नहीं आती| जब भी कोई हादसा होता है तो दर्द कितना भी हो लगता है दर्द नहीं शर्म छिपा रहे हैं| कहते-कहते मिर्जा का लहजा फिर से व्यंगात्मक हो गया और दिल के किसी कोने में टीस को दबाते हुए सफ़ेद दाढ़ी के बीच से मुस्कुराए और बोले- इन हादसों के बहाने ही सही कम से कम दिल की बात जुबान तक आई तो सही, चलता हूँ मियां अगले हादसे का इंतज़ार रहेगा, देखते हैं हम इन गद्दारों के किये की जलालत कब तक उठा पाते हैं| आदाब अर्ज है! कहते हुए मिर्ज़ा बाहर निकल गए लेकिन ग़ालिब चाह कर भी खुदा-हाफ़िज़ न कह पाए|

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