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"परमपूज्य पिता जी"

Posted On: 22 Apr, 2012 Others में

कलम...{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

महाभूत

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पिता जी पठार है ,

अडिग हिमालय अवतार है !

पूरब के सूरज से पक्के ,

आदर्श,उसूलों से भीष्माचार है !

***

ललाट से छिटकती कौमुदी हिमकर ,

भृकुटियों में मर्यादा सार है !

बाजुओं में साधे हर दुशाध्य ,

पिता जी गुणों के गुलाब हैं !

***

भुटिया खुय्याणी से कड़क तीखे ,

पर मीठी चाशनी भी अपार हैं !

मितभाषी निरीह पिता जी ,

प्रेम पावस की शीतल बयार हैं  !

***

सुख के अकाल में भी ,

सजीले हरे सावन है पिता जी  !

विषमताओ के जेठ में भी,

खुशियों के चेरापूंजी मेघ हैं पिता जी !

***

सत्य उपासक सत्यनुयायी तात,

लोलुपता धूर्तता से बेजार हैं !

ईमानदारी की पावन मूरत ,

हर अन्याय पर चंद्रहास हैं !

***

भोले हैं सरल भोलेनाथ से ,

सर्वजन प्रेमी नारायणी विचार हैं !

इंसानियत के पालक-पोषक  ,

अरिओं के महाकाल हैं !

***

चाँदी-चन्दन के  पलने में पाला मुझको ,

चैन-सुकून के स्वर्ण बिछोने पर सुलाया !

मै घुटुरनि था घिसटता ,

मुझे खड़ा किया,उड़ना सिखाया !

***

लाकर दिए मट्टी-काठ चंद्रमा से ,

हर हठ-जिद्द पर तारों तक को दिलवाया !

शिक्षा का अनमोल वरदान दिया ,

किस्मत को चमकता मार्तंड बनाया !

***

और सिखाया सुन्दरता का अर्थ सद्कर्म ,

मानवता ही सबसे बड़ा धर्म !

सबक के आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी ,

चरित्र का खोना है  सबसे बड़ा हनन !

***

कभी नीम सी डांट-डपट  की घोटन-घुट्टी पिलाते है ,

कभी कभी बदन पर बेंत उगाते है पिता जी !

जानता हूँ गीली नर्म मिटटी हूँ जीवन चाक पर,

मेरे सारे दोष काट-छांट मुझे गुणी बनाते है पिता जी !

***

मै चाहे मुट्ठी मे आसमा लाकर दिखा दूँ ,

पर मीठी झड़क से ही काम चलाते है पिता जी !

उनके अधरों पर चाहे ना खिले  शाबाशी ,

पर उनके फूले सीने से जान जाता हूँ जी !

***

होता हूँ कमजोर,बीमार बहुत जब ,

जग कर बगल मे सारी रात बिताते है पिता जी!

मै चाहे कुछ भी न बोलूं जुबां से ,

पर मेरा दर्द जान जाते हैं पिता जी !

***

मेरे सपनो की खातिर त्यागी बन ,

बदन को अथक मशीन बनाते हैं पिता जी !

रोज शाम लाते है आम,चाकलेट और जलेबी,

मेरे एक आंसूं पर तड़प जाते है पिता जी !

***

किवदंती जो पिता चरणों मे समय बिताते हैं ,

पिता हित मे हँसते हँसते वन को जाते है !

बस वो ही राम, श्रवण बैकुंठ पंहुचते है ,

बस वो ही तातप्रेमी मोक्ष को पाते हैं !

***

निर्गुण निराकार हैं पिता जी ,

मेरे लिए मंदिर,मजार ,चार धाम है पिता जी !

मेरी निर्जन पतवार के खेवनहार,

मेरे अराध्य इष्टदेव, सर्व संसार ” परमपूज्य पिता जी ” !

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