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भोपाल गैस त्रासदी: शर्मनाक राष्ट्रीय दुर्घटना

Posted On: 12 Jul, 2012 Others में

कलम...{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

महाभूत

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TRAGEDY OF BHOPAL GAS ACCIDENT
यदि हम देश मे हुए मजहबी दंगो को अनदेखा कर दे तो, मेरी नजर मे भोपाल गैस त्रासदी भारतीय इतिहास की सबसे शर्मनाक अप्राकर्तिक राष्ट्रिय दुर्घटना है ! अपितु  इसे हमारी राजनैतिक और मानवीय मूल्यों के स्वर्णिम भारतीय इतिहास पर सबसे बड़ा कलंक कहना अतिश्योक्ति न होगा  ! शायद यही वह समय था जब हमारे राजनेताओं की आम आदमी के प्रति आत्मीयता की संवेदना ने दम तोड़ दिया था !

3  दिसंबर 1984 की भारतीय  राज्य मध्यप्रदेश के भोपाल शहर ओद्धोगिक क्षेत्र मे एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड मे विश्व का सबसे दर्दनाक शर्मनाक ओद्धोगिक हादसा हुआ ! सबसे हैरान करने वाली बात यह है की अभी तक की लगभग अनगिनत परिचर्चाओं मे कंही भी तत्कालीन निजाम शासक अर्जुन सिंह की भूमिका पर कंही कोई खास समीक्षा या तीव्र आलोचना नहीं हुई !जो भी हलकी फुलकी चर्चा हुई उसे राजनेतिक साजिश के तहत बरगला दिया गया !

पर मेरा इस विषय को पुन: जीवित, प्रज्जवलन करने का मूल उद्देश्य उन 15000   निरपराध जानों ( सरकारी आकडे )  , और असंख्य , गैस त्रासदी से विकलांग लोगो की पीड़ा को आप आम जन तक पहुचना है !
बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एंडरसन ने विश्व के अन्य देश ,प्रान्तों, प्रदेशो की तरह यंहा भोपाल मे भी इक अत्यंत आधुनिक और सुरक्षा और उत्पादन के शीर्ष मायनों पर खरा उतरते  रासायनिक कीटनाशक  उत्पादन की महत्वकांक्षा का कारखाना स्थापित किया था !
यूनियन कार्बाइड की बेहतरीन कीटनाशक उत्पादन प्रणाली बाजार के साथ सामजस्य स्थापित नहीं कर पाई और इसने कारखाने को अनुमानित अर्थलाभ की उपेक्षा आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ा ! जिसका कंपनी की उत्पादन प्राणाली , सुरक्षा मानकदंड, और उपकरणों के अनुरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा !

3  दिसंबर 1984 की काली खूंखोर रात  को यूनियन कार्बाइड के उत्पादन नियंत्रण कक्ष मे बैठे स्थाई कर्मचारियों  कुछ रासायनिक रिसाव की शंका हुई , उपस्थित कर्मचारी ने तत्काल ही भूमिगत रसायन भंडारण टैंक का निरिक्षण किया तो उन्हें वंहा रसायन ” मिथायल आइसो सायनाइड” का   मामूली सा रिसाव मिला ! जिसे उन्होंने दैनिक सुरक्षित रसायन रिसाव के छिटपुइय़ा रूप मे लिया ! पर देखते ही देखते इस रासायनिक रिसाव ने विकराल रूप ले लिया !
देखते ही देखते मिथायल आइसो सायनाइड के घातक वाष्पों ने भोपाल शहर के वायुमंडल  में प्रवेश ले लिया ! आपातकालीन समय की गंभीरता ने कर्मचारिओं को मजबूर किया की शीघ्र ही आपातकालीन सुरक्षा प्राणाली का उपयोग कर समस्या का निदान किया जाए !
सबसे पहले उन्होंने रासायनिक वेंट स्क्रबर का इस्तेमाल किया, जिसका काम असुरक्षित गैस को क्षारीय जल में घोलकर वायुमंडल में जाने से रोकना है ,पर मिथायल आइसो सायनाइड के अनियंत्रित गैस रिसाव के विशाल बादल इससे अप्रभावित रहा !
यूनियन कार्बाइड ने ऐसी व्यवस्था की थी की यदि किसी कारणवश वेंट स्क्रबर असफल होता है तो तत्पश्चात ‘प्रज्ज्वलन कालम’ में प्रवेश कर रही इस भयानक गैस को इधन के रूप में जला वायुमंडल में जाने से रोका जा सके !
पर यह प्रयास भी विफल रहा ,
तीसरा तथा अंतिम प्रयास जल अग्निशमन  के सिमित लघु संसाधनों के जल छिडकाव के रूप में रहा और  यह प्रयास भी विफल रहा ,

देखते ही देखते मिथायल आइसो सायनाइड के घातक वाष्पों ने रियाह्शी क्षेत्रों में अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया , लोगो के फेफड़ो ,आँतों ,आँखों में ये जहरीला रसायन समा गया , मासूम बच्चे , बूढ़े ,जवान  सभी उलटी ,आँखों में जलन , सांस लेने में दिक्कत की घातक समस्या से जूझने लगे !
निर्दोष जनता ने अकारण तड़प तड़प प्राण त्यागना शुरू कर दिया ,
उपचार करने वाले चिकित्सक को कभी अमोनिया गैस कभी फोस्जिन गैस के रिसाव की गलत और अतिक्रूर सुचना दी गई ,जिससे उपचाराधीन लोगो और चिकित्सक दोनों को गुमराह किया !

इधर राजनेतिक गलियारों में हलचल चालु हो गई ,जो बस दिखावे मात्र को था ,वारेन एंडरसन को भारत आते ही गिरफ्तार कर लिया गया और अपने ही गेस्ट हाउस में उसे किसी शाही मेहमान की तरह रखा गया और कुछ ही दिनों में जमानत ले वह अपने देश लौट गया !
वारेन एंडरसन ने स्वदेश लौटते ही इस मार्मिक वीभत्स दुर्घटना को साजिश का जामा पहनाना शुरू कर दिया ,उसने अपने कारखाने के अत्यंत आधुनिक और सुरक्षा और उत्पादन के शीर्ष मायनों का हवाला देना शुरू कर दिया !

इधर देश में केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभिक जांच भारतीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान (सीएसआईआर) और केंद्रीय जांच ब्यूरो परिषद द्वारा आयोजित किया गया ! जिसने 1994 तक किसी भी आकडे की सार्वजनिक सुचना से इनकार कर दिया !

आप सोच सकते है की 15000  से अधिक लोगो के जानमाल के नुक्सान को तत्कालीन सरकार ने बहुत ही शर्मनाक ढंग से अनदेखा कर दिया था !
लाशों की लाशें ,निर्बोध पशु मारे गए थे , शहर जैसे भुतहा नगर बन गया था !

यह जानना यंहा हर भारतीय नागरिक के लिए आवश्यक हो जाता है की आखिर इस दुर्घटना ने इतना विकराल रूप कैसे ले लिया ! एक  विदेशी संस्था ने लाख प्रतिबन्ध के बाद जो गुप्त  रूप से जांच की उसमे निम्नलिखित कारक सामने आये !

1 ; मिथायल आइसो सायनाइड का  भण्डारण तरल रूप में प्रशीतन ( ठन्डे ) माध्यम में किया जाता है ! पर आर्थिक नुक्सान के चलते इसे अनदेखा कर दिया गया था !
२.  मिथायल आइसो सायनाइड का  क्षमता से अधिक भण्डारण ! जिस समय दुर्घटना हुई उसमे 42  टन  मिथायल आइसो सायनाइड था ,जबकि सुरक्षा मानकों के अनुसार 30 टन मिथायल आइसो सायनाइड का भण्डारण ही होना चाहिय था !
३ मिथायल आइसो सायनाइड की प्रकति के अनुसार यदि इसमें कोई अशुद्ध्त्ता मिश्रित हो जाए तो यह खतरनाक एक्ज़ोथिर्मिक प्रतिक्रिया का रूप ले लेता है ! यही हुआ भी, क्युंकी आर्थिक बजट के नियंत्रण के चलते प्रबंधन ने  मेंटेनैंस सुपरवाईसर को निकाल दिया था !
और एक ही उपकरण कई प्रकिरियाओं में इस्तेमाल  होने लगा, जिसने किसी तरह पानी और आयरन जंग को  मिथायल आइसो सायनाइड टैंक के भीतर पहुंचा दिया !
4 उपकरण नियंत्रक नाइट्रोजन वाल्व का ख़राब होना !
5  रासायनिक वेंट स्क्रबर,प्रज्ज्वलन कालम’, जल अग्निशमन यंत्रों की  क्षमता का कमजोर और ख़राब होना !

अब इससे भी शर्मनाक बात यह है की इन सब जांचो और सुचना के बाद भी 90  वर्षीय वारेन एंडरसन स्वीटज़रलैंड में रिटायरमेंट की खुशहाल आरामदायक छुट्टियां बिता रहा है !
और इस विभत्स अतिक्रूर परमाणु बम्ब के से शर्मनाक दुर्घटना के शिकार मासूम लोग आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहें है ,
कंही भी उनकी मार्मिक चीखों का असर नहीं दिखता ! असर दिखता है तो बस उनके आने वाली पीढ़ीओं  में , जो आज भी विकलांगता और गंभीर बिमारी की समस्या से जूझ रही है !
और इक और हास्यपद बात यह की इस दुर्घटना में मारे गए लोगो पर वारेन एंडरसन प्रति व्यक्ति 600  डालर का मुआवजा रूपी अहसान के बदले उस पर दायर मुक़दमे को खारिज चाहता है !
जिस कंपनी में ये हादसा हुआ और जिससे हजारों लोग मारे गए और घायल हुए ! आज वही लन्दन ओलम्पिक खेलों को प्रायोजित कर रही है और भारत कुछ नहीं कर पा रहा ,ऐसा बहुत से लोग मानते है ,पर खेल प्रायोजित ना करने देना ,हमारी अक्षमता को ही दिखाता है ,सोचीय हम दोषी को सजा दिलाने और मृतको को सही मुआवजा दिलवाने की उपेक्षा तर्कहीन बातो को उठा रहे है ,
आज जरुरत है की फिर कोई एंडरसन या उसका कोई कारखाना ऐसा विनाशकारी हादसा का जिम्मेदार ना बने ! हमे चाहिय की अपनी व्यवस्था को सही रखने में सरकार की भूमिका को जिम्मेदार बनाये !

अपने ही हाथों से परमाणु बम्ब जैसी की इस तबाही से घायल इन्साफ 28  वर्ष बाद भी अपने न्याय के लिए प्रतीक्षित है !

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