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“ बेरोजगार ”

Posted On: 11 Mar, 2012 Others में

कलम...{ "हम विलुप्त हो चुकी "आदमी" नाम की प्रजातियाँ हैं" / "हम कहाँ मुर्दा हुए हमें पता नहीं".....!!! }

महाभूत

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poverty-11

बेरोजगार


मेरी विफलता को जैसे विवशता की कढाई मे ,

उलाहना रूपी तेल मे निरंतर तला जा रहा है ,

आंसुओं का लावा मेरे नैनों को गला रहा है ,

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मेरा अस्तित्त्व शुन्य से भी बदतर है !

वक़्त का चाकू मुझे मारता ही नहीं कम्बखत ,

हर बार एक बड़ा सा घाव बना देता है ,

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और जैसे ही उबरने को होता हूँ इस पीड़ा से ,

चमचमाती साड़ी पहने सफलता ,

मुस्कराहट के कोड़े से ,

मुझे जी भर  कर पीटती है !

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दुर्भाग्य की खाई इतनी गहरी है की ,

योग्यता की सीढ़ी पर थककर बैठ गया हूँ मै ,

लगता है जैसे तनाव की एक हल्की पैनी सुई ,

मेरे मष्तिष्क को गुब्बारे की तरह फाड़ देगी !

*************

सब कुछ धुंधला सा हो रहा है अब ,

मै अति प्यासा व्याकुल पागल हुआ ,

विचारो के तेजी से चलते वाहनों के बीच ,घिरता , गिरता , उठता ,

समेट रहा हूँ चाबुको के निशान , जले हुए आंसू ,

सूखे घावो की पपड़ियाँ , अपने अस्तित्व का तिनका !

************

मै कच्ची माटी का पुतला ,

टनों वजनी इस दुख से बस ढहने को हूँ ,

मै हूँ बेरोजगार !

*******

Chandan Rai

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