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राजनीति मत करो, मासूमों को बचाओ (jagran junction forum )

Posted On: 30 Dec, 2013 Others में

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चित्रकुमार गुप्ता

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उर्दू के मशहूर शायर श्री बशीर बद्र साहब ने दंगों की भीषणता को बयां करती कितनी सुन्दर पंक्तियाँ लिखी हैं:-
लोग टूट जाते हैं एक मकां बनाने में,
तुम शर्म नहीं करते बस्तियां जलाने में,
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती दिल को दिल बनाने में
फाख्ता की मजबूरी कह भी नहीं सकती,
कौन सांप रखता है उसके आशियाने में , ;
मुज़फ्फ़रनगर जिले के एक छोटे से कस्बे कवाल मेँ भङकी एक छोटी सी चिंगारी इतनी विकराल ज्वाला बन गयी कि कई बेगुनाह बेमौत मारे गये, अनेक घर स्वाहा हो गये और हजारोँ लोग अपने गाँव छोङकर शरणार्थी शिविरोँ मे रहने को मजबूर हुए । दँगे तो कुछ दिनोँ बाद ही बन्द हो गये लेकिन खौफजदा लोग अपने घरोँ को लौटने को तैयार नही हुए ।
मौसम का मिजाज बदला । कङकङाती सर्दी ने रौद्र रूप अख्तियार किया । पीङितोँ की परेशानियाँ बढी और अखबारोँ की दी हुयी जानकारी के अनुसार 34 बच्चे काल के गाल मेँ समा गये । हमारे मुल्क मेँ जैसाकि रिवाज़ है, हर मुद्दे पर राजनेता अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते हैँ, वोट बैँक साधने कोशिश करते है, यहाँ कैसे चूक जाते । देखते ही देखते आरोप प्रत्यारोपोँ का दौर शुरू हो गया ।
उत्तर प्रदेश मे समाजवादी पार्टी की सरकार हैं । इसका नेतृत्व कर रहे हैँ : युवा अखिलेश यादव । कहते हैँ कि किसी भी सरकार का प्रथम कर्तव्य अपने नागरिकोँ को भयमुक्त वातावरण मुहैया कराये । लोगोँ के जानमाल की हिफाज़त करे । लेकिन समाजवादी पार्टी के छोटे से कार्यकाल मेँ सौ से ज्यादा दँगे हो चुके हैँ । मुख्यमन्त्री को सिर्फ इस बात की फिक्र है कि कैसे अपने पिता को देश का अगला प्रधानमन्त्री बनवा सकेँ । इसलिए वह लैपटॉप वितरण, संस्थाओँ के नाम बदलने जैसी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की तरकीबोँ पर अमल कर रहे है । पीङितोँ की उन्हेँ कहाँ चिन्ता । सबसे बङी विडम्बना तो यह है कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने तो शिविरों की मौजूदगी को ही नकार दिया | उन्होंने इसे विपक्ष कि साजिश करार देते कहा कि वे सरकार को बदनाम करने के लिए अपने आदमी वहाँ भेज रहे हैं | समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव,शिवपाल यादव आदि भी यही कह रहे हैं कि लोग शिविरों से घर जा चुके हैं | लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है | जब सरकार पर दवाब पड़ा तो उसने अपने झूठ को सच साबित करने के लिए बुलडोजर चलवाकर जबरदस्ती शिविरों को हटवाना शुरू कर दिया |
अब प्रश्न ये उठता है कि दंगे तो सितम्बर में ही रूक गए थे. लेकिन लोग अभी तक अपने -२ घरों को क्यों नहीं लौटे | कारण बिलकुल स्पष्ट हैं इन दंगो ने लोगों के दिलों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जिसका गिरना इतना आसान नहीं हैं | लोगों के बीच अविश्वास और असुरक्षा का भाव है | प्रदेश सरकार की नीतियां तो पहले से ही ऎसी हैं कि दोनों ही वर्ग एक दूसरे पर भरोसा नहीं कर पा रहें हैं | गंगा जमुनी तहजीब की चूलें इस दंगे की आंधी ने हिला कर रख दी हैं | हर दल इसी फ़िराक़ में है कि किस प्राकर से आगामी लोकसभा चुनावों में इस दंगे का सियासी फायदा उठा सके | सभी पार्टियां अपने को भिन्न-२ वर्गों का हितैषी साबित कर वोटों की फसल काटना चाहती हैं | किसी को मासूमों के मरने का रंज नहीं है |
चिताओं पर सेंककर रोटीआं खाते हैं,
कब्रों पर खड़े होकर कद बढ़ाते हैं ,
सियासतदाओं का दिल पत्थर होता है,
लाशों पर चलकर कुर्सी तक जाते हैं,
ऐसा नहीं कि सरकार ने दंगा पीड़ितों की मदद नहीं की, लेकिन हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जिसको मदद चाहिए उसे तो मिल नहीं पाती लेकिन दलालों के खजाने खूब भर जाते हैं | गरीब तो ललचायी नज़रों से मुंह ताकता रह जाता है जबकि उसके नाम पर, उसका हक़ कोई और मार ले जाता है | मलकपुर, लोई आदि राहत शिविरों में लोग जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं, तिरपालों के नीचे कड़कड़ाती ठण्ड में रात गुजार रहे हैं मगर आकाओं को इससे क्या मतलब, उनके घर तो दौलत से भरे हैं , उनके पास तो अपनी राजनीति चमकाने का सुअवसर है |
जबतक देश और प्रदेश की राजनीती में यह समीकरणबाजी चलती रहेगी की कोई dm , कोई my , कोई jm बनायेगा तब तक जनता यूँ ही पीड़ित रहेगी | दंगों की आग सुलगेगी, दिलों के बीच नफरत की दीवार खड़ी होगी | इसलिए आमआदमी को इन छोटी मानसिकता वाले नेताओं का पत्ता साफ़ कर देना चाहिए | अपनी सोच को व्यापक बनाकर मानवता तथा देश की भलाई सोचने वाले रहनुमा चुनने चाहिए |

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