blogid : 23256 postid : 1378919

दलित आन्दोलन अम्बेडकर से उमर खालिद तक

Posted On: 9 Jan, 2018 Others में

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभाJust another Jagranjunction Blogs weblog

Delhi Arya Pratinidhi Sabha

248 Posts

64 Comments

दलित आन्दोलन अम्बेडकर से चलकर उमर खालिद तक पहुँच गया आगे भविष्य में इसका सूत्र संचालक कौन होगा अभी तय नहीं हुआ है. भीमा कोरेगांव शोर्य दिवस का मंच सजा तो इस मंच पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, (जिस पर धर्मांतरण के लगे संगीन आरोपों की जाँच एनआईए कर रही है) मूल निवासी मुस्लिम मंच, छत्रपति शिवाजी मुस्लिम ब्रिगेड, दलित ईलम आदि संगठन थे. मौजूद लोगों में प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद, रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला, सोनी सोरी, विनय रतन सिंह, प्रशांत दौंढ़, मौलाना अब्दुल हामिद अजहरी वगैरह शामिल थे. इसके बाद दलितों पर अत्याचार की कहानी सुनाई गई. यह कि आज भी दलितों पर अत्याचार होता है और अत्याचार करने वाले भाजपा-आरएसएस के लोग होते हैं. कहा गया भाजपा और संघ के लोग आज के नए पेशवा हैं. जिग्नेश मेवाणी ने तो सीधे प्रधानमंत्री को आज का पेशवा कहा. इसी कथानक को फिर तरह-तरह से दोहराया गया. फिलहाल ना कथित दलित नेता अपनी बुराई सुनना चाहते है और ना सरकार और ना मीडिया और न ही आरोपी संगठन. लेकिन आप चाहें मुझे चार फटकार जरुर लगा सकते हैं.

ये नाम और उपरोक्त संगठन दलित आन्दोलन और और भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा तोड़फोड़ के पुरे किस्से का यह वो घी है जिसे जातिवादी अपनी पिंडलियों पर रगड़-रगड़कर अगली किसी संभावित हिंसा या आन्दोलन के लिए खुद को तैयार कर सकते हैं. लेकिन इस मामले के बाद यदि गौर करें तो मुख्य सवाल यही उभरता कि पूरे मामले से दलितों को क्या मिला? इस आन्दोलन में नाम आता है जिग्नेश, उमर ख़ालिद. सोनी सोरी, विनय रतन सिंह, प्रशांत दौंढ़ और अब्दुल हामिद अजहरी. इससे साफ है कि पेशवा और ब्राह्मण तो बहाना हैं, यह एक ऐसे झुंड का जमावड़ा था, जो इस देश में नारा लगाते है कि भारत की बर्बादी तक, जंग चलेगी, जंग चलेगी आदि-आदि  सवाल ये भी है कि ये लोग खुलकर अपने एजेंडे पर बात क्यों नहीं करते? ऐसा क्यों न कहा जाए कि ये झूठ का पुलिंदा बनाकर दलितों को मोहरा बना रहे हैं?

सवाल बहुत है लेकिन इनके जवाब बड़े विस्फोटक हो सकते हैं. सवाल दलित पार्टियों के रवैये पर भी हैं. ये पार्टियां क्या अपनी भी सोच या दिशा रखती हैं या फिर हिन्दू बनाम दलित चिल्लाने वाली उस मीडिया के इशारे पर चल देते हैं?  आप गौर से इन लोगों के चेहरों को देखो तो तुम्हें समझ में आयेगा कि दलित आन्दोलन की कमान इन लोगों के हाथ में रहने से क्या कोई समस्या हल हो सकती हैं? समस्याएं बढ़ेगी क्योंकि दलित कोई जाति या समुदाय ही नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा धर्मांतरण और सत्ता की सम्भावना का द्वार जो बना लिया गया है.

ये वक्त आन्दोलन के मरीज को उसकी संगीन गलतियाँ याद दिलाने या धमकियों का नहीं है, बल्कि उदारता समानता की ठंढ़ी पट्टियां रखने का हैं. भारतीय जनमानस से भेदभाव के विभेद को मिटने ऐसा कोई मन्त्र दिखाई नहीं दे रहा है जिसका कठोरता से पालन हो व एक ही झटके में भेदभाव की रीढ़ टूट जाए, कारण इस भेदभाव को मिटाना न तो हमारा राजनैतिक तंत्र चाहता है और न ही कथाकथित दलित नेता. चार गाली मनुस्मृति को दी, चार गाली धर्म को, एक दो वर्णव्यवस्था को बस हो गया दलित उद्धार? वोट ली, चुनाव जीता मंत्री पद कब्जाया कुछ इसी तरह नेताओं ने सत्तर वर्ष घसीट दिए.

अब सवाल है किस है तरह होगा दलित उद्धार? मायावती का फार्मूला तो धर्मपरिवर्तन हैं? लेकिन जिन्होंने धर्म परिवर्तन किया क्या उनका उद्धार हो गया? पिछले दिनों ही दलित ईसाई अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहे थे. दूसरा जिग्नेश के अनुसार भाषणों और हिंसा या एक दो युद्ध की कहानियों की जीत के गौरव से? यदि 70 सालों से सम्पूर्ण दलित जाति का उद्धार आरक्षण नया हीं कर पाया तो धर्मपरिवर्तन या फिर बड़े-बड़े जुलूस कैसे कर पाएंगे? कहा जा रहा हैं शोर्य दिवस के मौके पर मंच पर चार मटके रखे थे जिनपर ब्राह्मण, क्षत्रिय वेश्य और शुद्र लिखा था. उद्घाटन के अवसर पर इन मटकों को फोड़ा भी गया जोकि सही भी है जातिवाद उंच-नीच समाज की बुराई है पर यदि इन चार मटकों को तोड़कर आगे बढ़ना ही हैं तो जातिवाद का वो आरक्षण रूपी मटका भी क्या टूटना नहीं चाहिए?

भीमराव अंबेडकर की जो मुख्य लड़ाई थी वो वर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ थी. वो चाहते थे कि इस देश में इंसान रहें, जातियाँ न रहें. आज दलित-चेतना का फैलाव अंबेडकर से बुद्ध तक तो हो गया पर बुद्ध और अम्बेडकर के सिंद्धांतों से कोसो दूर चला गया, बुद्ध ने कहा था कि के ‘अप्प दीपो भवः’ यानी अपना नेतृत्व ख़ुद करो, लेकिन इसके उलट आज दलित समाज का नेतृत्व उमर खालिद, मौलाना अब्दुल हामिद अजहरी और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया जैसे लोग और संगठन करने लगे. जो दलितों को उनके हक से दूर कर अपने ही समाज से नफरत करना सिखा रहे है. सामाजिक परिवर्तन, समानता, भाईचारा और आजादी तथा जाति तोड़ो आंदोलन से विमुख होकर अवसरवादी समझौते करने था प्रतिकार की हिंसा की ओर धकेल रहा है. यदि आज दलित समाज एक अलग परंपरा-संस्कृति का निर्माण, जिसमें समानता, श्रम की महत्ता और लोकतांत्रिक मूल्यों के समायोजन में जीना चाहते हैं तो अपनी मांग खुद रखनी पड़ेगी. आज देश का राष्ट्रपति एक दलित परिवार से है यदि अब भी आपकी जंग पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और उमर खालिद लड़ेंगे तो प्यारे भाइयों आपके आन्दोलन की दिशा धर्म से जोड़कर भटका दी जाएगी और मेरे भाई आप यह समानता का यह युद्ध हार जाओंगे..राजीव चौधरी

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग