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नकाब से टकराती बेनकाब विदा मुव्हैद

Posted On: 19 Feb, 2018 Others में

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभाJust another Jagranjunction Blogs weblog

Delhi Arya Pratinidhi Sabha

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गुजरता दिसम्बर 2017 ईरान की राजधानी तेहरान में एक 19 महीने के बच्चें की माँ 30 वर्षीय विदा मुव्हैद राजधानी तेहरान की व्यस्त सड़क के ऊपर खड़ी हुई थी और हिजाब को लहरा रही थी. जिसे ईरान में सभी महिलाओं को कानून द्वारा पहनना आवश्यक है. उसके खुले बाल जैसे उसके कपड़ों से खेल रहे थे. फिर उसने एक सफेद स्कार्फ को एक छड़ी के साथ बांध दिया और, व्यस्त रास्ते पर घूमते हुए, चुपचाप उसे झंडे की तरह लहराया. वह एक घंटे तक इसे अकेले लहराते रही. इसके बाद उसे इस अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन अनिवार्य हिजाब से लड़ रही ईरानी महिलाओं के बीच विदा मुव्हैद, का स्वागत एक नायिका के रूप में किया गया. विदा मुव्हैद गिरफ्तारी दुनिया भर में खबर बनी. जिसके बाद एक और ईरानी कार्यकर्ता, नरग्स होसेनी को 30 जनवरी और फरवरी माह में एक साथ 29 महिलाओं को इस अपराध में गिरफ्तार किया गया. इस्लामिक गणराज्य में इस्लामिक ड्रेस कोड को देखने में विफल महिलाओं को दो महीने तक जेल भेजा जा सकता है या करीब 100 डॉलर का जुर्माना लगाया जा सकता है.

इस आन्दोलन से प्रशाशन और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसा भी हुई. जो बाद में ऑनलाइन आंदोलन मेरी छुपी हुई आजादी की शुरुआत बन गयी, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर बिना किसी सिर वाले लोगों के चित्रों को पोस्ट करने के लिए ईरान में महिलाओं को आमंत्रित करने वाला एक ऑनलाइन आंदोलन बना. परम्पराओं की बेड़ियों को तोड़ने को बेताब प्रदर्शनकारी मौलवियों को सत्ता से बेदखल सिर्फ इस लिए भी करना चाहते हैं कि उनकी दैनिक जीवन शैली से कट्टर इस्लामिक फरमान राजनितिक तौर पर खत्म हो.

शरियत कानून के अनुसार, यौवन की उम्र से ऊपर की सभी महिलाओं को सिर कवर होना चाहिए. ष्यह मुद्दा व्यापक रूप से प्रतिध्वनित है और ईरान के राजनीतिक इलाके में चर्चा पैदा कर रहा है कि कैसे जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा प्रतिबंध के बारे में नाखुश है, न कि केवल हिजाब के बारे में, बल्कि महिलाओं की समानता के बारे में भी नाखुश हैं.

आज का इस्लामिक गणतन्त्र ईरान जो कभी आर्यों के पर्शिया और फारस के नाम से भी जाना जाता था. ईरान के पैगंबर जरतुश्त के सुधारों से पहले ईरानियों का जो धर्म था वो वैदिक धर्म था बाद में जरतुश्त ने ईरानी धर्म को जो नया रूप पारसी नाम से दिया इसके हर पहलू से यह स्पष्ट है कि वह और वैदिक धर्म के परिवार का हिस्सा हैं. आर्यों के मूल धर्मग्रंथ वेद और जरतुश्त की पुस्तक अवेस्ता दोनों एक ही घोषणा करती हैं कि ईश्वर निराकार है.

ईरान के इन प्रदर्शनों में कुछ लोगों के हाथ में पोस्टरों पर लिखा था कि हम आर्यन है शायद इस्लामी कट्टरता से ऊबे हुए लोग अपने मूल धर्म की मांग भी कर रहे हैं. कहा जाता है आज से तीन हजार वर्ष पूर्व ईरानी अपने को आर्य कहते थे. अवेस्ता में भी उन्हें आर्य कहकर पुकारा गया है. प्रसिद्ध ईरानी सम्राट् दारा (521-485 ई.पू.) ने अपनी समाधि पर जो शिलालेख अंकित करवाया है उसमें अपने को आर्यों में आर्य लिखा है. छठी शताब्दी के ईरानी के सासानी सम्राट भी अपने को आर्य कहते थे. ईरानी देश को आर्याना या आईयाना कहते थे, जिसका अर्थ है आर्यों का निवासस्थान प्रचलित ईरान शब्द इसी आर्याना का अपभ्रंश है.

इससे साफ हैं कि आर्यों के बाद इस्लाम के आगमन से पहले ईरानी पारसी रहे थे. छठी शताब्दी के बाद यहाँ इस्लाम आया और ईरान की जनता पर इस्लाम की परम्पराओं का बोझ डाल दिया गया. शाशन की सभी धार्मिक और राजनीतक शक्तियां अन्य इस्लामिक राष्ट्रों की तरह मौलवियों के इशारों पर चल पड़ी. इसके बाद 70 के दशक के अंत में इस्लामी धर्मगुरु अयातुल्ला खामनेई के नेतृत्व हुआ, जिसे ईरानी क्रांति भी कहा जाता हैं. इस क्रांति से धार्मिक इमाम अयातुल्ला खामनेई को सत्ता मिली लेकिन वर्षो से घुटन भरी संस्कृति में जकड़े ईरानी समुदाय को क्या मिला? बस महिलाओं को बुर्का-हिजाब और पुरुषों को दाढ़ी और टोपी या इसे दुसरे शब्दों में कहे तो इस्लामिक कानून शरियत?

इसी वजह से हाल के प्रदर्शनों से घबराई ईरानी सरकार ने वहां अंग्रेजी भाषा को प्रतिबंधित किया गया क्योंकि ईरानी सरकार को यह भी डर हैं कि सड़कों पर धार्मिक आजादी मांग रहे लोगों के बीच पश्चिमी भाषा के साथ मेलजोल उनकी संस्कृति के प्रति विरोध का भाव पैदा कर रही है उनका मानना हैं कि अमेरिकी संस्कृति का भाषाई में प्रवेश ईरान में हो रहा है और अयातुल्ला खामनेई की नजर में यह खतरा है.

ईरान इस्लामी गणराज्य है, जिसने हिजाब को एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया है. क्या इस्लाम से जुड़े लोग महिलाओं के खुले केश और शरीर से इतने पागल हो जाते हैं कि उन्होंने महिलाओं के कपड़ों को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए हैं? यदि अपनी सोच दुरुस्त कर लेते तो शायद इतने खर्चीले कानून बनाने की जरूरत न होती. दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या ईरानी समाज अनिवार्य हिजाब से दूर रहने के लिए तैयार है या ऐसा करने से क्या महिलाओं को सड़क के उत्पीड़न और हिंसा में वृद्धि होगी? शायद महिलाओं को यह तय करने के लिए खुद तैयार करें कि क्या पहनना है और स्वयं को सुरक्षा के लिए खुद को कैसे कवर किया जाए. हालाँकि ईरान के सुधारकों और सत्ता के केन्द्रों के बीच शुरुआती धर्मिक विभाजन शुरू हो गया हैं ईरानी लेखक होसेन वाहदानी ने कहा हैं युवाओं को तानाशाही से इस जमीन की मुक्ति की चाबी रखने का यह प्रयास कितना गौरवशाली और सार्थक होगा अब इसका फैसला युवा ही करेंगे. आखिर कब तक 1400 सौ वर्ष पहले बने कानूनों से आज के आधुनिक युवा और महिलाएं हांके जायेंगे?..राजीव चौधरी

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