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राजनेताओं के मुखौटे से शर्म और सम्मान का उतरता परदा

Posted On: 8 Aug, 2017 Others में

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हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास पर चंडीगढ़ में आईएएस अधिकारी की बेटी वर्णिका कुंडू का पीछा करने और छेड़खानी के आरोप के बाद देश के राजनेताओं के चेहरे से शर्म और सम्मान के पर्दे की खींचतान जारी है. घटना 4 अगस्त की है. वर्णिका की शिकायत पर पुलिस ने तब विकास समेत दो आरोपियों को गिरफ्तार किया था. मगर जमानत पर जल्द रिहा कर दिया गया.


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इसके बाद मीडिया ट्रायल शुरू हो गया और हरियाणा से शुरू हुई प्रधानमंत्री मोदी की मुहीम ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ पर सवालिया निशान भी उठने शुरू हो गये हैं. हालाँकि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने रविवार को आरोपी लड़के के पिता सुभाष बराला का बचाव करते हुए कहा कि बेटे के कृत्य के लिए पिता को सजा नहीं दी जा सकती. यह सुभाष बराला नहीं, बल्कि एक अन्य व्यक्ति से जुड़ा मामला है, इसलिए उनके बेटे के खिलाफ कदम उठाया जाएगा.


मामला कितना बड़ा-छोटा या फिर सच्चा या झूठा है, यह अभी कहा नहीं जा सकता. मगर राजनीति की शालीनता में एक पूर्व प्रसंग यहाँ रखना जरूरी है कि लालबहादुर शास्त्री जी उत्तर प्रदेश में मंत्री थे. तब एक दिन शास्त्री जी की मौसी के लड़के को एक प्रतियोगिता परीक्षा के लिए कानपुर से लखनऊ जाना था. गाड़ी छूटने वाली थी, इसलिए वह टिकट न ले सका. लखनऊ में वह बिना टिकट पकड़ा गया. उसने शास्त्री जी का नाम बताया. शास्त्री जी के पास फोन आया. शास्त्री जी का यही उत्तर था, हाँ… है तो मेरा रिश्तेदार, किन्तु आप नियम का पालन करें.


मगर शर्म और सम्मान का जो पर्दा राजनेताओं को अपनी पनाह में लेकर सम्मान देता आया है, उसे आज तार-तार किया जा रहा है. पूरी बेशर्मी के साथ कहा जा रहा है कि पिता का बेटे की करतूतों से क्या लेना-देना? अगर ऐसा है तो हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला को खुद अपनी तरफ से चंडीगढ़ पुलिस के कमिश्नर को पत्र लिखकर कहना चाहिए था कि उनके बेटे ने जो कारनामा किया है, उसका ताल्लुक उनके राजनीतिक पद से किसी भी तरह न जोड़ा जाये. वही किया जाये जो वर्णिका के बयान के मुताबिक कानून कहता है.


मगर इसके उलट विकास की जल्दी जमानत होना, सोशल मीडिया के माध्यम से पीडि़ता के चरित्र पर तरह-तरह के सवाल उठाये जाना, यानि खराब चरित्र के सहारे लड़की को कमजोर किये जाने का प्रयास सा होता दिख रहा है. मीडिया पूरे मामले में संजय और राजनेता धृतराष्ट्र की भांति दिखाई पड़ रहे हैं.


जिस तरह बराला परिवार और भाजपा समर्थकों ने इस युवती के खिलाफ पोस्ट करना शुरू किया, साथ ही राज्य की आईएएस एसोसिएशन और मुख्य सचिव ने अपने किसी सहयोगी की बेटी के साथ हुए ऐसे घटनाक्रम से दूरी बना रखी है,  क्या ये उस खेल की शुरुआती चेतावनी है, जो हर बार खेला जाता है. हालाँकि रेप या छेड़छाड़ का आरोप लगाना बेहद आसान है, अक्सर झूठे मामले उजागर भी होते हैं. मगर जिन पर आरोप लगाया जाता है, वर्षों तक उनके दामन पर दाग तो रहता ही है. साथ में परिवारजनों का सर भी शर्म से झुक जाता है. दिल्ली निर्भया कांड के बाद हम जिस तरह के माहौल में रह रहे हैं, वह सच में डरावना है. जैसे ही रेप या छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज होती है, शोर मचने लगता है.


वैसे इसके पीछे गलती इन लोगों की नहीं है. गलती है समाज की उस मानसिकता की जो ये निर्धारित कर चुकी है कि अगर कोई लड़की किसी लड़के पर रेप या छेड़छाड़ का इल्जाम लगाती है, तो वो सच ही होगा. पर एक दूसरा वर्ग भी है जो हर एक घटना के बाद यह कहता आसानी से मिल जाता है कि लड़कियां तो झूठे आरोप ही जड़ना जानती हैं, ऐसा क्यों?


गौरतलब है कि ऐसे मामलों में आंख बंद कर महिलाओं पर विश्वास करने की कई वजहें हैं, जिनमें से एक वजह महिलाओं को कमजोर समझा जाना है. इसके अलावा हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ जिस तरह से हिंसात्मक मामले बढ़ते जा रहे हैं, उस वजह से भी इन मामलों को सच्चा मान लिया जाता है. वैसे मैं आपको बता दूं कि इन इल्जामों का खामियाजा सिर्फ उन पुरुषों को ही नहीं भुगतना पड़ता, जो इन आरोपों का शिकार बनते हैं, बल्कि उन महिलाओं को भी भुगतना पड़ता है, जो सच में छेड़छाड़ पीड़िता होती हैं.


मगर वर्णिका-विकास मामले में कुछ सवाल भारतीय कानून व्यवस्था के सामने हाथ से फैलाये खड़े दिख रहे हैं. यदि किसी कारण इस मामले में आरोपी युवक कोई आम नागरिक होता, तो क्या तब भी प्रसाशन उसे तुरंत जमानत देकर रिहा कर देता? दूसरा सवाल यह है कि यदि यहाँ लड़की कोई आम गरीब परिवार की बेटी होती, तो क्या तब भी यह मामला इतना उछलता? शायद सबका जवाब ‘ना’ होगा, क्योंकि रोज न जाने कितने मामलों में पीडिता की शिकायत पर पुलिस छेड़छाड़ के आरोपियों को उठक बैठक लगवाकर थाने से ही छोड़ देती है. लेकिन इस मामले को मीडिया और विपक्ष पूरी तरह समाज में परोसकर पब्लिसिटी स्टंट करता दिख रहा है.


हो सकता है दो-चार दिन बाद जाँच रिपोर्ट सामने आये व मामला कुछ और निकले. कुछ दिल्ली की जसलीन कौर की तरह कह रहे हैं, जिसमें उसने सर्वजीत नामक युवा पर आरोप लगाया था, बाद में खुद एक प्रत्यक्षदर्शी ने भी इस मामले में बयान देकर जसलीन के आरोप को गलत बताया था. या फिर हरियाणा की दो सगी बहनों की तरह, जिन्हें मीडिया ने एक दिन में झाँसी की रानी बता दिया था और इसी खट्टर सरकार ने उनके लिए इनाम राशि की तुरंत घोषणा की थी. हालाँकि बाद में आरोप निराधार पाए गए. यह भी हो सकता है वर्णिका के आरोप सच हों, लेकिन राज्य सरकार के दबाव में सबूत मिटाकर केस को कमजोर किया जाये. कुछ भी हो सकता है, लेकिन एक बात सत्य है कि देश के राजनेताओं के मुखौटे से शर्म और सम्मान का परदा उतरता जरूर दिखाई दे रहा है.

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