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सबरीमाला मंदिर विवाद, कितनी आस्था कितना षड्यंत्र

Posted On: 3 Jan, 2019 Others में

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2 जनवरी की सुबह हर रोज की तरह ठंड थी पर अचानक माहौल तब गरमा गया जब ये खबर आई कि केरल के सबरीमाला मंदिर में भारी विरोध के बीच 50 वर्ष से कम उम्र की दो महिलाओं ने प्रवेश कर इतिहास रच दिया। बिंदु और कनकदुर्गा नाम की इन दो महिलाओं ने आधी रात को मंदिर की सीढ़ियां चढ़नी शुरू की और मुंह अँधेरे भगवान के दर्शन किए. इसके बाद बढ़ते विवाद की आशंका को देखते हुए मंदिर को अगले 2 दिन के लिए बंद कर दिया गया है।

पिछले काफी समय से सबरीमाला मंदिर विवाद देश की सुर्खियाँ बना हुआ है। जिसमें आस्था हैं, कोर्ट और महिलाएं हैं, दिखने में तो ये इस मुद्दे के मूल विषय है, लेकिन इसमें राजनीति और षड्यंत्र से भी इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि मन्दिर में अन्दर जाने का आन्दोलन चला कौन रहे है? रेहाना फातिमा नाम की मुस्लिम महिला और रोज मैरी नाम की ईसाई महिला। महिलाओं के प्रवेश के नाम पर चल रहे इस मंदिर में ऐसा क्या है कि ईसाई और इस्लाम धर्मों को मानने वाले तथाकथित विचारक भी मंदिर में घुसने को लालायित हैं?

इसके लिए सबसे पहले केरल का धार्मिक संतुलन समझना होगा और इस बात से शायद कोई अनजान नहीं होगा कि सत्तर के दसक से ईसाई और इस्लाम के मानने वाले के लिए धर्मांतरण की सबसे उपजाऊ जमीन बनी हुई है। धर्मांतरण की जमीन में सबरीमाला मंदिर सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ खड़ा है। इसलिए इस मामले को ऐसे समझिये कि मंदिर में प्रवेश पाने के पीछे नीयत धार्मिक नहीं, बल्कि यहां के लोगों की मंदिर के प्रति सदियों पुरानी धार्मिक आस्था परम्परा को तोड़ना है। इस कारण बार-बार नये तमाशे लेकर स्थानीय लोगों की आस्था को चोट पहुंचाने का काम चल रहा है। कारण सबरीमला उन मंदिरों में से हैं जहाँ जातीय भेदभाव नहीं है। इस मंदिर के रिवाज अनूठे और अलग है, यहां दर्शन के दौरान भक्त ग्रुप बनाकर प्रार्थना करते हैं। एक दलित भी इस प्रार्थना को करवा सकता है और अगर उस समूह में कोई ब्राह्मण है तो वह भी उसके पैर छूता है।  इस जाति विहीन व्यवस्था का नतीजा है कि इलाके के दलितों और आदिवासियों के बीच मंदिर को लेकर अटूट आस्था है और यही आस्था इन धर्मांतरण के खिलाफाओं के रास्ता का काँटा बनी हुई है।

बताया जाता है कि यहाँ जब कोई दीक्षा लेता है तो उसे स्वामी कहा जाता है। यानी अगर कोई रिक्शावाला दीक्षा ले तो उसे रिक्शेवाला बुलाना पाप होगा इसके बजाय वो स्वामी कहलायेगा। इस परंपरा ने एक तरह से सामाजिक क्रांति का रूप ले लिया। मेहनतकश मजदूरी करने वाले और कमजोर तबकों के लाखों-करोड़ों लोगों ने मंदिर में दीक्षा ली और वो स्वामी कहलाये।

ये तो थी आस्था अब षड्यंत्र ये है कि मंदिर के बाहर मुस्लिम महिलाएं कतार में खड़ी है, जिन्हें इस्लाम के आरंभिक काल से मस्जिद में जाने की इजाजत नहीं है वे मंदिर में जाने का अधिकार मांग रही है। क्योंकि वह जानती है कि मंदिर प्रसाशन इसकी अनुमति देगा नहीं और आसानी से यह सन्देश सभी जगह चला जायेगा कि भगवान अयप्पा में कोई शक्ति नहीं है और वो अब अशुद्ध हो चुके हैं। अगर सबरीमला की इस पुरानी परंपराओं को तोड़ दिया गया तो धर्मांतरण करने वाली मिशनरियां अपना प्रचार आसानी से कर सकेगी। इस वजह से इस मामले में स्पष्ठ रूप से राजनीति और एक षड्यंत्र से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि पेशे से पत्रकार कविता जक्कल, मुस्लिम विचारक रेहाना फातिमा, और मैरी स्वीटी यदि सच में महिलाओं के हक की बात करने वाली है तो क्यों नहीं अभी तक किसी मस्जिद के द्वार मुस्लिम महिलाओं के लिए खटकाये?

यह कोई नई साजिश नहीं है बताया जाता है कि 80 के दशक में 1980 में सबरीमला मंदिर के प्रांगण में ईसाई मिशनरियों ने रातों रात एक क्रॉस गाड़ दिया था। फिर उन्होंने इलाके में परचे बांट कर दावा किया कि यह 2000 साल पुराना सेंट थॉमस का क्रॉस है इसलिये यहां पर एक चर्च बनाया जाना चाहिये। यही नहीं सबरीमाला मन्दिर की एक मान्यता यह भी कि मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा करने वालों को मकर संक्रांति के दिन एक विशेष चंद्रमा के दर्शन होते हैं और इस दिन यहाँ श्रद्धालुओं का बड़ा भारी जमावड़ा भी होता है। इसी की देखा-देखी इन धर्मांतरण की फसल काटने वालें ने सबरीमला मंदिर के आसपास चर्च में भी मकर संक्रांति के दिन फर्जी तौर पर ‘चंद्र दर्शन’ कार्यक्रम आयोजित कराए जाने लगे।

आज सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद भी यह इतना बड़ा मसला इसलिये बना दिखाई दे रहा है क्योंकि वो समझ रहे हैं कि इस पूरे विवाद की जड़ में नीयत क्या है। इसलिए यह लोग बार-बार इस मुद्दे को उबालकर गर्म रखना चाहते हैं। सबरीमाला मंदिर विवाद सिर्फ मंदिर और महिलाओं तक सीमित नहीं हैं इसका दायरा राजनीति और षड्यंत्र तक फैलता है जो लोग आज इस मामले में टीवी पर बैठकर आस्था से तर्क करना चाहते है तो उन्हें समझना होगा कि कुछ आस्था में तर्क-वितर्क नही चलते, क्योंकि यदि एक भी दिन टीवी पर खुलकर तर्क-वितर्क  हुआ तो शायद इस्लाम, ईसाई से जुड़े बुद्धिजीवी एक भी तर्क के सामना नहीं कर पाएंगे।

हालाँकि मैं सबरीमाला मंदिर के पुजारियों की इस हट से सहमत नहीं हूँ कि 10 से 50 वर्ष के बीच महिलाएं अपवित्र होती है क्योंकि सौ अपराध करके भी कोई आदमी अगर अपवित्र नहीं और मंदिर जा सकता है तो कोई लड़की सिर्फ़ माहवारी की वजह से कैसे अपवित्र हो जाती है? मंदिर के पुजारियों को अपने तर्क बदल लेने चाहिए। हाँ यदि महिलाएं मंदिर में स्वयं ही आने की इच्छुक नहीं है और जो सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बावजूद भी अपनी किसी श्रद्धा के कारण मंदिर ने नहीं जाना चाहती उन पर दबाव बनाया जाना भी गलत हैं। राजीव चौधरी 

 

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