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निरीह पशुओं का कत्ल यह कैसी आस्था!

Posted On: 15 Jan, 2019 Others में

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यूरोप में पशु वध के मुस्लिम और यहूदी तरीकों पर एक जनवरी से प्रतिबंध प्रतिबंध लागू कर दिया गया हैं. बेल्जियम के पशु अधिकार समूह के ग्लोबल एक्शन के निदेशक एन डी ग्रीफ ने जोर देकर कहा है कि आस्था के नाम पर पशु वध का मुस्लिम और यहूदी तरीका एकदम अमानवीय है. जीव अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ता लंबे समय से इस कानून की मांग कर रहे थे, लेकिन यहूदी और इस्लामिक नेता इसे उदारवादी एजेंडे की आड़ में धार्मिक आस्थाओं पर हमला बता रहे हैं.

इस कानून के विरोध में बेल्जियम की सड़कों पर यहूदी और इस्लाम के मानने वाले प्रदर्शन कर अपना विरोध जता रहे है लेकिन वहां की सरकार अभी अपने इस फैसले पर अडिग दिखाई दे रही है. सरकार का कहना है कि लोग आस्था और धर्म के नाम पर मध्य युग में रहना चाहते हैं लेकिन बेल्जियम में कानून धर्म से ऊपर है और वह उसी तरह रहेगा.

मुझे नहीं पता इस कानून से उनकी धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता कितनी प्रभावित हो रही है. लेकिन यह जरुर पता है कि आस्था, परम्परा और मजहब के नाम पर निरीह पशुओं दर्दनाक मौत जरुर दी जा रही हैं. इसके लिए स्वस्थ पशुओं का चुनाव किया जाता है इसके बाद मुस्लिम हलाल और यहूदी कोषेर नियमों के अनुसार जानवरों को तड़फा-तड़फाकर मारते हैं.

जबकि उत्सव कोई भी हो उसका उद्देश्य होता है एक साथ खुशियां मनाना. लेकिन कुछ उत्सव ऐसे भी हैं जिनमें परम्पराओं के नाम पर पशुओं के साथ खुले आम बर्बरता दिखाई जाती है. मजहब, आस्था और अल्लाह के नाम पर सबसे बड़ी कुप्रथा का नाम है कुर्बानी जिसमें प्रतिवर्ष करोड़ों निरीह जानवरों के साथ क्रूरता की सारी हदें लांघ दी जाती है और अंधी आस्था में डूबे लोग इसे त्यौहार का नाम देते हैं.

ऐसे ही एक उत्सव नेपाल के देवपोखरी बड़ी ही धूम-धाम और संवोदनहीन होकर मनाया जाता है. यहां संवेदनाएं सिर्फ छोटे मासूम बच्चों की आंखों में दिखाई देती हैं, जो बेजुबान जानवर के साथ हो रही क्रूरता का मंजर हर साल अपनी आंखों से देखते हैं. हालाँकि नेपाल के गढ़ीमाई मंदिर में दी जाने वाली लाखों पशुओं की बलि पर रोक लग गई है. जिसे संवेदना के स्वयं गढ़ीमाई मंदिर ट्रस्ट ने आगे बढ़कर इस क्रूर प्रथा पर रोक लगाई थी इस मंदिर में हर पांचवें साल में होने वाली पूजा में लाखों पशुओं की बलि दी जाती थी.

सालों पहले भारत में भी कुछ मंदिरों में पशु बलि प्रथा का रिवाज था जो अब कानून के माध्यम से रोक दिया गया है. अंधविश्वास में घिरे लोगों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि का प्रयोग किया जाता  था. लेकिन हिन्दू धर्म से जुड़ें कुछ विचारक और आर्य समाज जैसी संस्थाओं के घोर विरोध के कारण आज यह प्रथा ना मात्र को ही शेष बची है यदि कहीं बची भी है तो खुले तौर पर इसे नहीं मनाया जाता हैं.

भारत समेत पूरे विश्व में मानवीय संवेदनाओं को किनारे कर इस्लाम और यहूदी मत से जुड़े लोग आज भी इसकी वकालत करते दीखते हैं. जबकि ये बर्बर थी और बर्बर ही है. ईश्वर के नाम पर किसी का ख़ून बहाने के बजाय किसी को ख़ून देना, कहीं ज्यादा पवित्र काम है. ईश्वर के नाम पर अपना रक्तदान करना न सिर्फ मानवीय है, बल्कि इससे आप किसी की जान बचा सकते हैं.

किन्तु इसके उलट बकरीद पर बहुत से जानवरों को बहुतायत में मारा जाता है, और उन्हें खाया भी जाये यह जरूरी नहीं. बहुत से ऊंटों की भी कुर्बानी दी जाती है और आप सोच सकते हैं कि आस्था के नाम पर यह व्यापार कितना बड़ा होता होगा. जानवरों के कल्याण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस परंपरा के चलते जानवरों को कत्ल के समय असहनीय दर्द सहना पड़ता है जबकि धार्मिक नेताओं का कहना है कि परंपरागत तरीके में भी जानवरों को कोई दर्द नहीं होता.

मुस्लिम और यहूदी धर्म के धार्मिक नेता हमेशा इस तरह के तरीके को स्वीकार नहीं करते हैं और इसे ईश्वर का कानून समझते है क्या कोई तार्किक व्यक्ति यह स्वीकार कर सकता है कि ईश्वर अपने बनाए जीवों की हत्या का आदेश देंगा? बेशक धर्म के नाम पर जानवरों की बलि देना एक प्राचीन परंपरा रही है, लेकिन निर्दयी रिवाजों को ख़त्म करने का काम तो अब तो सभी को मिलकर करना चाहिए. लोगों को स्वयं विचार करना चाहिए कि जो परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं, पर ये किस समय और किस उद्देश्य से बनाई गई थीं,  कम से कम इस पर बहस से तो शुरूआत की ही जा सकती है.

आज तार्किक बहस कर समाधान खोजना चाहिए. धर्म और पूजा में निस्वार्थ भाव, शांति और मानवता ही सिखाई जाती है. यदि उसके किसी क्रिया कलाप में दानवता है तो क्या वहां धर्म होगा? मानवता को जिंदा रखने का नाम धर्म है, फिर चाहे आप किसी भी मत या पंथ को क्यों न मानते हों. दया और स्नेह से बेहतरीन कोई कर्म नहीं होता, अगली बार जब किसी जानवर की हत्या कर किसी परम्परा या प्रथा को निभाने का मन हो तो चाकू पहले अपनी अंगुली पर चलाकर देखिये यदि दर्द का अहसास हो तो फिर उस निरीह पशु की आंखों में देखिये वह आपको अलग-अलग तरह से अपनी आंखों आभार  व्यक्त कर रहा होगा. कम से कम इतना मानवीय व्यवहार तो अपने अन्दर सिमित रखिए कि अब पशुओं को भी यूरोप की तरह अदालतों की ओर देखना न पड़ें..

 

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