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सादगी की मिसाल पंडित मोती लाल नेहरु– Biography of Pandit Motilal Nehru

Posted On: 6 May, 2012 Others में

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motilal nehruजब देश अपनी आजादी के लिए जद्दोजहद कर रहा था उस समय देश को एक ऐसे नेता की जरूरत थी जिसके अंदर नेतृत्व के साथ-साथ संगठन को चलाने की भी क्षमता हो. स्वतंत्रता आंदोलन में पंडित मोती लाल नेहरु के योगदान को कभी नहीं नकारा जा सकता. अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व से मोती लाल नेहरु ने ब्रिटिश शासन की कई छोटी-बड़ी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित किया. आइए इस महान नेता को आज उनकी जयंती के उपलक्ष्य में याद करते हैं.


भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पिता और देश के एक अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी पंडित मोतीलाल नेहरु  (Pandit Motilal Nehru) को उनकी सादगी और समय के साथ चलने की प्रवृत्ति के लिए याद किया जाता है. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में मोतीलाल नेहरू एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल अपनी जिंदगी के सभी सुखों को देश के लिए भुला दिया बल्कि अपने परिवार को भी देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया. पश्चिमी सभ्यता और रहन-सहन से काफी प्रभावित होने वाले मोतीलाल नेहरु ने अपने जीवन में सादगी को ही अधिक प्राथमिकता दी. महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद मोतीलाल नेहरु ने कांग्रेस के साथ काम करना शुरु किया और धीरे-धीरे देश की माटी के रंग मे रंगते चले गए. मोतीलाल नेहरु के जीवन में गांधीजी ने बहुत असर छोड़ा था. देश के बड़े वकील होने के बाद भी वह गरीबों की मदद के लिए कभी पीछे नहीं रहते थे.


मोतीलाल नेहरु (Motilal Nehru) का जन्म दिल्ली में 06 मई, 1861 को हुआ था. पं. मोतीलाल नेहरू के पिता पंडित गंगाधर नेहरू थे जो एक कश्मीरी पंडित थे. पंडित गंगाधर नेहरू के तीन पुत्र थे. सबसे बड़े पंडित बंसीधर नेहरू थे, जो भारत में विक्टोरिया का शासन स्थापित हो जाने के बाद तत्कालीन न्याय विभाग में नौकर हो गए. उनसे छोटे पंडित नंदलाल नेहरू थे. इन दो पुत्रों के अतिरिक्त तीसरे पुत्र पंडित मोतीलाल नेहरू थे. पंडित नंदलाल नेहरू ने ही अपने छोटे भाई मोतीलाल का पालन-पोषण किया और पढ़ाया-लिखाया.


अपने समय के चोटी के वकीलों में शुमार पंडित मोतीलाल नेहरु का मन पढ़ाई लिखाई में कम लगता था. बी. ए. की परीक्षा को बीच में छोड़कर वह ताजमहल की सैर करने चले गए थे, जिसकी वजह से बी.ए. पास नहीं कर पाए. लेकिन बाद में उन्हें  कैंब्रिज विश्वविद्यालय की तरफ से बार एट लॉ (Bar at law) के लिए चुन लिया गया.


लॉ की डिग्री लेने के बाद शुरूआत में उन्होंने कानपुर में वकालत की. वकालत के शुरुआती दिनों में उन्हें बहुत सफलता मिली और उनकी जान-पहचान उच्च अंग्रेजी हुकूमत से होने लगी.


मोतीलाल नेहरु पश्चिमी सभ्यता से बहुत प्रभावित थे. जिस समय सिर्फ कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगरों के लोगों ने पश्चिमी फैशन को नया-नया पसंद किया था उस समय मोतीलाल नेहरु ने कानपुर जैसे छोटे शहर में नए फैशन को अपनाकर एक तरह की क्रांति पैदा कर दी थी. भारत में जब पहली ‘बाइसिकल’ आई तो मोतीलाल नेहरू ही इलाहाबाद के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बाइसिकल खरीदी थी.


मोतीलाल 1918 में महात्मा गांधी के प्रभाव से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रभाव में आए और गाँधी जी से प्रभावित होकर देशी भारतीय जीवन शैली अपनाकर अपने जीवन को बदलने की पहल गई. अपने बड़े परिवार और परिवार के खर्चों को पूरा करने के लिए नेहरू कभी-कभी क़ानून के अपने व्यवसाय को अपनाते थे. बाद में उन्होंने परिवार के लिए ‘स्वराज भवन’ बनवाया. मोतीलाल नेहरू ने ‘स्वरूप रानी’ नामक एक कश्मीरी ब्राह्मण कन्या से शादी कर ली.


पंडित मोतीलाल की क़ानून पर पकड़ काफी मजबूत थी. इसी कारण से साइमन कमीशन के विरोध में सर्वदलीय सम्मेलन ने 1927 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई जिसे भारत का संविधान बनाने का दायित्व सौंपा गया. इस समिति की रिपोर्ट को ‘नेहरू रिपोर्ट’ के नाम से जाना जाता है. इसके बाद मोतीलाल ने इलाहाबच्द उच्च न्यायालय आकर वकालत प्रारम्भ कर दी.


मोतीलाल 1910 में संयुक्त प्रांत(वर्तमान में उत्तर प्रदेश) विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए. अमृतसर में 1919 के जलियांवाला बाग गोलीकांड के बाद उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी वकालत छोड़ दी. वह 1919 और 1920 में दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. उन्होंने ‘देशबंधु चितरंजन दास’ के साथ 1923 में ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया. इस पार्टी के जरिए वह ‘सेन्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली’ पहुंचे और बाद में वह विपक्ष के नेता बने. असेम्बली में मोतीलाल ने अपने क़ानूनी ज्ञान के कारण सरकार के कई क़ानूनों की जमकर आलोचना की. मोतीलाल नेहरू ने आज़ादी के आंदोलन में भारतीय लोगों के पक्ष को सामने रखने के लिए ‘इंडिपेंडेट अख़बार’ भी चलाया.


अपने बच्चों और देश के विकास के लिए मोतीलाल नेहरु ने हमेशा से शिक्षा पर जोर दिया. अपने बच्चों को किसी तरह की कमी ना हो इस बात का उन्होंने पूरा ख्याल रखा. उनके ही अच्छे संस्कारों का नतीजा था जो उनके बड़े बेटे पंडित जवाहरलाल नेहरु आगे चलकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने.


देश की आजादी में विशेष सहयोग देने वाले मोतीलाल नेहरू का निधन 6 फरवरी 1931 को लखनऊ में हुआ था. आज उनकी जयंती पर यह ब्लॉग उनको समर्पित है.


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