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वीरता और साहस की मिसाल – गुरु तेग बहादुर

Posted On: 18 Apr, 2012 Others में

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भारतीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अनेक धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से मिलकर बनी है. धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर अत्याधिक भिन्नता होने के बावजूद भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां सभी धर्मों को बराबर मान-सम्मान और अधिकार दिए गए हैं. लेकिन पहले ऐसा नहीं था क्योंकि तब अधिकार केवल जंग और शहादत पर ही निर्भर होते थे. यही वजह है कि यहां समय-समय पर विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा आक्रमण और जीत दर्ज की जाती रही. अंग्रेजी हुकूमत आने से पहले यहां राजकीय स्थिरता जैसी कोई बात नजर नहीं आती थी. पंथ की स्थापना के लिए आक्रमण और अतिक्रमण जैसे माहौल के बीच यहां शासन की बागडोर संभाली जाती थी. लेकिन जब धर्म के नाम पर मरने-मिटने की बात आती है तो सिख समुदाय का नाम हमेशा ही सम्मान के साथ लिया जाता है. सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर ऐसी ही एक शख्सियत हैं जिन्होंने सिख धर्म के सम्मान को बरकरार रखने के लिए अपनी जान की भी कोई परवाह नहीं की.


guru teg bahadurगुरु तेग बहादुर का जीवन


गुरु हरगोविन्द सिंह के पांचवें पुत्र, गुरु तेग बहादुर का जन्म अमृतसर (पंजाब) में हुआ था. सिखों के आठवें गुरु ‘हरिकृष्ण राय’ जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा गुरु तेगबहादुर को गुरु बनाया गया था. गुरुतेग बहादुर के बचपन का नाम त्यागमल था. 14 वर्ष की छोटी सी आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया था. उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेगबहादुर (तलवार के धनी) रख दिया.


संत समाज के शिरोमणि – संत तुकाराम


धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेगबहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की. गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया. आनंदपुर साहब से रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुंचे. इसके बाद गुरु तेगबहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहां उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक विकास के लिए कई कार्य किए. गुरु तेग बहादुर जी ने रूढ़ियों, अंधविश्वासों की घोर आलोचनाएं की और विभिन्न आदर्श स्थापित किए. सामाजिक हित में कार्य करते हुए उन्होंने कई कुएं खुदवाए और धर्मशालाएं बनवाई.


सिख धर्म के सम्मान के लिए हो गए कुर्बान


औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था. एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन-किन श्लोकों का अर्थ राजा को नहीं बताना. पंडित के बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया. गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगजेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि उसे अपने धर्म के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी.


औरंगजेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया और संबंधित अधिकारी को यह कार्य सौंप दिया. औरंगजेब ने कहा, “सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें.” औरंगजेब के जुल्मों से त्रस्त आकर कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार ‍इस्लाम को स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएं दी जा रही हैं और उनसे अपने धर्म को बचाने की गुहार लगाई.


तत्पश्चात गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगजेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग बहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे’. औरंगजेब ने यह स्वीकार कर लिया.

गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं गए. औरंगजेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेगबहादुर जी नहीं माने तो उन पर ज़ुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेगबहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने. उन्होंने औरंगजेब से कहा – ‘यदि तुम ज़बरदस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए’.


guru teg bahadur शीशगंज साहिब की स्थापना


औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया. उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु तेग बहादुर जी ने हंसते-हंसते बलिदान दे दिया. गुरु तेग बहादुर जी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है.


गुरु तेग बहादुर जी द्वारा रचित बहुत सी कृतियां ग्रंथ साहब के महला 9 में संग्रहित हैं. इन्होंने शुद्ध हिन्दी में सरल और भावयुक्त ‘पदों’ और ‘साखी’ की रचनाएं की हैं.


भारत के महान क्रांतिकारियों की दास्तां


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