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संत शिरोमणि कवि रविदास

Posted On: 18 Feb, 2011 Others में

Special Daysव्रत-त्यौहार, सितारों के जन्म दिन, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के घोषित दिनों पर आधारित ब्लॉग

महत्वपूर्ण दिवस

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भारत में सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में संतों का बहुत अहम योगदान रहा है. संतों ने अपनी वाणी और उपदेशों से समाज में एकता, सद्भावना और प्रेम फैलाने का कार्य किया है. चाहे मीरा हों या कबीर सबने समाज को सही मार्ग पर आगे बढ़ने की राह दिखाए. संत कवि रविदास ने भी इसी तरह समाज में कार्य करके शिरोमणि स्थान पाया. संत रविदास ऐसे महान संतों में थे जिन्होंने कर्म को ही पूजा मानकर ईश्वर को पाने का रास्ता बताया.


bhagatravidasसंतकवि रविदास ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया. संत कुलभूषण कवि रैदास यानी सं‍त रविदास का जन्म सन् 1398 में काशी (उत्तर प्रदेश, भारत) में हुआ था. हालांकि संत रविदास की सही जन्मतिथि आज तक विद्वानों के अध्ययन-अनुसंधान का विषय बनी हुई है, किंतु कुछ शोधकर्ताओं ने इस महापुरुष की जन्मतिथि माघी पूर्णिमा बताई है और तदानुसार माघ मास की पूर्णिमा में इनकी जयंती बडी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है.


बचपन से ही रविदास साधु प्रकृति के थे और ये संतों की बड़ी सेवा करते थे. इस कारण इनके पिता रघु इन पर अक्सर नाराज हो जाते थे. इनकी संत-सेवा में सब कुछ अर्पित कर देने की प्रवृत्ति से क्रुद्ध होकर इनके पिता ने इन्हें घर से बाहर कर दिया और खर्च के लिए एक पैसा भी नहीं दिया. हालांकि इससे रविदास के स्वभाव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने जूते सिलकर अपना जीवन यापन करना शुरु किया. संत कवि रविदास का दयालु और भक्ति भाव हमेशा बना रहता था.


रविदास का कहना था कि कर्म के बिना भक्ति अधूरी है. एक समय की बात है – एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे. रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो उन्होंने अपने शिष्‍य से कहा- गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का वचन मैंने दे दिया है. यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो मेरा वचन भंग हो जाएगा. गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मेरा मानना है कि अपना मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है. अगर मन सही है तो इस कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है.


संत कवि रविदास स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे. उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं. वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है.


रविदास के आदर्शों और उपदेशों को मानने वाले ‘रैदास पंथी’ कहलाते हैं. संत कवि रविदास को कवि के साथ एक महान समाज सुधारक भी कहा जाता है. “गजानन भन्ते ने मन चिर होई तो कोउ न सूझे, जाने जीवन” गीत प्रस्तुत कर भेदभाव भूलकर समान आचरण की सीख दी.


संत रविदास 120 वर्ष तक धरा पर अध्यात्म का प्रकाश देने के बाद ब्रह्मपद में लीन हो गए किंतु उनकी अमृतवाणी आज भी हमारी पथ-प्रदर्शक है. उन्होंने सच ही कहा है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा. शुद्ध चित्त में ही ईश्वर का वास हो सकता है. ईश्वर की प्राप्ति सच्चे मन और सत्कर्मो से ही संभव है.

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