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विजय माल्या: शाही मिजाज और रंगीला अंदाज है इनका

Posted On: 18 Dec, 2013 Others में

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एक बार एक यॉट (नौका) में एक बिजनेसमैन ने पार्टी आयोजित किया था. उस पार्टी में बड़े-बड़े लोग शामिल हुए. जब सभी लोग पार्टी का मजा ले रहे थे तब नीचे डेक में वह बिजनेसमैन आने वाले किसी कारोबारी सौदे की तैयारी कर रहा था. यह बिजनेसमैन कोई और नहीं भारत के मशहूर राजनेता, सहारा फोर्स इंडिया, रॉयल चैलेंजर्स, मॅक्डोवेल, मोहन बागान और किंगफिशर, ईस्‍ट बंगाल किन स्‍पोर्टमैन के मालिक विजय माल्‍या है. माल्या की खासियत है कि वह बिजनेस से जुड़े हर पहलू की बारीकियों पहले समझते हैं फिर उसपर दांव लगाते हैं. हालांकि किंगफिशर एयरलाइन के मामले में उनका दांव असफल रहा था.


vijay mallya18 दिसंबर 1955 को जन्में विजय माल्या ने छोटी सी उम्र में ही खुद के अंदर कारोबारी समझ विकसित कर ली थी. महज 30 साल की उम्र में ही माल्या ने यूबी ग्रुप को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी कंपनी बना दिया था. यूबी या यूनाइटेड ब्रिउरी ग्रुप की स्थापना उनके पिता विट्टल माल्या ने की थी. यूबी समूह, शराब (बीयर) और मादक पेय उद्योग पर विशेष ध्यान देने वाली कई अलग-अलग कंपनियों का एक विस्तृत समूह है. किंगफिशर ब्रांड इसका एक भाग है जो बीयर बनाती है.


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शाही मिजाज

पहली नजर में विजय माल्या को देखने वाले लोग उन्हें एक ऐसे अय्यास की संज्ञा देते हैं जो रे-बैन चश्मे और भारी, महंगे गहने पहनने तथा फॉर्मुला वन और क्रिकेट जैसे खेले को काफी पसंद करता है. देर रात पार्टी में मौज मस्ती करना और  स्पीडबोट में खूबसूरत महिलाओं के साथ दिखने वाले विजय माल्या की छवि लोगों के दिलो-दिमाग में बस गई.


किंगफिशर का संकट

अपनी तड़क-भड़क भरी जीवन शैली के लिए पहचाने जाने वाले उद्योगपति विजय माल्या पिछले दो साल से किंगफिशर एयरलाइन के वित्तीय संकट की वजह से काफी विवादों में रहे हैं. 2004 में गठित हुई किंगफिशर एक समय भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनी थी लेकिन एयरलाइन के खर्चे इतने ज्यादा थे कि यह उंचाई ज्यादा दिन तक टिक न सका. कहा जाता है कि यात्रियों को अपनी ओर खींचने के लिए किंगफिशर द्वारा एक अलग तरह की स्ट्रैटिजी अपनाई थी जिसके तहत फूड से लेकर इन-केबिन एंटरटेनमेंट और एयर होस्टेस में ज्यादा से ज्यादा से खर्च किया गया. किंगफिशर का खर्च प्रति पैसेंजर जेट एयरवेज के मुकाबले लगभग दोगुना था.


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किंगफिशर एयरलाइंस में परोसे जाने वाले खाने का खर्च प्रति यात्री 700-800 रुपये था, जबकि जेट में यही खर्च 300 रुपये प्रति पैसेंजर था. खर्च में कटौती के मोर्चे पर माल्या बुरी तरह असफल रहे. शुरुआत में तो माल्या और उनकी कंपनी किंगफिशर की स्ट्रैटिजी कामयाब रही लेकिन जैसे-जैसे कंपनी का खर्च बढ़ता गया जिसमें 2008 के बाद अचानक कच्चे तेल के दाम में बढ़ोतरी भी शामिल है. उससे कंपनी का आर्थिक संकट भी बढ़ गया था. वित्तीय संकट से गुजरने के बाद आखिरकार 2012 में किंगफिशर का लाइसेंस रद्द कर दिया गया. आज किंगफिशर एयरलाइंस पर कुल 7,000 करोड़ रुपये का कर्ज है.


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