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मासूम नस्ल को वो बन के खरपतवार खा गए(कविता)

Posted On: 22 Dec, 2014 Others में

CHINTAN JAROORI HAIजीवन का संगीत

deepak pande

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जो बिखेरे थे फ़िज़ाओं में चन्द नफरतों के बीज
मासूम नस्ल को वो बन के खरपतवार खा गए
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क़त्ल और वहशियत को धर्म कहने लगे हैं लोग
धर्म को सियासत औ धर्म के ठेकेदार खा गए
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सड़कों में तड़पती रही वो औरत की नग्न देह
करके आबरू उसकी गिद्ध तार तार खा गए
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सुचना तंत्र में संस्कार की अब दिखती नहीं झलक
विज्ञापन औ चलचित्र, अश्लीलता के संसार खा गए
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पैरों से कुचले जाना ही जिनका होता रहा है ह्स्र
गुलशन को वो फूल बन के आज खार खा गए
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इस पार जो कहलाते हैं सौदागर मौत के
वज़ीर बन के आज वो उस पार आ गए
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सिखाया था जिसको बेरहमी से क़त्ल करने का हुनर
वो मिटा के आज उसका खुद का ही परिवार खा गए

दीपक पाण्डेय
नैनीताल

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