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मेरी माँ (कांटेस्ट)

Posted On: 18 Mar, 2017 Others में

CHINTAN JAROORI HAIजीवन का संगीत

deepak pande

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आज जब इस शीर्षक पर कुछ कहानी लिखने को आमंत्रित किया गया तो मैंने बड़ी गहनता से विभिन्न स्त्रियों के बारे में सोचा जिन्होंने देश और समाज के लिए अनवरत संघर्ष किया मगर अंत में इसी निर्णय में पहुँचा कि मेरी नज़रों में सबसे महत्वपूर्ण नारी मेरी माँ है जिसने हमारे पालनपोषण में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया और सही ही तो है देश और समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्त्री माँ ही तो है चाहे वह किसी भी इंसान क़ी माँ हो ये माँ शब्द ही पूरे समाज और देश की नींव है यहां पर मैं अपनी माँ के संघर्ष को एक कविता के रूप में बयान करना चाहूंगा

मेरी माँ (कविता)
आज जब बेटा मेरा पाठशाला से आया
माँ को तुरंत माँ दिवस पे प्रपत्र थमाया
ये देख अपनी माँ का मुझे ख्याल है आया
सारी उम्र जो संघर्ष करती ही रही
दुश्वारियों से सदा जो लड़ती ही रही
अब तक अपनी माँ को समझ पाया ही नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
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लेने सब्ज़ी जब भी अम्मा जाती थी बाजार
आँखों में उन चार बच्चों के होता था इंतज़ार
वो चार आने की नमकीन भी होता था त्यौहार
माँ की थकान से किसी को भी न था सरोकार
माँ तुमने अपने आप कुछ भी खाया या नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
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जब सुबह के वक़्त बनते थे परांठे
दो ही महज़ हर एक के हिस्से में आते
तीसरा परांठा उन्हें क्यूँ नहीं मिला
शिकवा यही रहा सदा रहा यही गिला
माँ तूने एक भी परांठा खाया या नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
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समय गुज़रा धीरे धीरे बच्चे बड़े हुए
शिक्षा के भी कुछ नए स्तम्भ खड़े हुए
चक्र चला विकास का ज्यों ज्यों समय कटा
त्यों त्यों माँ के शरीर से गहना भी घटा
अपने श्रृंगार को माँ तूने कुछ बचाया या नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
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खुश हो जाती माँ जब भी राखी के दिन आते
उन दिनों वो बच्चे कुछ ज्यादा ही पाते
अपनी खातिर माँ ने कभी किया नहीं चर्चा
भाई से मिले धन को भी बच्चों पर ही खर्चा
अपने लिए माँ तूने कुछ बचाया या नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
…………………………………………….
राशन की दूकान से वो गेंहूँ का लाना
काँधे पे रख लेजा उसे चक्की पे पिसाना
मुनिस्पलिटी के नल से वो पानी का लाना
जरूरत से ज्यादा वो अपने तन को जलाना
बच्चों को मदद को कभी बुलाया या नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
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माँ तकदीर तेरी तुझसे सदा रुष्ट ही रही
फिर भी न जाने क्यूँ, तू संतुष्ट ही रही
धीरे धीरे जब ग़मों की धुंध छंट गयी
बदल गया समय मुफलिसी भी हट गयी
न जाने अपने ही आप में गुमशुदा तू हो गयी
समय से पहले ही इस जहां से विदा तू हो गयी
तुझको न दे सका कोई , कुछ तूने पाया ही नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
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अपने में रही गुमसुम कुछ भी न कहा
एक रोज़ गरम मोज़े बेटे को लाने को कहा
सोचा था बड़े होकर वो सब कुछ दिलाएगा
माँ ही चले गयी अब ये किसको बताएगा
सुख सारे तुझको देने का उसको जूनून था
बस मोज़े ही दे पाया ये ही सुकून था
कोई तेरे लिए कुछ भी कर पाया ही नहीं
ज़हन में ये ख्याल कभी आया ही नहीं
…………………………………………….
दीपक पाण्डेय
जवाहर नवोदय विद्यालय
नैनीताल

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