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शहीद सिपाही ,नक्सलवाद और बुद्धिजीवी (कविता)

Posted On: 12 Mar, 2014 Others में

CHINTAN JAROORI HAIजीवन का संगीत

deepak pande

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बरसोँ से इन जंगलोँ मेँ पल रहे थे नक्सली

मेहनत की आग मेँ हर पल जल रहे थे नक्सली

अपने भविष्य को स्वयं सजा रहे थे नक्सली

जिन हाथोँ से अन्न उपजा रहे थे नक्सली

उन्हीँ हाथोँ मेँ कैसे मौत के हथियार हो गये

मासूमोँ की नस्ल के कत्ल के गुनाहगार हो गये

इन जंगलोँ मेँ अपनी ही पनाह मेँ थे नक्सली

धीरे ही सही तरक्की की राह मेँ थे नक्सली

मदद को इनके कोई न सलाहकार था

दीखता न तब कोई भी मानवाधिकार था

जबसे कर्म इनके लाशोँ के व्यापार हो गये

मासूमोँ की नस्ल के कत्ल के गुनाहगार हो गये

मासूमियत छोड़ कर ये अब दरिंदे बन गए

देशभक्तों की मौत के बाशिंदे बन गए

हर बुद्धिजीवी इनसे सहानुभूति का तलबगार है

आज इनके साथ भी ये मानवाधिकार है

आज इनके पक्ष में हर एक की दलील है

इनके साथ खड़ा बड़े से बड़ा वकील है

वो सिपाही वतन की खातिर जो क़ुर्बान हो गया

क्या कोई मीडिया उसके घर कि देहरी तक गया

वो माँ जिसने इस आहुति में अपना बेटा खो दिया

जिस पत्नी का सारा यौवन वतन की खातिर सो गया

जिस बच्चे के लिए बाप का भी साया हट गया

जिस बहिन की राखी का हर धागा सिमट गया

केह दो बुद्धीजीवियों से न यूं चर्चा और भ्रमण करें

जाकर उन शहीदों के घर पर नमन करें

उस माँ ,बहन कि खातिर ये कवी बोल रहा है

छोड़ कर श्रृंगार लहू को लबों से तौल रहा है

आज हर देशवासी से करता आह्वान है

कोई तो बताये इसका क्या निदान है

अब भी न सम्भाले तो ऐसा वक़्त आएगा

शहीदों के लहू का दाग हर एक घर तक जाएगा

अब और कितनी मासूम मौतो के गवाह बनेंगे

वतन के सिपाही के कत्ल के पर्याय बनेँगे

कोसेँगे न अँधेरे को स्वयं ही दीप जलायेँगे

अपने आप को राजनीती का न मोहरा बनायेँगे

मासूमोँ की नस्ल के कत्ल के गुनाहगार हो गये

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