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बिहार चुनाव के मायने :लोग अंधे नहीं है...

Posted On: 4 Jan, 2011 Others में

अंधेरगर्दीआम आदमी का दर्द ......

दीपक पाण्डेय

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बिहार चुनाव एक झोका नहीं बल्कि तूफान बन कर आया और परिणाम ने बड़े बड़े दिग्गजों को हिला कर रख दिया . मेरी समझ में इस चुनाव के अर्थ निम्न है…

राजद + लोजपा — लोजपा तो खैर २००४ में ही बाहर हो गयी थी . जनता ने उसे किंग maker बना के भेजा पर वो एक मुस्लिम (??) को मुख्यमंत्री बनाए के नाम पर चाबी जेब में धरे रह गए . अरे भाई मुस्लिम से ऐतराज़ किसीको नहीं है पर तुम प्रोजेक्ट तो करो . जैसे नेहरु गाँधी परिवार का नवजात भी कांग्रेस का आला बन ने की योग्यता रखता है क्या वैसी योग्यता हर मुस्लिम में जन्मजात आ जाएगी की वो बिहार का कायाकल्प कर दे.
खैर ये तो पुराणी बात है. नई बात तो ये थी की उन्हों ने “हम क्या करेंगे” ये छोड़ कर सुशाशन की हवा निकलने की कोशिश की . अरे भाई दुनिया बिहारी को कितना भी गंवार का पर्यायवाची बनाने की कोशिश करे . लोग अंधे नहीं है.

कांग्रेस (युवराज)- ये आये तो गरीबो के घर का खाना खा के दिखाने लगे. की तुम जैसे हो वैसे ही ठीक हो हम लोग तुम्हे अछूत नहीं मानते. हम तुम से अलग नहीं है. पर गरीबी कैसे हटे इसका क्या उपाय है ये नहीं बताया. फिर वही बात “लोग अंधे नहीं है”.

सबसे हास्यास्पद दावा तो माया वती जी ने किया. उन्होंने कहा की हम बिहार को यूपी जैसा बना देंगे. जवाब आया ” माफ़ करना बहन जी , हमारे बिहार में रहने को जगह नहीं है मुर्तिया कहा लगोगे. श्पष्ट है ..”लोग अंधे नहीं है”..

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