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नौटंकी - जारी है, अब हर रविवार

Posted On: 8 Apr, 2015 Others में

सीधा, सरल जो मन मेरे घटासागर में एक बूँद

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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कड़क… कड़क…के, कड़क… कड़क…के, कड़क… कड़क…के, कडमड… कडमड .. कडम …… कडमड… कडमड .. कडम (नगाड़े की आवाज गूंजती है)

सुनो सुनो सुनो ….. कान फाड़ के सुनो… डमडम डीगा बरसात और उसके जम्हूरे प्यारे कनखजूरे की ज़ुबानी सुनो……. सुनो सुनो सुनो… हमारी जुबानी सुनो…….

कड़क… कड़क…के, कड़क… कड़क…के, कड़क… कड़क…के, कडमड… कडमड .. कडम …. कडमड… कडमड .. कडम ….. कडमड… कडमड .. कडम

जम्हूरा:– हाँ तो उस्ताद, डमडम डीगा बरसात

उस्ताद:- बोल बे जम्हूरे .. मेरे प्यारे कनखजूरे

आप सोच रहे होगे ये क्या बकवास है…… डमडम डीगा बरसात और कनखजूरा … ये क्या ववाल है….

जम्हूरा:- दरअसल ये हमारे असल नाम नहीं है… और आप असल जानकार करेंगे भी क्या?

उस्ताद:– अबे … चुप कर, असल तो अब ना नसल हैं और ना आदमी की शक्ल है … नाम तो वो पुकारो जिसमे कोई झंकार हो, रिदम हो, सुर हो, ताल हो….

जम्हूरा:- ताल है तो माल है, येही आज का हाल है,

उस्ताद:- और हुजूर, हम दोनों के परिवार के पापी पेट सॉरी पेटों का सवाल है….

जम्हूरा:– उस्ताद , डमडम डीगा बरसात…. एक सवाल है, उत्तर मिलेगा…

उस्ताद:- अबे कनखजूरे, कमबख्त जम्हूरे… उस्ताद मैं हूँ और सवाल तू पूछेगा .. दो कौड़ी के इंसान… अपनी हैसियत पहचान ….

जम्हूरा:- नाराज न हों उस्ताद, डमडम डीगा बरसात… माना तुम वी.वी.आई.पी. खास हो, और मैं आम हूँ जिसे तुम चूसते हो… पर ये न भूलो उस्ताद…. तुम्हारे लिए वक़्त नाजुक है, नरम है, क्योंकि ये चुनाव का मौसम है….. soochnaa:- यह नौटंकी की सीरीज अब आपकी नज़र होगी हर रविवार

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