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मेरी कविता - रेल की दो टिकटें

Posted On: 18 May, 2010 Others में

सीधा, सरल जो मन मेरे घटासागर में एक बूँद

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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अथाह भीड़,
रिजर्वेशन
और टिकटें.

सदैव दो टिकटें
होती हैं
मेरी जेब में.

एक टिकट
परदेस से प्रिय तक
सफ़र कराती है,
तुमसे मिलाती है.
दूसरी
विरह की
आग सुलगाती है
विछोह के दर्द की
टीस को जगाती है
दूर,
तुमसे दूर ले जाती है.

दोनों टिकटों का फर्क
तुम्हारी आँखों में देखता हूँ.
इसीलिये
दूसरी टिकट को मैं
तुमसे छिपाकर रखता हूँ.

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