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मौत के डब्बे

Posted On: 14 Dec, 2010 Others में

सीधा, सरल जो मन मेरे घटासागर में एक बूँद

दीपक कुमार श्रीवास्तव

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दीवाली का दिन याने खुशियाँ मनाने का दिन. अंधियारा दूर कर जगह-जगह दीपक जलाने का दिन. ऐसे में एक घर का चिराग सरकार के लापरवाह कारिंदों की करतूतों के कारण बुझ गया. मुरादाबाद में दिल्ली रोड पर जगह-जगह ऐसे मौत-कूप देखे जा सकते हैं. इन्ही में से एक डब्बा किसी युवक की मौत का कारण बन गया. ऐसे ना जाने कितने घरों में अन्धकार फैलाने में जाने-अनजाने इन लापरवाह सरकारी सेवकों का योगदान होता ही रहता है. यह सरकारी मौत के डब्बे जगह जगह उ.प्र. के शहरों पर बिखरे मिल जायेंगे. वैसे तो इन डब्बों का प्रयोजन सफाई के निमित्त कूड़ा इकट्ठा करना है परन्तु कूड़ा अक्सर इनसे बाहर चारों तरफ विखरा ही रहता है. सडको पर रखते समय ये भी ध्यान में नहीं रखा जाता है कि ये किसी दुर्घटना का वायस बन सकते हैं. दूसरे मौत के चलते फिरते डब्बे जुगाड़ हैं. इनका ना तो कोई पंजीकरण होता और ना इनको चलाने वाले प्रशिक्षित चालक. हाई-वे पर ये कब प्रकट हो जाएँ, कोई भरोसा नहीं. ना इन पर लाईट होगी और ना रिफ्लेक्टर. इसी तरह बिना रिफ्लेक्टर भूसा-गाड़ियां भी हाई-वे पर दुर्घटनाओं के कारक होते हैं. इन पुरातन युगीन बैलगाड़ियों से किस घर का दीपक बुझ जाए कहा नहीं जा सकता. पता नहीं कब इन पर पूरी तरह रोक लग सकेगी और कब कूड़े के डब्बे सड़क से हटाकर सही जगह रखे जायेंगे. आखिर कब उत्तर प्रदेश का नाम लेने पर लोगों के मन में ये विचार नहीं आयेंगे की उ.प्र. का कुछ नहीं हो सकता.
जगह-जगह बिखरे हैं
यमदूत के मेहमान हैं ये,
झाँक के देखो,
लापरवाहों के गिरहबान हैं ये,
काम शहर का कूड़ा बटोरना है पर,
बीच सड़क खड़े हैवान हैं ये.

कभी भी प्रकट हो सकते हैं ये,
किसी की भी जिन्दगी गटक सकते हैं ये,
नाम इनका जुगाड़ है यारों क्योंकि,
सड़कों पर टहलते साक्षात,
बेवक्त मौत के जुगाड़ हैं ये.

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