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आँखे ऐसी भी.................

Posted On: 25 Apr, 2016 Others में

deepti saxenamake your own destiny

DEEPTI SAXENA

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ज़िंदगी में हार मानना सबसे आसान होता हैं, कमियों की दुहाई देना बहुत आसान होता हैं .कोई भी इंसान अपने आप में परिपूर्ण नहीं होता, हम सबमे कोई न कोई कमी होती हैं और इंसान में कोई न कोई खूबी भी ज़रूर होती हैं, जैसे ज़ोहरी को हीरे की परख होती हैं. सुनार को सोने की, वैसे ही ज़िंदगी भी अपनी ही कसौटी पर आदमी को परखती हैं, कुछ लोग ज़िंदगी की मुसीबतों से घबराते नहीं हैं. कुछ लोग हर हाल में एक खुशहाल और आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, वास्तव में एक “हैप्पी इंडिया” उनमे बसता हैं? क्योकि कुछ लोगो में ही होती हैं आम से ख़ास बनने की चाहत ? एक उड़ान भरने की चाहत.
हैदराबाद अपने आप में एक बहुत खूबसूरत शहर हैं, निज़ामों का शहर , देश की सांस्कृतिक धरोहर का शहर , चारमीनार और हुसैन सागर हैदराबाद की खूबसूरती में चार चाँद लगते हैं, तो गोलकुंडा किला यहाँ की विरासत हैं,
वैसे कुछ ऐसा भी हैं इस शहर में जिसे जानकर आपको सिर्फ शहर पर ही नहीं बल्कि यहाँ के लोगो पर भी गुमान होगा , यहाँ का इनऑर्बिट मॉल और वहां का एक ख़ास रेस्टोरेंट “डाइलोग इन दा डार्क ” जहां सिर्फ अँधेरा हैं , वहां रोशनी की एक किरण भी नहीं हैं, रेस्टोरेंट जाते ही आपको सारा सामान , पर्स मोबाइल फ़ोन कैमरा सब कुछ एक लॉकर में रखवा दिया जाता हैं , आपके पास लॉकर की चाबी होती हैं और कोई सामान नहीं . रेस्टोरेंट में जाने से पहले काउंटर पर आपकी पसंद शाकाहारी खाना , या नॉन वेज खाना आपसे पूछ लिया जाता हैं , काउंटर पर ही आप बिल पे कर देते हैं .
उसके बाद आप रेस्टोरेंट में जाते हैं , जहां बिलकुल अँधेरा हैं वहां आपको गाइड करते हैं रेस्टॉरेंट के एम्प्लाइज वो आपको आपकी टेबल चेयर तक लेकर जाते हैं . टेबल चेयर पर जब आप हो हाथो से छु कर महसूस कीजिए आपको उतनी ही सफाई महसूस होगी जितनी और रेस्टॉरेंट में होती हैं. रेस्टोरेंट में कितने ही गेस्ट क्यों न हो यह काम करने वाले किसी को टकराने नहीं देते, उनके काम में आप निपुणता को दिखिए आपकी टेबल पर खड़े रहकर आपको गाइड करते हैं की कहा क्या रखा हैं, आपको टेबल पर टिशू , चम्मच , फोक सब कुछ मिलता हैं, पानी के लिए वाटर बॉटल आपके हाथ में मिलती हैं, उसके बाद आपको खाना सर्व किया जाता हैं आपकी पसंद का वेज या नॉन वेज.
आपकी थाली में क्या क्या होगा वो आपको बताया जाता हैं? रेस्टोरेंट की टीम में से ही आपको कोई एक गाइड करता हैं वेज थाली में कौन कौन सी डिश हैं, और नॉन वेज थाली में कौन कौन सी डिश हैं. अँधेरे में खाना खाना यह बिलकुल अलग अनुभव होता हैं. कुछ ऐसा जो आपने पहले कभी महसूस न किया हो. खाने को खुशबू से पहचाना वास्तव में एक हुनर ही तो हैं जिसकी परख आप इस “रेस्टोरेंट ” में ज़रूर कर पाएंगे. हमें बचपन से सिखाया जाता की अगर सब्र हो तो काम अच्छा होता हैं, आप खाना बिना देखे कितनी अच्छी तरह से खा सकते हैं, इसकी परख आपको यहाँ पर होगी .
जब आप खाना खा लेते हैं उसके बाद आपकी टेबल को क्लीन कर दिया जाता हैं, आपको बोल्स सर्व किये जाते हैं ताकि आप हाथ धो सके , उसके बाद आपको मीठा खिलाया जाता हैं , और जैसे की आप बिल पहले ही दे चुके हैं. सिर्फ यह कहना होता हैं की हमने खाना खा लिया अब हमें रेस्टॉरेंट से बाहर जाना हैं, कोई टिप नहीं लेते वो आपसे . आपको बाहर लेकर आते हैं.
गेट पर आते ही जहां थोड़ी रौशनी हैं वहां वो पूछते हैं आपसे आपके अनुभव के बारे में, और आप से आप का फीडबैक मांगते हैं, हमारी तरह सब उनसे एक ही सवाल पूछते हैं की वो अपना काम इतनी अच्छी तरह से कैसे कर लेते हैं? वो सिर्फ एक बात कहते हैं की उनकी “मेहनत” और लगन और वो आँखों से देख नहीं सकते ?
सच कितना अलग हैं यह रेस्टोरेंट जो ज़िंदगी जीना सिखाता हैं, रेस्टोरेंट से निकलते समय हमें एहसास हुआ की वासतव में कितनी ख़ुशी और जोश से वो सब लोग अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ कर रहे थे? हमें एहसास भी नहीं हुआ की जो अँधेरे में हमें गाइड कर रहा हैं , रास्ता दिखा रहा हैं वो आँखो से देख नहीं सकता? कभी सोचा हैं हमने की जब “भगवान्” ज़िंदगी का एक रास्ता बंद करता हैं , तो दूसरे की उम्मीद ज़रूर देता हैं. आप कभी समय निकाल कर इस रेस्टोरेंट में ज़रूर जाइए ? जहां लोग आपसे किसी दया की उम्मीद नहीं रखते ?
वास्तव में यह हैं सच्चे नागरिक जो मुश्किलों की नहीं ज़ज़्बे की बात करते हैं? उनकी कमी के बारे में हमें पता भी नहीं चला. ज्यादातर रेस्टोरेंट में हम सब टिप देकर आते हैं , पर यह लोग आपसे किसी दया की उम्मीद ही नहीं करते ? यह तो बस आपको ज़िंदगी का एक अलग अनुभव सिखाते हैं ? कुदरत ने इन्हे आँखे नहीं दी तो क्या पर ज़िंदगी ज़ीने का सलीखा तो दिया हैं. क्या आपने कभी सोचा हैं ? की भगवान् को तो किसी ने नहीं देखा न सुना न महसूस किया पर फिर भी हम अपनी हर मुराद हम उस तक पहुंचाते तो
हैं न.
ठीक वैसे ही आँखो से न दिखाई दे तो कोई बात नहीं . पर ज़िंदगी में कभी भी अंधे बनकर न जिये ? क्योकि अकसर धोखा आँखो के होते हुए भी मिलता हैं . इस रेस्टोरेंट को देख यहाँ खाना खाने के बाद आपका नज़रिया ज़रूर बदलेगा ?
अगर कभी भी इस ज़िंदगी में थोड़ा भी मौका मिले . तो इन् अनमोल पलों को महसूस ज़रूर कीजिए.

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