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माँ

Posted On: 5 May, 2016 Others में

deepti saxenamake your own destiny

DEEPTI SAXENA

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हमारे देश में माँ को भगवान का दर्ज़ा दिया जाता हैं. कहा भी जाता हैं की की भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने माँ को बनाया, माँ बच्चे की पहली दोस्त और गुरु होती हैं, बच्चे का रिश्ता माँ के साथ कैसा हैं इसको शब्दों में बया नहीं किया जा सकता, औलाद की सलामती के लिए हमारे देश में ना जाने कितने ही व्रत रखे जाते हैं, हम सब बड़े होने के बाद यदि इस भागदौड़ की ज़िंदगी में कुछ पलो के लिए अगर सोचे तो शायद सबसे प्यारा हम सबको बचपन ही लगेगा , बचपंन जिसमे होती हैं माँ की लोरिया , कहानिया और शायद ऐसी शैतानियाँ जो माँ को परेशान तो बहुत करती हैं , पर बच्चे को खुश देख माँ भी खुश हो जाया करती हैं ,
आजकल टेक्नोलॉजी के इस युग में जब सब कुछ साइंटिफिक हैं, और बहुत कुछ बदल भी गया हैं, शायद रिश्ते तो वही हैं पर सोच नयी हैं. नयी लहर या कहे तो नयी उमंगो के साथ आज कल हर दिन ख़ास हो गया हैं, पहले टीवी पर होली दिवाली दशहरा और ईद की धूम रहती थी, आजकल मदर्स डे , फ्रेंडशिप डे , वैलेंटाइन्स डे की धूम रहती हैं. वैसे पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे मन हमारी आत्मा सबको छूया हैं, और शायद यही हमारी संस्कृति की पहचान भी हैं ” संवेदनशीलता , अपनापन , जो समय के साथ खुद को बदलती हैं, क्योकि “परिवर्तन ” ही प्रकृति का एक मात्र नियम हैं.
माँ शायद इस धरती पर कुदरत का एक अनमोल नगीना हैं, क्योकि शायद हमारी खुद की पहचान भी हमें माँ से ही मिलती हैं, माँ का दर्ज़ा कितना महान हैं , यह इसी बात से पता चलता हैं की चाहे वो मरयपुरुषोतम “राम ” हो या फिर इसु मसीह या कोई भी अवतार धरती पर जन्म सब माँ की कोख से ही लेते हैं . कृष्णा की बाल लीला हम सब जानते हैं, कृष्णा माँ यशोदा की आँखों का तारा थे , स्वयं कृष्णा को भी सुकून अपनी माता की गोद में ही मिलता था.
भुज में आये भूकम्प में जब मलवा हटाकर लोगो को बचाया जा रहा था, तो एक नवजात अपनी माँ के हाथो में सुरक्षित था, जबकि माँ अपनी आँखे बंद कर चुकी थी, ऐसा ही कुछ सुनामी के आने पर भी हुआ था. अंडमान आज भी सुनामी के कहर को नहीं भुला हैं, एक छोटी सी कुटिया में एक माँ अपने तीन छोटे बच्चो को टोकरी में लिए पेड पर बैठी रही , वो बुरी तरह घायल थी खून उसके शरीर से बह रहा था पर वो बच्चो को देख मुस्कुराती रही , उसने तब तक बच्चो का साथ नहीं छोड़ा अपनी आँखे नहीं मूंदी जब तक बच्चो को बचाने उन्हें वहां से निकलने के लिए कोई आ नहीं गया. सच माँ बनकर एक औरत कितनी “शक्तिशाली” कितनी निडर और कितनी सहासी हो जाती हैं , यह हम सोच भी नहीं सकते . पूत कपूत सुने हैं पर “माता सुनी न कुमाता “.
वेदो में शास्त्रों में माँ को सम्मान देना उनकी सेवा को किसी पूजा से कम नहीं माना जाता . उम्मीद का दिया होता हैं माँ का दामन , हमारे “प्रधान मंत्री ” नरेंद्र मोदी जी ने भी प्रधान मंत्री के पद को सँभालने से पहले अपनी माँ का आशीर्वाद लिया. माँ को सम्मान सिर्फ किसी एक दिन से नहीं दिया जा सकता . माँ तो दिल में बस्ती हैं और अगर माँ के प्रति सम्मान और लगाव हो तो किस्मत अपने दरवाज़े खुद ही खोल देती हैं. चाहे वो महात्मा गांधी हो या फिर महाराणा प्रताप . सबने अपनी कामयाबी का श्रेय अपनी माता को ही दिया हैं. स्वयं लक्ष्मी बाई भी अपनी पीठ पर बेटे को बांध किले से खुद गयी और अंग्रेज़ो से लोहा लिया, माँ का प्रेम पंक्तियों में बांधा नहीं जा सकता .
इसलिए अपने जीवन में आप कितने ही बड़े क्यों न बन जाये कभी अपनी ज़मीन को, अपनी जड़ों को न भूले बरगद का पेड कितना भी ऊचा क्यों न हो ? पर अपनी जड़ों से कभी अलग नहीं होता, और माँ को खुश करना सबसे आसान होता हैं क्योकि माँ कुछ नहीं चाहती वो तो सदा ही अपनी बाहे फैलाकर अपने बच्चो को सुकून और सदा ही बच्चो को हिम्मत का एहसास कराती हैं.
इसलिए दुनिया ही हर माँ को “हैप्पी मदर्स डे” ज़ो जीवन में खुद से ज्यादा दूसरे के लिए सोचे, अपने प्यार त्याग और समपर्ण के बदले कुछ न चाहे ऐसी मिसाल सिर्फ माँ की ही दी जा सकती हैं. हैं न?? आप खुद ही सोचिये ???????????????

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