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कहना है तुमसे

Posted On: 22 May, 2012 Others में

कहना हैकई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

RAJEEV KUMAR JHA

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Eyes

नयन खुले अधखुले

सहमी सहमी है हवाएं

पलकों पर बोझिल

बेरहमी सपनों की


लहरे लहरे केशों की

बिखरी परिभाषा

अधरों पर सुर्ख हो रही

अतृप्त मन की आशा


कहना है कुछ सुनना है कुछ

आई है बारी

हवा कुंवारी सौन्दर्य पर्व की

ठहर गई मतवारी

उठा नहीं पाते जो

झुकाते हैं पलकें

मिला नहीं पाते हैं अब

अपने आप से ही नजरें

बंधते जा रहे हैं

मेरे ही अल्फाजों में

सिमटते जा रहे हैं

मेरे ही अहसासों में


दूर क्षितिज नीलांचल फैला

अपनी बांह पसारे

जीवन नौका पर बैठे हैं

मंजिल हमें निहारे


कितने ही तूफ़ान घिरे

पर कभी न हिम्मत हारा

अरूणिम संध्या और उषा से

संगम हुआ हमारा

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