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कितना अच्छा लगता है

Posted On: 9 Apr, 2012 Others में

कहना हैकई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

RAJEEV KUMAR JHA

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Kitna Achcha Lagta hai

    कितना अच्छा लगता है
    यूँ अनायास मिलना
    दुनियाँ के गलियारों में
    साथ-साथ फिरना


अभी छू गई है
पुरवाई गालों को
दे गया चुनौती कौन
दर्द के उबालों को

    दहलीज को चूम रहे
    आँगन अमलतास के
    उधेड़ दो न अब घूंघट
    क्षणजीवी प्यास के


कितनी भारी है
आँखों का सूनापन
सोया सा लगता है
सांसों का सूनापन

    मन से टकराता है
    ऐसे सन्नाटा
    कंठ में चुभे जैसे
    सेही का कांटा


पोर पोर में सरसों फूली
आँखें रसमसाती
मधु अतीत की सुगंध पीकर
पांखें कसमसाती

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