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साज कोई छेड़ो

Posted On: 11 Jun, 2012 Others में

कहना हैकई बार बहुत कुछ कहने का मन करता है.लेकिन शब्द नहीं मिलते.कागज कोरे ही रह जाते हैं.शब्द जब लेखनी के रूप में ढलता है तो इस ब्लॉग के रूप में प्रकट होता है.

RAJEEV KUMAR JHA

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साज कोई छेड़ो
गीत नया गाने दो
बहुत तनहा है ये दिल
आज उसे बह जाने दो

प्यार की ये नजर
अब इधर मोड़ दो
बंधा जिससे मैं
युगों युगों से हूँ
किस तरह प्रीत का
वो डोर न तोड़ दो

इक नशा था
वो वक़्त भी था
मेरे घर का
तुम पर तारी था

जा रहे हो
ये भी वक्त है
मेरी गली से
नजरें चुरा के

ये अहसास न होता
गर तेरी जुदाई का
तुमसे प्यार न होता
इस कदर बेइंतिहा

आज फिर कोई माहताब
रोशन हुआ है
चिलमन की ओट से
उसने नकाब उल्टा है

बहती है उसके जिस्म से
खुशबू की इक नदी
लगता है कहीं फिर
खिल गए ताजा गुलाब फिर

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