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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस-समानता ही समाधान

Posted On: 7 Mar, 2013 Others में

बोलती चुप..जब कुछ कहने को दिल करे ...

deveshsharma

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस-समानता ही समाधान
संभवत: इस  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारत की राजधानी दिल्ली में दुष्कर्म की शिकार निर्भया और तालिबानी सोच की शिकार मलाला की चर्चा अवश्य होगी। इन दोनों ही के साथ जो हुआ वह कहीं न कहीं महिलाओं के उठते स्वर को मद्धम करने केप्रयासों का ही एक रूप था। इन घटनाओं ने यह जताया है कि दृढ़ चट्टान सी पुरुषवादी मानसिकता में परिवर्तन ऊपरी सतह पर तो दिखाई देते हैं लेकिन वह चट्टान पूर्णत: पिघली नहीं है। जहां तक बात अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक घटना के रूप में निर्भया केसाथ हुए दुष्कर्म पर चर्चा की परम्परा अवश्य निभाई जायेगी, आलोचनाएं भी होंगी और समाधान भी सुझाये जाएंगे और इससे अधिक की आशा की भी नहीं जा सकती। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकविकसित राष्ट्र की घटना को इतना ही ‘फुटेजÓ मिल सकता है। वैसे भी इस प्रकार के सारे दिवस विशेष चर्चा को ही समर्पित होते हैं। परंतु सवाल यह है कि क्या हम भी इस दिवस को चर्चा को ही समर्पित करेंगे ?
हमारा देश जहां यह घटना घटित हुई है और उसकी पुनरावृत्ति भी कई घटनाओं के रूप में निरंतर चल रही है क्या वो इस घटना को चर्चा से आगे कहीं लेकर नहीं जायेगा? एक बार अवश्य सोचिए कि इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को क्या हम राष्ट्रीय निर्भया दिवस के रूप में व्यतीत करेंगे? ध्यान रहे कि दिवस पर्व की परम्परा के निर्वाह से विपरीत होना चाहिए है यह निर्भया दिवस। इसके लिए हमें एक पूरा दिन पूरी ईमानदारी से अपने घरों में, अपने घरों केआसपास, अपने मन और मस्तिष्क को इस बात केलिए समर्पित करना होगा कि हम सुन सकें हमारे आसपास की प्रत्येकनिर्भया के अनसुने स्वर को।
एक संघर्ष जिसकी सीमा नहीं
भारत में निर्भया के नाम पर हमारा राष्ट्र एकअल्पावधि के लिए ही सही परंतु एक संघर्ष का साक्षी बना है। सोशल मीडिया तक सीमित कहे जाने वाले युवा वर्ग ने इस संघर्ष में भागीदारी दिखाकर यह सिद्ध किया किवे राष्ट्र की व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं और इसके लिए वह मात्र सोशल मीडिया पर चर्चा नहीं आंदोलन और संघर्ष भी कर सकते हैं, आंसू गैस और वॉटर केनन के प्रहार भी झेल सकते हैं।
कड़े कानून एवं महिला की सुरक्षा की व्यवस्था मांग करने वाला यह आंदोलन ऊपर से देखने में युवाओं का आंदोलन प्रतीत हुआ परंतु इस आंदोलन की नींव में लम्बे समय से चले आ रहे महिला आंदोलन भी रहे हैं। महिला आंदोलन चलाने वाली संस्थाएं इस घटना के साथ और मुखर हुईं। सोशल मीडिया पर भी इस आंदोलन को समर्थन मिला, मीडिया भी अपनी सकारात्मक भूमिका में था उसकेफायदे और नुकसान से परे जो सराहनीय कार्य मीडिया ने किया वह है मंच प्रदान करना। मीडिया के मंच पर चर्चाएं  हुईं और चर्चाओं से आम लोगों ने इस घटना को सिर्फ घटना के रूप में नहीं बल्कि एक महिलाओं की स्वतंत्रता की  सुरक्षा के विषय के  रूप में समझा।
मीडिया का मंच इसलिए भी जरूरी था कि चर्चा सड़क पर नहीं हो पाती। सड़क पर नारे लगाये जा सकते हैं परंतु समाधान नहीं सुझाये सकते। सड़क पर भटकाव भी बहुत है और राष्ट्रहित से ऊपर स्वयं को समझने वाले लोगों को भटकाव उत्पन्न करने वाले सभी मार्गों का पूर्ण ज्ञान भी है, वे अनुभवी हैं कि कैसे आंदोलन को अपने मार्ग से भटकाया जा सकता है जिसका उदाहरण भी हमने ‘रायसीनाÓ पर हुये पथराव के रूप में देखा। आंदोलन को दिशाभ्रमित करने के जो प्रयास हुए उनसे चर्चा के स्वर तो प्रभावित हो ही गये। वैसे चर्चा की आयु भी अधिक नहीं होती। ‘शब्दÓ को ब्रह्म कहने और मानने में अत्यधिक अंतर होता है।
स्वभाव के अनुसार मीडिया के लिए यह घटना पुरानी हो गई है। यह मीडिया की आलोचना नहीं है न ही उस पर कोई दोषारोपण है , यह सत्य है कि यह घटना प्रतिदिन ही प्रथम स्थान प्राप्त नहीं कर सकती और यह घटना ही नहीं, महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण का विषय भी प्रतिदिन प्राथमिकता की सूची में नहीं रह सकता है। जहां तक मीडिया का प्रश्न है परम्परा के अनुसार समय-समय पर वह हमें इस प्रकरण के विषय में हो रही कानूनी कार्यवाही से ‘अपडेटÓ कराता रहेगा। अभी केबिनेट ने बनाई गई वर्मा समिति के सुझावों में से कुछ को स्वीकृति दे दी है और अब यह आशा की जा रही है कि इसे कानून का रूप भी दे दिया जाएगा। इस आधार पर कानून में थोड़ी कठोरता आयेगी और कुछ ऐसे पहलू जिन्हें अब तक महिला की असुरक्षा की ‘केटेगिरीÓ में नहीं रखा जाता था वह अब इसमें जोड़ दिये जायेंगे। हास्यास्पद है परंतु कहा जा सकता है कि अब कानून के अनुसार महिला कब-कब अपने आपको छला हुआ मान सकती है इस संबंध में थोड़ी और स्पष्टता हो जायेगी।
किसको क्या प्राप्त हुआ?
पुरुषों को थोड़ी शर्म एवं महिलाओं को थोड़ी असुरक्षा, थोड़ी चिंता और अंत में थोड़ा दिलासा, यही है इस घटना और इस संघर्ष का परिणाम।
वैसे पुरुषों की शर्म पर प्रश्नचिन्ह है क्योंकि यदि यह सत्य होता तो घटना की पुनरावृत्ति संभवत: नहीं होती। इस संदेह की सफाई देते हुए यह तथ्य प्रस्तुत किया जा रहा है कि मात्र कुछ लोगों की गलती से पुरुष वर्ग को लज्जित होना पड़ रहा है। इस बात का अर्थ यही है कि जो कोई भी दुष्कृत्य में सम्मिलित नहीं है वह उस मानसिकता से पूर्णत: परे है, परंतु क्या यह भी पूरा सच है? घटनाओं की पुनरावृत्ति और घटना के संबंध में विशिष्ट टिप्पणियों से तो जो सत्य सामने आया है कम से कम उससे तो ऐसा प्रतीत नहीं होता। परंतु कुछ पल के लिये यदि इस सफाई को स्वीकृति दे दी जाये कि प्रत्येक पुरुष इन घटनाओं के लिए दोषी नहीं है तो क्या इस सत्य को अस्वीकृति किया जा सकता है कि पुरुष वर्ग इन घटनाओं को रोक नहीं पा रहा है। स्वयं को स्त्रियों का रक्षक घोषित करने वाला यह वर्ग वास्तव में अपनी इस भूमिका की रक्षा भी नहीं कर पा रहा है?
अब बात करें कि महिलाओं को क्या मिला? असुरक्षा, चिंता और दिलासा। महिलाओं में असुरक्षा का भाव नवीन नहीं है परंतु एक लम्बे समय से यह उनकी दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका था और उन्होंने इसे एक दु:स्वप्न मानकर इससे ध्यान हटाना ही उचित समझा था। परंतु जब यह स्वप्न कटु वास्तिविकता  के रूप में सामने आया तो उनका जागना स्वभाविक है। वे असुरक्षित तो थीं ही अब वे इस विषय में चिंतित भी हैं वो भी सामूहिक रूप से और यह सामूहिक चिंता ही उनके पक्ष में रही और उन्हें पूर्णत: अंधत्व को झेल रही शासन व्यवस्था से थोड़ा दिलासा प्राप्त हो गया।
उम्मीद किससे और क्यों ?
संपूर्ण संघर्ष इस बात को लेकर हुआ और हो रहा है कि हमें एक सुदृढ़ कानून व्यवस्था चाहिए जो महिलाओं को सुरक्षा प्रदान कर सके और साथ ही एक ऐसा कानून जो महिलाओं के साथ हो रहे किसी भी प्रकार के अनाचार को रोकने में सक्षम हो अर्थात् एक ऐसा दण्ड जो इस प्रकार के दुष्कर्म को करने वाले को प्राप्त हो जिससे अन्य कोई भी ऐसा करने की बात न सोचे। क्या वास्तव में ऐसा कोई दण्ड हो सकता है? क्या मृत्युदण्ड से हत्यायों पर पूर्णत: रोक लग गई है? परंतु मात्र एक तर्क के आधार पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि महिलाओं के प्रति अनाचार में कड़े दण्ड से कमी नहीं आयेगी। परंतु ऐसे कानून की आशा किसी भी तंत्र से करना व्यर्थ है क्योंकि उसी तंत्र से मानवाधिकार के प्रश्न भी पूछे जायेंगे और उसी तंत्र से मृत्युदंड को उम्रकैद में परिवर्तित करने जैसी प्रार्थनाएं भी की जायेंगी। तब किससे आशा की जाए?
असंभव को संभव करने की ओर
आदर्श समाज की स्थापना एक स्वप्न है ऐसा हर व्यक्ति कहता है और वही व्यक्ति यह भी कह सकता है कि असंभव कुछ भी नहीं है। थोड़ा कठिन है परंतु सर्वप्रथम ‘निर्भयाÓ को और उसके साथ की घटना को हमें अपने आसपास की उन महिलाओं के स्थान पर रखना होगा जिनका हम सम्मान करते हैं, जिनको हम प्यार करते हैं ,स्नेह करते हैं। ऐसा करने पर सबसे पहले सार्वजानिक विषयों पर मात्र टिप्पणी करने की मनोवृत्ति से हम स्वयं को मुक्त कर पायेंगे। और जैसे ही सार्वजनिक विषय से यह व्यक्तिगत विषय होगा हम स्वयं का इससे जुड़ाव अनुभव करेंगे। ऐसा करने पर हम समझ पायेंगे कि यह घटना किसी के भी साथ हो सकती थी। हम स्वयं को इस घटना का उत्तरदायी न समझें किंतु इस घटना को न रोक पाने का उत्तरदायित्व तो हमें लेना ही होगा। और यहीं से आरंभ होगी असंभव को संभव करने की यात्रा। महिला हो या पुरुष स्वयं को इस घटना को न रोक पाने के लिए उत्तरदायी माने और इसके प्रायश्चित के रूप में ‘निर्भया के साथ हुई दुर्घटनाÓ के दोहराव को रोकने के लिए दृढ़संकल्पित हो जाए। यह सत्य है कि सभी दोषी नहीं हैं परंतु दोषी मनोवृत्ति हमारे ही बीच से ही विकसित हो रही है। इसके विकास को रोकना है तो इसे अंकुरण के समय ही इसे पहचानना और इसे रोकना होगा।
कहीं हम सच से अनजान तो नही ?
हमारी सामाजिक व्यवस्था को यदि हम करीब से देखें तो हम जैसे-जैसे उम्र के पायदान चढ़ते हैं और नये और पुराने रिश्तों को अपने साथ लेकर चलते हैं तब हमारे दिल में हमारे रिश्तों और उनमें हमारे स्थान के विषय में कुछ धारणाएं बनती जाती हैं। खासतौर पर रिश्तों, रिश्तों में अपने स्थान, रिश्तों में अपने अधिकारों आदि के विषय में हम स्वयं को इतना सर्वज्ञ या जानने-समझने वाला मानते हैं कि हमें कभी भी रिश्तों में अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व के विषय में सोचने की आवश्यकता का अनुभव ही नहीं होता। हमें लगता है कि हम सबकुछ ठीक कर रहे हैं। अब बात यदि पुरुष और स्त्री के मध्य के प्रत्येक रिश्ते की करें तो वहां भी हमारी इस सबकुछ जानने और ठीक करने वाली सोच बहुत अतिरेक के साथ उपस्थित होती है और धीरे-धीरे एक स्थिति ऐसी बन जाती है कि हम एक दूसरे की भावनाओं को अनसुना करने लगते हैं। यह एक दूसरे को अनसुना करने की सोच उस समय घातक हो जाती है जब हमें सच में एक दूसरे को सुनना चाहिए और हम नहीं सुन पाते…।
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते तत्र रमंते देवता जैसी उच्च भावनाओं को यदि कुछ पल के लिए छोड़ दें तो हमारे समाज ने इसी सच को बहुत बल दिया है और आज हम चाहकर भी, प्रयास करने पर भी उस स्वर को नहीं सुन पा रहे हैं जिसका निरंतर दमन हुआ है। हम हृदय से सुन नहीं पा रहे है इसी का कारण है कि हम सोचते भी हैं तो सहानुभूति से, दया से परंतु समानता के भाव से नहीं और एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो चार कदम पीछे हट जाते हैं। एक विचार महिलाओं की और उनकी स्वतंत्रता सुरक्षा के पक्ष में होता है तो अन्य चार विचार महिलाओं को सीमा में बांधने का समर्थन करते दिखाई देते हैं।
समानता ही समाधान
महिला सशक्तिकरण के विषय में सोचते समय यदि पहला विचार समानता का नहीं होगा तो हम विचार मंथन के गोल-गोल रास्ते पर घूमते रहेंगे और कहीं नहीं पहुंचेंगे। यदि कोई परिवर्तन ही करना है तो वह परिवर्तन कानून से पूर्व हमारी सोच में होना चाहिए। भेदभाव किसी भी प्रकार का हो सदैव बांटने का कार्य करता है। यदि बंटने से बचना है तो भेद को समाप्त करना होगा। सही-गलत की परिभाषाएं, सीमाएं, नियम और कानून गढऩे से बचना होगा और समानता के एक मंच पर आकर विचार करना होगा और इस सब के लिए किसी से उम्मीद करने से अच्छा है कि हम इस बात को मानें कि हम ही हैं जो असंभव को संभव बना सकते हैं। साथ खड़े होकर देखेंगे तभी रास्ता दिखाई देगा।
देवेश शर्मा

samanta

संभवत: इस  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भारत की राजधानी दिल्ली में दुष्कर्म की शिकार निर्भया और तालिबानी सोच की शिकार मलाला की चर्चा अवश्य होगी। इन दोनों ही के साथ जो हुआ वह कहीं न कहीं महिलाओं के उठते स्वर को मद्धम करने केप्रयासों का ही एक रूप था। इन घटनाओं ने यह जताया है कि दृढ़ चट्टान सी पुरुषवादी मानसिकता में परिवर्तन ऊपरी सतह पर तो दिखाई देते हैं लेकिन वह चट्टान पूर्णत: पिघली नहीं है। जहां तक बात अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक घटना के रूप में निर्भया केसाथ हुए दुष्कर्म पर चर्चा की परम्परा अवश्य निभाई जायेगी, आलोचनाएं भी होंगी और समाधान भी सुझाये जाएंगे और इससे अधिक की आशा की भी नहीं जा सकती। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकविकसित राष्ट्र की घटना को इतना ही ‘फुटेजÓ मिल सकता है। वैसे भी इस प्रकार के सारे दिवस विशेष चर्चा को ही समर्पित होते हैं। परंतु सवाल यह है कि क्या हम भी इस दिवस को चर्चा को ही समर्पित करेंगे ?

हमारा देश जहां यह घटना घटित हुई है और उसकी पुनरावृत्ति भी कई घटनाओं के रूप में निरंतर चल रही है क्या वो इस घटना को चर्चा से आगे कहीं लेकर नहीं जायेगा? एक बार अवश्य सोचिए कि इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को क्या हम राष्ट्रीय निर्भया दिवस के रूप में व्यतीत करेंगे? ध्यान रहे कि दिवस पर्व की परम्परा के निर्वाह से विपरीत होना चाहिए है यह निर्भया दिवस। इसके लिए हमें एक पूरा दिन पूरी ईमानदारी से अपने घरों में, अपने घरों केआसपास, अपने मन और मस्तिष्क को इस बात केलिए समर्पित करना होगा कि हम सुन सकें हमारे आसपास की प्रत्येकनिर्भया के अनसुने स्वर को।

एक निरंतर संघर्ष

भारत में निर्भया के नाम पर हमारा राष्ट्र एकअल्पावधि के लिए ही सही परंतु एक संघर्ष का साक्षी बना है। सोशल मीडिया तक सीमित कहे जाने वाले युवा वर्ग ने इस संघर्ष में भागीदारी दिखाकर यह सिद्ध किया किवे राष्ट्र की व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं और इसके लिए वह मात्र सोशल मीडिया पर चर्चा नहीं आंदोलन और संघर्ष भी कर सकते हैं, आंसू गैस और वॉटर केनन के प्रहार भी झेल सकते हैं।  ऊपर से देखने में युवाओं का आंदोलन प्रतीत हुआ परंतु इस आंदोलन की नींव में लम्बे समय से चले आ रहे महिला आंदोलन भी रहे हैं। महिला आंदोलन चलाने वाली संस्थाएं इस घटना के साथ और मुखर हुईं। सोशल मीडिया पर भी इस आंदोलन को समर्थन मिला, मीडिया भी अपनी सकारात्मक भूमिका में था उसकेफायदे और नुकसान से परे जो सराहनीय कार्य मीडिया ने किया वह है मंच प्रदान करना। मीडिया के मंच पर चर्चाएं  हुईं और चर्चाओं से आम लोगों ने इस घटना को सिर्फ घटना के रूप में नहीं बल्कि एक महिलाओं की स्वतंत्रता की  सुरक्षा के विषय के  रूप में समझा।

मीडिया का मंच इसलिए भी जरूरी था कि चर्चा सड़क पर नहीं हो पाती। सड़क पर नारे लगाये जा सकते हैं परंतु समाधान नहीं सुझाये सकते। सड़क पर भटकाव भी बहुत है और राष्ट्रहित से ऊपर स्वयं को समझने वाले लोगों को भटकाव उत्पन्न करने वाले सभी मार्गों का पूर्ण ज्ञान भी है, वे अनुभवी हैं कि कैसे आंदोलन को अपने मार्ग से भटकाया जा सकता है जिसका उदाहरण भी हमने ‘रायसीनाÓ पर हुये पथराव के रूप में देखा। आंदोलन को दिशाभ्रमित करने के जो प्रयास हुए उनसे चर्चा के स्वर तो प्रभावित हो ही गये। वैसे चर्चा की आयु भी अधिक नहीं होती। ‘शब्दÓ को ब्रह्म कहने और मानने में अत्यधिक अंतर होता है।

स्वभाव के अनुसार मीडिया के लिए यह घटना पुरानी हो गई है। यह मीडिया की आलोचना नहीं है न ही उस पर कोई दोषारोपण है , यह सत्य है कि यह घटना प्रतिदिन ही प्रथम स्थान प्राप्त नहीं कर सकती और यह घटना ही नहीं, महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण का विषय भी प्रतिदिन प्राथमिकता की सूची में नहीं रह सकता है। जहां तक मीडिया का प्रश्न है परम्परा के अनुसार समय-समय पर वह हमें इस प्रकरण के विषय में हो रही कानूनी कार्यवाही से ‘अपडेटÓ कराता रहेगा। अभी केबिनेट ने बनाई गई वर्मा समिति के सुझावों में से कुछ को स्वीकृति दे दी है और अब यह आशा की जा रही है कि इसे कानून का रूप भी दे दिया जाएगा। इस आधार पर कानून में थोड़ी कठोरता आयेगी और कुछ ऐसे पहलू जिन्हें अब तक महिला की असुरक्षा की ‘केटेगिरीÓ में नहीं रखा जाता था वह अब इसमें जोड़ दिये जायेंगे। हास्यास्पद है परंतु कहा जा सकता है कि अब कानून के अनुसार महिला कब-कब अपने आपको छला हुआ मान सकती है इस संबंध में थोड़ी और स्पष्टता हो जायेगी।

किसको क्या प्राप्त हुआ?

पुरुषों को थोड़ी शर्म एवं महिलाओं को थोड़ी असुरक्षा, थोड़ी चिंता और अंत में थोड़ा दिलासा, यही है इस घटना और इस संघर्ष का परिणाम।

वैसे पुरुषों की शर्म पर प्रश्नचिन्ह है क्योंकि यदि यह सत्य होता तो घटना की पुनरावृत्ति संभवत: नहीं होती। इस संदेह की सफाई देते हुए यह तथ्य प्रस्तुत किया जा रहा है कि मात्र कुछ लोगों की गलती से पुरुष वर्ग को लज्जित होना पड़ रहा है। इस बात का अर्थ यही है कि जो कोई भी दुष्कृत्य में सम्मिलित नहीं है वह उस मानसिकता से पूर्णत: परे है, परंतु क्या यह भी पूरा सच है? घटनाओं की पुनरावृत्ति और घटना के संबंध में विशिष्ट टिप्पणियों से तो जो सत्य सामने आया है कम से कम उससे तो ऐसा प्रतीत नहीं होता। परंतु कुछ पल के लिये यदि इस सफाई को स्वीकृति दे दी जाये कि प्रत्येक पुरुष इन घटनाओं के लिए दोषी नहीं है तो क्या इस सत्य को अस्वीकृति किया जा सकता है कि पुरुष वर्ग इन घटनाओं को रोक नहीं पा रहा है। स्वयं को स्त्रियों का रक्षक घोषित करने वाला यह वर्ग वास्तव में अपनी इस भूमिका की रक्षा भी नहीं कर पा रहा है?

अब बात करें कि महिलाओं को क्या मिला? असुरक्षा, चिंता और दिलासा। महिलाओं में असुरक्षा का भाव नवीन नहीं है परंतु एक लम्बे समय से यह उनकी दिनचर्या में सम्मिलित हो चुका था और उन्होंने इसे एक दु:स्वप्न मानकर इससे ध्यान हटाना ही उचित समझा था। परंतु जब यह स्वप्न कटु वास्तिविकता  के रूप में सामने आया तो उनका जागना स्वभाविक है। वे असुरक्षित तो थीं ही अब वे इस विषय में चिंतित भी हैं वो भी सामूहिक रूप से और यह सामूहिक चिंता ही उनके पक्ष में रही और उन्हें पूर्णत: अंधत्व को झेल रही शासन व्यवस्था से थोड़ा दिलासा प्राप्त हो गया।

उम्मीद किससे और क्यों ?

संपूर्ण संघर्ष इस बात को लेकर हुआ और हो रहा है कि हमें एक सुदृढ़ कानून व्यवस्था चाहिए जो महिलाओं को सुरक्षा प्रदान कर सके और साथ ही एक ऐसा कानून जो महिलाओं के साथ हो रहे किसी भी प्रकार के अनाचार को रोकने में सक्षम हो अर्थात् एक ऐसा दण्ड जो इस प्रकार के दुष्कर्म को करने वाले को प्राप्त हो जिससे अन्य कोई भी ऐसा करने की बात न सोचे। क्या वास्तव में ऐसा कोई दण्ड हो सकता है? क्या मृत्युदण्ड से हत्यायों पर पूर्णत: रोक लग गई है? परंतु मात्र एक तर्क के आधार पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि महिलाओं के प्रति अनाचार में कड़े दण्ड से कमी नहीं आयेगी। परंतु ऐसे कानून की आशा किसी भी तंत्र से करना व्यर्थ है क्योंकि उसी तंत्र से मानवाधिकार के प्रश्न भी पूछे जायेंगे और उसी तंत्र से मृत्युदंड को उम्रकैद में परिवर्तित करने जैसी प्रार्थनाएं भी की जायेंगी। तब किससे आशा की जाए?

असंभव को संभव करने की ओर

आदर्श समाज की स्थापना एक स्वप्न है ऐसा हर व्यक्ति कहता है और वही व्यक्ति यह भी कह सकता है कि असंभव कुछ भी नहीं है। थोड़ा कठिन है परंतु सर्वप्रथम ‘निर्भया को और उसके साथ की घटना को हमें अपने आसपास की उन महिलाओं के स्थान पर रखना होगा जिनका हम सम्मान करते हैं, जिनको हम प्यार करते हैं ,स्नेह करते हैं। ऐसा करने पर सबसे पहले सार्वजानिक विषयों पर मात्र टिप्पणी करने की मनोवृत्ति से हम स्वयं को मुक्त कर पायेंगे। और जैसे ही सार्वजनिक विषय से यह व्यक्तिगत विषय होगा हम स्वयं का इससे जुड़ाव अनुभव करेंगे। ऐसा करने पर हम समझ पायेंगे कि यह घटना किसी के भी साथ हो सकती थी। हम स्वयं को इस घटना का उत्तरदायी न समझें किंतु इस घटना को न रोक पाने का उत्तरदायित्व तो हमें लेना ही होगा। और यहीं से आरंभ होगी असंभव को संभव करने की यात्रा। महिला हो या पुरुष स्वयं को इस घटना को न रोक पाने के लिए उत्तरदायी माने और इसके प्रायश्चित के रूप में ‘निर्भया के साथ हुई दुर्घटनाÓ के दोहराव को रोकने के लिए दृढ़संकल्पित हो जाए। यह सत्य है कि सभी दोषी नहीं हैं परंतु दोषी मनोवृत्ति हमारे ही बीच से ही विकसित हो रही है। इसके विकास को रोकना है तो इसे अंकुरण के समय ही इसे पहचानना और इसे रोकना होगा।

कहीं हम सच से अनजान तो नही ?

हमारी सामाजिक व्यवस्था को यदि हम करीब से देखें तो हम जैसे-जैसे उम्र के पायदान चढ़ते हैं और नये और पुराने रिश्तों को अपने साथ लेकर चलते हैं तब हमारे दिल में हमारे रिश्तों और उनमें हमारे स्थान के विषय में कुछ धारणाएं बनती जाती हैं। खासतौर पर रिश्तों, रिश्तों में अपने स्थान, रिश्तों में अपने अधिकारों आदि के विषय में हम स्वयं को इतना सर्वज्ञ या जानने-समझने वाला मानते हैं कि हमें कभी भी रिश्तों में अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व के विषय में सोचने की आवश्यकता का अनुभव ही नहीं होता। हमें लगता है कि हम सबकुछ ठीक कर रहे हैं। अब बात यदि पुरुष और स्त्री के मध्य के प्रत्येक रिश्ते की करें तो वहां भी हमारी इस सबकुछ जानने और ठीक करने वाली सोच बहुत अतिरेक के साथ उपस्थित होती है और धीरे-धीरे एक स्थिति ऐसी बन जाती है कि हम एक दूसरे की भावनाओं को अनसुना करने लगते हैं। यह एक दूसरे को अनसुना करने की सोच उस समय घातक हो जाती है जब हमें सच में एक दूसरे को सुनना चाहिए और हम नहीं सुन पाते…।

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते तत्र रमंते देवता जैसी उच्च भावनाओं को यदि कुछ पल के लिए छोड़ दें तो हमारे समाज ने इसी सच को बहुत बल दिया है और आज हम चाहकर भी, प्रयास करने पर भी उस स्वर को नहीं सुन पा रहे हैं जिसका निरंतर दमन हुआ है। हम हृदय से सुन नहीं पा रहे है इसी का कारण है कि हम सोचते भी हैं तो सहानुभूति से, दया से परंतु समानता के भाव से नहीं और एक कदम आगे बढ़ाते हैं तो चार कदम पीछे हट जाते हैं। एक विचार महिलाओं की और उनकी स्वतंत्रता सुरक्षा के पक्ष में होता है तो अन्य चार विचार महिलाओं को सीमा में बांधने का समर्थन करते दिखाई देते हैं।

समानता ही समाधान

महिला सशक्तिकरण के विषय में सोचते समय यदि पहला विचार समानता का नहीं होगा तो हम विचार मंथन के गोल-गोल रास्ते पर घूमते रहेंगे और कहीं नहीं पहुंचेंगे। यदि कोई परिवर्तन ही करना है तो वह परिवर्तन कानून से पूर्व हमारी सोच में होना चाहिए। भेदभाव किसी भी प्रकार का हो सदैव बांटने का कार्य करता है। यदि बंटने से बचना है तो भेद को समाप्त करना होगा। सही-गलत की परिभाषाएं, सीमाएं, नियम और कानून गढऩे से बचना होगा और समानता के एक मंच पर आकर विचार करना होगा और इस सब के लिए किसी से उम्मीद करने से अच्छा है कि हम इस बात को मानें कि हम ही हैं जो असंभव को संभव बना सकते हैं। साथ खड़े होकर देखेंगे तभी रास्ता दिखाई देगा।

देवेश शर्मा

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