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कृपा के खरीददार भी हैं जिम्मेदार

Posted On: 14 Oct, 2013 Others में

बोलती चुप..जब कुछ कहने को दिल करे ...

deveshsharma

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रतनगढ़ माता मंदिर हादसा

कृपा के खरीददार हैं जिम्मेदार

मैं जब ये लिख रहा हूं तब तक मैंने दतिया के रतनगढ़ माता मंदिर के हादसे की खबर पढ़ ली है। अखबार में छपी तस्वीरें देख ली हैं। माँओं की लाषें उनके बच्चों के साथ जमीन पर बिखरी हुई देख ली हैं। बादस्तूर हादसे पर कुछ प्रतिक्रियाएं भी दे ली हैं और अपनी मम्मी को मंदिर जाने से रोकने के लिए इस घटना को दलील बनाकर पेष भी कर चुका हूं। फिर क्या है जो मुझे परेषान कर रहा है? मैं तो वो बहादुर इंसान हूं जिसने केदारनाथ की इतनी बड़ी घटना के बाद भी अपनी कलम को कष्ट नहीं दिया था। फिर अब क्यों?

दरअसल आज दषहरा है और मेरे घर में दो दोपहिया वाहन हैं जिनकी पूजा होनी थी। तो, हमने उनकी सफाई की और उनकी पूजा भी कर ली। पूजा के बाद खाना खाने को मन नहीं कर रहा है। ऐसा लग रहा है अंदर कुछ उलझ रहा है, अजीब सी घुटन हो रही है। बारबार पुल पर पड़े शव और कारों की लम्बी कतार वाला दृष्य आंखों के सामने रहा है। एक सिपाही एक बच्चे को हाथ में लिए हुए है, बच्चा मरा हुआ है। अजीब से सवाल रहे हैं मन मंे। क्या उस बच्चे से पूछा गया होगा कि उसे माता के मंदिर जाना है या नहीं? क्यों जाते हैं लोग ऐसी जगह? केदारनाथ, दतिया का रतनगढ़ मंदिर, भगवान के ये घर लोगों की मौत का कारण बन जाते हंै, भगवान सच में ऐसा क्यों होने देते हैं?

अखबार से ही जाना कि पहले भी उसी पुल पर इसी तरह की घटना में सन् 2006 में 92 लोगों की मौत हो चुकी है और इस बार 200 मौतें। मैं पिछली बार वहां था इस बार, लेकिन इतना कह सकता हूं कि ये मौतें उनकी हुईं जो पैदल थे, वाहनविहीन श्रद्धालु और इस बार तो साफ दिख रहा है कि इन लोगों की मौत का कारण वाहन और वाहन वाले ही रहे।

मैं पूजा कर रहा हूं, हां अपने दोपहिया वाहन की पूजा और मुझे वाहन वाला होने पर शर्म रही है। लग रहा है कि मैं भी उनमें शामिल हूं जिनके कारण ये हादसा हुआ। बदइंतजामी, प्रषासन की लापरवाही, भगदड़, अफवाह सब कारण हैं, सच भी हैं। लेकिन एक बात जो कभी सामने नहीं आती और आये भी क्यों, कौन सामने लाएगा जबकि हम सभी उस एक कारण के लिए जिम्मेदार हैं। हमारी अंधी श्रद्धाभक्ति या धन के बल पर ईष्वर की सारी कृपा खरीद लेने या अपने कब्जे में कर लेने की इच्छा।

आप भी रतनगढ़ की घटना को फिर से देखिये। वहां इस तरह के हादसे से बचने के लिए पुलिस बल कम तो था लेकिन जितना था वो भी वो नहीं कर रहा था जो उसे करना चाहिए। वहां वाहनों का प्रवेष निषेध होता है। लेकिन पुलिस ने वाहनों को कुछ पैसों के लालच में (पैसे नहीं भी लिये तो किसी डर में) जाने दिया और जब पुल पर वाहनों की संख्या बढ़ गई और भीड़ बढ़ने लगी तो उसी पुलिस ने कहा कि पुल टूट सकता है। इतना कहना काफी था और भगदड़ मच गई। लोग नदी में कूदे या एक दूसरे के पैरों में कुचले गए। परिणाम लाषें ही, लाषें। सीधेतौर पर इसमंे पुलिस की, प्रसाषन की गलती नजर आती है जिसकी सजा उन्हें मिल भी गई। एसपी निलंबित हो गए, कलेक्टर निलंबित हो गए। लेकिन जिन्होंने पुलिस को पैसे दिए या अपनी पाॅवर का उपयोग किया उन पर कभी कोई सवाल नहीं उठेगा।

इस तरह के हादसों में एक ही बात है जो परेषान करने वाली है जिसे शायद ईष्वर के प्रति भक्ति या श्रद्धा रखने वाले सही भी मानें, लेकिन वो सवाल बनकर हमारे सामने है कि क्या बाकई जरुरी होता है बड़े लोगों का अपने वाहनों के साथ ऐसी जगहों पर जाना? जरा खुद से पूछिए कि क्यों ईष्वर के घर जानें मंे भी हम अपने लिए अलग वीआईपी लाइन चाहते हैं? क्यों पुलिस को पैसे दिखाकर या अपनी पाॅवर का डर दिखाकर वाहनों का निषेध राह पर भी प्रवेष चाहते हैं? क्या ये भक्ति प्रदर्षन है या शक्ति प्रदर्षन? यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो क्या भगवान नाराज हो जाएंगे? क्या ये हमारी मजबूरी है? ठीक है आपके पास पैसा है तो उसकी ताकत दिखाइए, वाहन है तो उसमें आराम से बैठके जाइए लेकिन इतना जरुर सोचिये कि आपके वीआईपी दर्षन की वजह से बाहर उन लोगों की भीड़ बढ़ती चली जाती है जिनकी संख्या भी आप से ज्यादा है और जरुरतें भी आपसे ज्यादा। आपके वाहनों की कतारें उन लोगों को चलने के लिए जमीन नहीं छोड़ती जिनकी नियति ही जमीन पर चलना है। आपके दिए पैसे रक्षकों को भक्षक बना देते हैं और उनकी अक्ल को इतना अंधा कर देते हैं कि वे बिना विचारें पुल टूटने जैसी अफवाह तक फैलाने से नहीं हिचकते और अचानक कुछ ही पलों में श्रद्धा में डूबे भक्त जिन्हें बहुत कुछ मांगना था अपनी माता से वे अपनी मौत मांग बैठते हैं।

हो सकता है कि कुचले जाने पर चीखते बच्चों की चीखें कार के शीषों से टकराकर शांत हो गई हों और आप सुन पाए हों। हो सकता है कि एसी की ठंडी हवा मंे आपको वो घुटन भी महसूस हुई हो जिसने कई लोगों की जान ले ली। हो सकता है लिखने का सलीका सही होने के कारण आपको मेरी बातें समझना तो छोडि़ए पढ़ने लायक भी लगें लेकिन मैं इतना यकीन मान रहा हूं कि आप अभी भी इंसान हैं और ईष्वर पर आपका यकीन सच्चा है, तो अपने ही दिल की सुनिए। आपको ईष्वर ने बहुत दिया है, अब और मांगना बंद कीजिए। ईष्वर के दरवाजे पर उन्हें सुकून से जाने दीजिए जो ईष्वर की कृपा अभी तक नहीं पा सके हैं। उन्हें सच मंे जरुरत है और अगर आप उनकी मदद नहीं कर सकते तो उन्हें रास्ता तो दे ही सकते हैं। ईष्वर की कृपा खरीदना छोड़कर उसे साझा करने का प्रयास कीजिए। वरना ऐसे हादसे होते रहेंगे इंसान के रूप में भगवान इनका षिकार बनते रहेंगे। नर को कष्ट देकर नारायण को पूजना हमें कहीं नहीं पहुंचा सकता। लिखने के बाद शायद कुछ घुटन कम हो लेकिन दर्द तो रहेगा ही। उन मासूम बच्चों की कोई गलती नहीं थी जो बेमौत मारे गए, इसके लिए तो ईष्वर पर भी प्रष्न करने को मन करता है?

देवेश शर्मा

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