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अनसुलझा सा राज हूँ

Posted On: 23 Sep, 2010 Others में

पहचानखुद से, जिंदगी से और खुशियों से

div81

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4aleksejzajcev18f96e

जब सोचती  हूँ , कौन हूँ मैं

तो  लगता  है , सारी दुनिया  सी हूँ मैं

कभी  लगता  है कुछ अधूरी सी हूँ मैं,

कभी लगता है नील गगन सी विशाल हूँ मैं

तो दुसरे पल लगता है जर्रे के आस पास हूँ मैं

कभी लगता है एक किताब हूँ मैं

तो कभी  अनसुलझा सा राज हूँ मैं

कभी अपने आप मे ही एक सवाल हूँ मैं

कभी एक छोटा सा जवाब हूँ मैं

कभी अठखेलीयां करती लहर हूँ मैं

कभी सुनामी सा कहर हूँ  मैं .

कभी सुन्दर सा ख्वाब हूँ मैं.

और  कभी खाली हाथ हूँ मैं ……..

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