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तलाश

Posted On: 4 Dec, 2012 Others में

पहचानखुद से, जिंदगी से और खुशियों से

div81

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आज जब मैं निकली
खोये हुए अपने
ज़मीर कि तलाश में
तो चाह मैंने अपनी
रूह को जगाना
कभी मिन्नते दे कर
और कभी लानत दे कर
जो चाह मैंने उसको
जगाना तो पाया
मेरी रूह बहुत जख्मी थी
कुछ जख्म सुख चुके थे
मगर कुछ ताजा
और हरे भी थे
मेरी रूह सिसक ही तो रही थी
तभी मेरा ध्यान पास आते
एक बच्चे पर गया
भिखारी था शायद
या पास की ही
मलिन बस्ती का
बच्चा था वो
मेरी ही तरफ
वो बढ़ रहा था
रूखे होठ, पिचके गाल
मैले कुचले कपडे
बदहाल सा वो
मेरी ही जानिब तो
वो बढ़ रहा था
मैंने निगाह चुरा के
नाक सिकुड के
उसके पास आने
कुछ मांगने से पहले
तेजी से कदम
आगे बढ़ा लिए
बच गयी
आज फिर मैं
और मेरी रूह के
जिस्म में
एक नयी चोट
उभर आई
और मेरा जमीर
फिर से आज
मुझे नहीं मिला
कहीं आपको मिले
तो बताना
मैं उसकी तलाश में हूँ
cripple1

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