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माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो ??

Posted On: 7 May, 2011 Others में

पहचानखुद से, जिंदगी से और खुशियों से

div81

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माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो चुप हो कर सब  सहती हो
दादी के शब्द बान सहे पापा कि अनदेखी में भी मौन रही हो
त्याग कि प्रति मूर्ति बनी मूर्त होकर भी मौन रही हो
कभी सही होते हुए भी गलत ठहरा दी गयी
कभी बच्चों कि ख़ुशी में खुद कि खुशियाँ को भुल जाती हो
परिवार कि शांति  के लिए त्यागा हर सुख चैन तुम ने
परिवार को बांधे रही आँचल से अपने
अन्नपूर्णा का रूम बन कैसे कम में भी सबको तृप्त तुम कर जाती हो
दिन भर कि थकी हारी फिर भी मधु मुस्कान सजा के
हम पर हर वक़्त बलिहारी हो जाती हो !!
थकना और रुकना तुम जान ही न पाई
निराशा में भी आशा के दीप जलाती हो आई
मुझको  तुम कई रंगों में दिखती
भोर का पहला तारा कभी हो जाती
कभी रात का चमकीला सितारा बन
मेरे सिरहाने रात भर झिलमिलाती हो
तपती दुपहरी में ठंडी छावं, अपने आँचल में तुम कहाँ से लाती हो
कभी दिए कि बाती बन हमारे दिलो को जगमगाती हो
प्यार कि ये रौशनी तुम खुदा से हो पाती
या कभी खुदा का नूर तुम हो जाती हो
कभी होली कि रंगोली बन खुशियों का घर आंगन सजाती हो
माँ कैसे तुम हमरी उदंडता में शांत चित रह पाती हो
बिना कोई कटु शब्द कहे उंच नीच का ज्ञान दे जाती हो
माँ कैसे तुम बिन कहे मेरी पीड़ा को समझ जाती हो
अपने आशीष के हाथ से मेरे सारे दर्द दूर कर जाती हो
माँ फिर भी अनगिनत सवाल आज मचल रहे है
तुम अपनी पीड़ा किससे कहती हो ???
हमारे आंसू तुम पीती हो तो
अपने आँखों के नीर को कहाँ अर्पित कर देती हो ??
घर कि खुशियों में मग्न  हो, अपनी खुशियों का भान
किसी को भी तो नहीं देती हो
मेरी बीमारी में जागी सारी रात हो
ये तो कहो तुम बीमार कब होती हो ???
मेरी हर खाहिशें पूरी कि हर दम तुमने
अपनी इक्छओं को किससे कहती हो ?
परिवार कि हर बात सुनी है
अपनी बात पर क्यूँ होंट सिये रहती हो ????
माँ आप क्यूँ कुछ नहीं कहती हो ?
चुप हो कर सब  सहती हो

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