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मज़बूरी कन्या भ्रूण हत्या की

Posted On: 15 Sep, 2010 Others में

पहचानखुद से, जिंदगी से और खुशियों से

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कन्या भ्रूण हत्या के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है और सुना है . मेरी राय भी ऐसी ही थी इस बारे में पढ़ कर बातें कर के जो एक बात सामने आती है या जिसका हम निष्कर्ष निकलते है वो ये की कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग ही ऐसा घिनौना कृत्य कर रहे है जो सिर्फ वंश वृद्धि का सोचते है लड़के की चाह रखते है ………………मगर ऐसा नहीं है ये सोच सिर्फ लड़के की चाह या वंश वृद्धि तक की बात नहीं बात की हकीकत कुछ और है
दुःख लड़की पैदा होने का नहीं है सवाल वंश का भी नहीं……………. दुःख उस बात का है जो एक औरत किसी से कह नहीं पाती वो अपने जख्म किसी को दिखा नहीं पाती अत्याचार तो औरतों पर शुरू से हुए है कहीं इसका विरुद्ध हुआ कहीं आवाज का दमन ये सब वो सह लेती है नियति का लिखा सोच कर
उसकी आवाज का दमन का सिलसिला घर से शुरू होता है समाज में पहुँचता है और एक दिन घर में दम तौड़ देता है ये तो सब ही जानते है मगर वक़्त बदला घर परिवार, समाज में औरतों की स्थिति बदली लोगो ने कहा स्त्री को वो हक सम्मान मिलना चाहिए जिसकी वो हकदार है कुछ लोगो ने औरतों की आगे की सुध ली और बहस का मुद्दा बना दिया औरतों को पुरुषों के बराबर खड़ा कर के हर तरफ इसी विषय की जंग छिड़ी है औरत भी पुरुषों के बराबर है उसके भी वो ही अधिकार है
ठीक है हम को अधिकार मिले ठीक है हम पुरुषों से कंधे से कन्धा मिला कर चल रहे है मगर क्या हम को सही में जो अधिकार मिलने चाहिए थे मिल गए है क्या सच में हम पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चल रहे है ………जवाब हाँ है??????? न है????? या क्न्फुयजन है की वास्तव में एक औरत की स्थिति क्या है कहीं तो आजादी के नाम पर लड़कियां को बेहयाई दे दी गयी है तो कहीं पर उसको पुरुषो के सामान बनाने में उसकी स्त्री स्वरूप कोमलता को मार दिया जा रहा है लड़कियां आज भी उसी आदमी की मानसिकता के अनुसार ही चल रही है उसकी अपनी एक सोच अपने आप का निर्माण उसको खुद करने दो न क्यूँ उसकी सोच को प्रभावित किया जा रहा है लड़कियां पहले भी पुरुषों के लिए निचले दर्जे की थी और आज भी है उसका खुद का अस्तित्व पुरुषो पर निर्भर करता था करता है
एक औरत का शोषण घर से शुरू हुआ और प्लेग की तरह सारे समाज में फैल गया किसी ने इस का विरुद्ध ही नहीं किया अब विरुद्ध करो तो खून में रच गयी आदत बोलने से तो जाने से रही
एक औरत ने जन्म से ही संघर्ष शुरू कर दिए हों और वो संघर्ष मौत तक साथ रहे वो औरत कैसे चाह सकती है की उसकी कोख से फिर न खत्म होने वाला संघर्ष शुरू हो वो डरती है की जब पहली बार उसे किसी पराये के छूने का मतलब पता हुआ था वो मेरी बच्ची के साथ न हो वो डरती है जो चचेरा या ममेरा भाई मुझे अकेले मे देखते ही घिनौने रूप में आ जाता है वो मेरी बच्ची न देखे जब पहली बार वो बच्ची से नवयोवना हुई उस वक़्त सब पडोसी अंकल की दृष्टि इतनी चुभने वाली हो गयी थी घर से निकलने में शर्म नहीं वो पल मरने जैसा होता था तो क्यूँ वो पल पल का मरना वो सहे जब पब्लिक ट्रांसपोट से सफर शुरू हुआ तो हर पल खुद को न जाने कितने तह में छुपाने का दिल किया किसी ऐसे वीराने में जाने का दिल हुआ जहाँ कोई पुरुष न हो उसकी छाया न हो फिर कैसे अपनी कोख से फिर से उस डर को पैदा करूँ ,
कहते है पति का घर ही अपना होता है जहाँ से बस उठेगी तो उसकी अर्थी मगर यहाँ भी संघर्ष शुरू सभ्यता संस्कार आदर अपनापन मिठाश ये सब औरत के लिए ही बनाये गए है इन बातों से पुरुष का कोई लेना देना नही ऊँचा मत बोलो सभ्य दिखो संस्कार ऐसे की गलत बात पर भी चुप रहो आदर ऐसा की अपमान का घूंट पी कर भी इज्ज़त करो ये जिल्लत सहो और सहते रहो जब तक की अर्थी उठती नहीं इस घर से
“घर से बहार ऐसे देवर से मिलो जो भाभी तो कहेंगे मगर नियत साफ बता देगी की वो चाहता क्या है”
ऐसी दुनियां में उस को ला कर फिर से वही सब या उससे भी भयानक देखने के लिए कैसे छोड़ दे
आज समझी हू क्यूँ जब घर पहुँचने में देर होने में माँ मुझे चिंतित मिलती थी क्यूँ वो इतनी नसीहते देती थी वो तो डर डर के जीती रही और भी न जाने कितनी माये डर से समझोता करती है मगर जो माँ अपने डर पे काबू नहीं कर पाती वो ऐसा कदम उठती है
मैं उसको कमजोर नहीं कहूँगी न ही पापन पता नहीं उसने इतना सब सहा है या उससे ज्यादा
ये तो वो ही जान सकती है
मगर मैं सोचती हूँ हम को जो आजादी दी जा रही है उस आजादी में हम को उन पुरुषों से सुरक्षा भी मिल जाये सुरक्षा इस बात की नहीं की एक पुरुष द्वारा दुसरे पुरुष से बचाया जाये सुरक्षा इस बात की की वो अपनी नियत अपना नजरिया अपनी सोच बदले हम को बराबरी का नहीं सम्मान का अधिकार दे दो हमको कंधे से कन्धा मिला कर नहीं हम को अपने ऊँचाइयों को अपने आप छूने दे दो हम को आप से नजरों की सुरक्षा चाहिए जिसमे हम को लड़की होने पर मरने जैसा न अनुभव करना पड़े हमको अपनी बातों से सुरक्षा दे दो जहाँ बहन का मतलब बहन हो जहाँ भाभी का मतलब भाभी हो जहाँ माँ का मतलब माँ हो, हम को सम्मान की सुरक्षा दे दो जहाँ हम बसों में सडको में घर के बहार कहीं भी अपने लड़की होने पर अपमान न महसूस हो ऐसी सुरक्षा दे दो
अगर हम लड़कियों को ये सम्मान ये सुरक्षा समाज के हर शख्स हर अपने परायों से मिल जाएगी तब कोई भी लड़की का यूँ हत्या नहीं की जाएगी न किसी माँ को डर के साये में जीना होगा ना फिर कभी किसी के कोख में किसी कन्या की हत्या की जाएगी और न इस विषय में कुछ लिखा जायेगा न पढ़ा जायेगा
जब तक हम अपनी सोच नहीं बदलते तब तक लड़कियां समाज में ही नहीं माँ की कोख में भी सुरक्षित नहीं रहेगी

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