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यात्रा,,चरण दासी से चरण दासी तक का सफर

Posted On: 8 Mar, 2011 Others में

पहचानखुद से, जिंदगी से और खुशियों से

div81

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365 में केवल एक दिन ,,सम्पूर्ण विश्व की लगभग आधी आबादी के लिए केवल एक दिन ,,और इस एक दिन की भी आवश्यकता  हमे क्यों पड़ी? ,,क्या केवल इसलिए की हमारे मन से अपराध बोध दूर हो सके ?,,की हमने महिलाओं के लिए कुछ नही किया (364 दिन शोषण किया और एक दिन प्रायश्चित ,,नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज करने ,,या गांधी जी के तीन बंदर ,,सब कुछ जानते बुझते हुए भी चुप रहो ) अगर ऐसा है और शायद ऐसा ही है तो इसे चिकित्सकीय दिन कहना अधिक उचित होगा मनोरोगियों की चिकित्सा का एक दिन ,,भारत ही नही अगर हम सम्पूर्ण विश्व को भी देखें तो महिलाओं की स्थिति लगभग हर जगह एक जैसी ही मिलती है कहीं कहीं तो और भी बदतर ,,न जी सकती हैं और न ही चैन से मर सकती हैं ,,और महिला हक़ की पैरोकार महिला समाज सेवी समितियां /संस्थाएं (कुछ एक जो उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं को छोड़कर ) सभी महिलाओं का ही शोषण करने में आकंठ डूबी हुई हैं,यह संस्थाएं बाहुबलियों ,राजनेताओं या किसी भी तरह से धनाढ़य एवं सबल लोगों की चरण दासियाँ बन कर रह गई हैं(हमे आये दिन समाचार पत्रों में ऐसी तमाम घटनाएं पढ़ने को मिल ही जाती हैं ) क्या इन संस्थाओं के बूते पर नारियों की स्थिति सुधरेगी जो खुद ही नारियों का सर्वस्व लूटने को भूखे भेड़ियों की तरह आतुर हैं ? या फिर सरकार (जो तसलीमा या इन जैसी ज्वलंत लेखिकाओं के सर पर ईनाम रखने वालों की हिमायती रहे हो और आज भी अन्यान्य देशों में यही स्थिति है कहीं पर हम समाचार पत्रों/या सूचना के विभिन्न माध्यमों से हम थोड़ा बहुत जान पाते हैं और कहीं से निकलकर कुछ भी नही आता) के भरोसे बैठे रहकर स्थितियों की सुधरने की कामना करते रहें ,,(कुछ एक लोग कहेंगे की महिलाओं की स्थिति पहले की अपेछा सुधरी है सत्य है परन्तु आंशिक ,,शोषण के तौर तरीके बदल गये हैं परन्तु स्थिति और भी दयनीय हो गई है नारिओं के शोषण के लिए नित नवीन हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं ,कहीं प्रोत्साहन या प्रलोभन देकर तो कहीं खुलेआम (नया जमाना है भाई क्म्प्रोमाईज तो करना है पड़ता है यह शब्द नारियों के मुख से ही सुनने को मिलता है उन नारियों के मुख से जो पता नही क्या क्या सह चुकी हैं और समाज के द्वारा इतनी प्रताड़ित हो चुकी हैं की उनके मन से खुद को अत्याचार से मुक्त करने  का भाव ही खत्म हो गया है और यही पराजित मन दुसरी नारियों को भी शोषण की तरफ उन्मुख करता है ) पर शोषण हर जगह हो रहा है ,,लोग समान अधिकारों की बात करते हैं ,,(वही लोग जो खुद की पुत्रियों को समाज से दूर रहने की शिक्छा देते हैं ) गोया समाज न हुआ जंगल हो गया ,,क्या यह सभी लोग समाज के अंग नही हैं ,फिर उन्होंने ही तो इस समाज को जंगल बनाया या बनाने में सहयोग किया और ऐसी नारियां जो उन महानुभावों की छाया चित्र हैं खुद ही धन लिप्सा के वसीभूत होकर अपनी बेटी समान लडकियों का शोषण करने में तल्लीन हैं ,,वाह रे धन लिप्सा ….सारे रिश्तों को ताक पर रखकर यहाँ तक की मानवीय गुणों को भी भूलकर (शायद ईश्वर ने भूल से उन्हें मानव बना दिया ,परतु पशु भी तो  इतने निष्ठुर नही होते ?) शोषण करने में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया जाता है ,, हर साल कि तरह इस साल भी ८ मार्च आ गया | ८ मार्च यानी कि महिला दिवस यह महिलाओ के सम्मान के लिए बना एक दिवस मात्र एक दिवस  ,,फिर से इस दिन उन महिलाओ को याद किया जायेगा जिन्होंने इतिहास रचा उनको सम्मानित किया जायेगा जो बुलंद हौसलों के साथ विपरीति परिस्थिति में भी आगे बढ़ी और एक मुकाम हासिल किया | और फिर ढलते हुए सूर्य की तरह ये दिन गुजर जायेगा और फिर से अनगिनत सवाल खड़े कर जायेगा उन तमाम महिलाओं के लिए जो घर में दिन रात एक करके देश के लिए रक्त धमनियों का कार्य करती हैं ,क्या उन्हें भी कभी याद किया जाता है ? क्या एक दिन महिलाओ को पुरस्कृत कर देने  से या सम्मानित कर देने  से महिलाओ  को सम्मान मिल जायेगा उनको उनका उचित स्थान प्राप्त हो पायेगा ? उन के प्रति  विकृत मानसिकता वाले लोगो का नजरिया बदल जायेगा ? ये सम्मानित की जाने वाली महिलाएं भारत  की करोणों महिलाओं में से कुछ एक हैं जो उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं  मगर क्या अब भी वह महिलाये जो पहचान की मोहताज है उनको सम्मान मिल पायेगा या वे जो सम्मान कि हक़दार थी मगर अब एक अभिशप्त जिंदगी जी रही है सिर्फ इस लिए कि वो महिला हैं  और शायद ये ही उनका सबसे बड़ा जुर्म हैं |                                          महिला-सशक्तीकरण एक आन्दोलन है,एक कार्य-योजना है,एक प्रक्रिया है,जिसे मुख्यत: सरकार और गैरसरकारी संगठन आयोजित करते हैं। कुछ महिलाओ को बुला लिया जायेगा मंच पर और  उनके बहाने उन महिलाओ को भी याद किया जायेगा जो इतिहास बन गयी है और कुछ गिनी चुनी महिलाओ को पुरुस्कृत कर के इस दिवस को इति श्री कह दिया  जायेगा |                                                                                               क्या यही सब कर देने भर से महिलाओ कि स्थिति में बदलाव आ जायेगा ?

जो महिला अपने अधिकारों और हक को लेकर पहले से ही सचेत हैं क्या यह महिला दिवस केवल उन्ही के लिए आयोजित किया जाता है |                                                                                   वह महिलाएं जो आज समाज में हासिये पर धकेल दी गयी है या समाज में अपने अधिकारों से वंचित है उनके लिए क्यों नहीं संघर्ष दिवस बनाम महिला दिवस आयोजित किया जाता ताकि उन्हें भी  न्याय मिल सके वह भी खुद को इन्सान कह सकें  |

महिला आयोग में निम्नलिखित मुद्दों पर अपनी शिकायतें की जा सकती है।

घरेलू हिंसा, उत्पीडऩ, दहेज के लिए प्रताडि़त किए जाने पर, ससुराल पक्ष या पति द्वारा प्रताडि़त किए जाने पर, पति द्वारा छोड़े जाने पर, यदि पति द्विविवाह किया हो, बलात्कार, पुलिस द्वारा प्राथमिकी इनकार करने पर, ऑफिस में सहयोगी या बॉस द्वारा लिंग भेद, यौन उत्पीडऩ या क्रूरता दिखाने पर।इसके अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग आप्रवासी भारतीय नागरिकों (एनआरआई)से शादियों की बढ़ती धोखाधड़ी के मामले भी देखती है।

Comptroller & Auditor General (CAG) की मार्च २०१० की रिपोर्ट साबित करती है की राष्ट्रीय महिला आयोग संपूर्ण और गंभीर रूप से

भ्रष्ट है! २००८-०९ में आई १२,८९५ शिकयतों में से सिर्फ़ ७,५०९ पर गौर किया गया और उन में से केवल १०७७ पर कार्यवाई के गयी!

जेल में औरतों की दशा का जायज़ा पिछले ४ सालों में एक बार भी नही लिया गया! मथुरा और पाशिम बंगाल में रहने वाली विधवाओं की

दशा भारत में सबसे दुखद है पर भारतीय महिला आयोग को इस बारे मे पता भी नही था जब तक सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को जाँच के

आदेश नही दिए थे! इन विधवाओं के लिए अब तक क्या किया गया? ऐसी अनगिनत विधवाओं और ग़रीब महिलाओं के लिए राष्ट्रीय

महिला आयोग ने क्या किया?

क्या सच में हमारी देश कि  महिलाये अपने हक के लिए आवाज बुलंद कर पाती  है  क्या उनको इन अधिकारों का पता है या आवाज उठाने पर कुछ हो पता है |

कुछ दिन पहले कि न्यूज़ है up के किसी गाँव कि दलिद महिला के साथ वहीँ के गाँव के किसी व्यक्ति ने उत्पीडन किया  उसने उसकी रिओर्ट पुलिस में करा दी उसके बाद उस महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और मार दिया गया | उसके बाद क्या हुआ कुछ नहीं पता ये है हमारे समाज का असली चेहरा जहाँ अब  भी महिलाये अपने आवाज को उठा नहीं पाती | ऐसी अनगिनत खबरे आती है और चली जाती है और महिलाये खबर बन कर रह जाती है |

मुझे तो महिला दिवस एक मजाक लगता है | जहाँ पर बढे बढे दावे पेश कर दिए जाते है | महिलाओं ने ये किया था महिलाये वो कर रही है | मगर जिन को सच में अधिकार और सम्मान कि जरुरत है वो अब भी कहीं गुमनामियो में जी रही है  अपने हक के लिए झूठे वादों पर ठगी जा रही है |

अधिकारों अपने हक से वंचित है उनको ले कर एक मंच बनाया जाये उनके लिए कुछ किया जाये तब सही मायने में महिला दिवस का कुछ औचित्य होगा

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