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चुनाव में सही नेता का चुनाव

Posted On: 4 Dec, 2018 Politics में

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आचार्य चाणक्य के अनुसार ” अविनीतस्वामिलाभात् अस्वामिलाभः श्रेयान् ” अर्थात् विनयविहीन (अनुशासन या मर्यादा में न रहने के स्वभाव वाले ) राजा की प्राप्ति की अपेक्षा राजा का न होना ही श्रेयस्कर है । ” आज के जनतांत्रिक भारत में राजा के स्थान पर राजनेता पढ़ना अनुचित नहीं कहा जा सकता है ।
एडमण्ड बर्क ने कहा था ” जनता के लिए सबसे अधिक शोर मचाने वालों को उसके कल्याण के लिए सबसे उत्सुक मान लेना सबसे बड़ी त्रुटि है । इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान में हमारी मान्यता यही हो गई है कि संसद या विधान सभा में जो जनप्रतिनिधि अधिक शोर मचाये वही मुखर सांसद या विधायक मान लिया जाता है । जबकि , यहाँ मुखर का अर्थ ऐसे सांसद या विधायक से होना चाहिए जो अपने क्षेत्र की समस्याओं को प्रमुखता से उठाने के साथ -साथ देश-हित का भी ध्यान रखे , उसके शब्दों में संतुलन होना चाहिए कि उसकी मांग यदि मानी भी जाये तो किसी सम्प्रदाय , वर्ग या जाति कि भावनाओं के प्रतिकूल न हो और उसका प्रभाव राष्ट्रिय अस्मिता , एकता और अखंडता पर भी न पड़ता हो ।
परन्तु , आज कि हालत यह है कि संसद अथवा विधान सभाओं में हंगामा अधिक और काम कम । हाँ , एक बात अवश्य है कि नेता अपने हित के कामों को एक स्वर में शांतिपूर्वक इस पटल पर कर लेते हैं । मसलन , अपने वेतन भत्तों को बढ़ाना , पार्टियों के चंदे को हर बुरी नजर जैसे कि आय कर आदि से बचाना । आज लाल बहादुर शास्त्री , सरदार वल्लवभाई पटेल , भीमराव आंबेडकर ,चंद्रशेखर ,अटल बिहारी बाजपेई आदि जैसे नेता अब बिरले हीं दिखते हैं।

सी। राजगोपालाचारी ने कहा था कि ” निसंदेह सशक्त सरकार और राजभक्त जनता से उत्कृष्ट राज्य का निर्माण होता है । परन्तु , बहरी सरकार और गूंगे लोगों से वास्तविक लोकतंत्र का निर्माण नहीं होता । ” जब मतदाता को प्रोपेगंडा और झूठे वादों से दिग्भ्रमित किया जा सकता हो तो समझना चाहिए कि लोकतंत्र कि मशीनरी में जंग लग चुका है । देशभक्त जनता को इसे छुड़ाने का प्रयास प्रारम्भ कर देना चाहिए ।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का कथन कि ” राजनीतिज्ञों को नेशन फर्स्ट , पार्टी नेक्स्ट और सेल्फ लास्ट ” कि सोच से प्रेरित होना चाहिए । जबकि आज अधिकतर नेताओं की सोच इसके बिलकुल विपरीत है । संसद में एक मिनट कि कार्यवाही पर लगभग २।५ लाख रुपये खर्च होते हैं । संसद तथा विधान सभाओं में कुछ क्या, अधिकतर नेताओं की गलत हरकतों के कारण कुल कितने घंटे बर्बाद होते हैं, इनके बारे में पाठकगण स्वयं निर्णय ले सकते हैं । देश की सर्वोच्च लोकतान्त्रिक संस्था का प्रतिदिन संचालन बहुत ही महंगा है । इस संचालन में प्रतिदिन लगभग साढ़े सात करोड़ खर्च होते हैं । इसके अतिरिक्त इनके दिल्ली आना-जाना , रहना -खाना , भत्ते , सुरक्षा- गॉर्ड , टेलीफोन , इंटरनेट आदि सब खर्चें आम नागरिकों से हीं विभिन्न कर के रूप में वसूले जाते हैं । अगर इन सबों का सदुपयोग हमारे ये भाग्य विधाता करते तो भारत की स्थिति आज कुछ और ही होती ।

यदि आम नागरिक अपने नेता का चुनाव ठीक प्रकार से सोच -विचार कर करेंगे तभी हमारे देश का वास्तविक विकास संभव है । जैसे कि —
१.अपने मताधिकार का प्रयोग अवश्य करें अर्थात वोट डालने अवश्य जाएँ । सरकार की आलोचना करने से पहले सरकार चुनने में भागीदारी निभाना भी हमारा कर्त्तव्य है । लोकतंत्र में मताधिकार ही सबसे बड़ा अधिकार होता है । वर्ष २०१४ में १६ वीं लोकसभा के आम चुनाव में पूरे देश में सिर्फ ६६.४० % लोगों ने अपने मताधिकार का सदुपयोग किया था । इनमें सबसे कम प्रतिशत बिहार का था , जो सिर्फ ५६।२८ % था ।

२. जातिगत और धर्मगत समीकरण को दूर रखते हुए समाज में स्वच्छ एवं सम्मानजनक छवि वाले व्यक्ति को चुनना । अगर आपकी नजर में ऐसा कोई नहीं हो तो सभी प्रत्याशियों में जो सबसे उत्तम हो उसे चुने अथवा आपके पास नोटा का भी विकल्प है । कभी भी यह न समझें कि नोटा से आपका वोट बेकार हो जाएगा । इससे पार्टियों पर दबाब बढ़ेगा कि वे अच्छे उम्मीदवार मैदान में उतारें । परिणामस्वरूप अच्छे लोग राजनीति में आ सकेंगे । नोटा से निर्वाचक को लड़ रहे प्रत्याशियों के खिलाफ अपना विरोध/ अस्वीकृति दर्शाने का मौका मिलेगा जो लोकतंत्र के हित में है तथा कुछ हद तक बोगस वोटिंग भी रूकेगी ।

हम लोगों के बीच बहुतायत से ऐसे लोग मिलेंगे जो अंतिम समय में अपना मत ऐसे उम्मीदवार को दे देते हैं , जिसके बारे में उन्हें लगता है कि वही जीतेगा। पूछने पर उनका कहना होता है कि मैं अपना वोट बर्बाद नहीं करना चाहता , इसलिए बिना सोचे -समझे उनकी नजर में जो विनिंग कैंडिडेट होता है , उसके पक्ष में वोट डाल देते हैं । इसी मानसिकता का फायदा ये नेता उठाते हैं तथा अंतिम समय में भीड़ जुटा कर रैली निकलना, तरह-तरह के झूठे प्रलोभन देना, जाति और धर्म कि राजनीति करने का काम कर लेते हैं ।

३.जो आपसे फ्री की सुविधाओं के वायदे न करता हो , बल्कि उन सुविधाओं के लायक बनाने के प्रयास का वादा करे । यानि शिक्षा , रोजगार , बुनियादी सुविधाएं , अपराध – नियंत्रण , जनसँख्या-नियंत्रण आदि का वादा करे ।
४। पिछले पांच वर्षों के कार्य का ऑडिट जनता के सामने रखे । अच्छा होता यदि प्रत्येक वर्ष के उपरान्त अपने कार्य का ऑडिट जनता के सामने रखे । पिछले चुनाव के समय में जारी घोषणा-पत्रों में जो वायदे किये गए थे , उन पर कितना कार्य हुआ उसका लेखा – जोखा भी जनता के सामने रखा जाना चाहिए । जो पार्टी अथवा नेता ऐसा नहीं करता है , उनसे यह प्रश्न जनता करे । ऐसा करने से अच्छे जन-प्रतिनिधि चुनने में आसानी होगी ।

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