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दलित राजनीति - नए परिप्रेक्ष्य में/समस्या से समाधान की ओर

Posted On: 31 Oct, 2018 Common Man Issues,Politics में

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D P KHARE

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( इस लेख का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष की भावनाएँ आहत करना नहीं बल्कि जनमानस को सत्य से अवगत कराना है। )

अक्सर समाचार पत्रों , पत्रिकाओं एवं न्यूज चैनलों पर प्रायः दलित राष्ट्रपति /  मुख्यमंत्री /  मंत्री /  राज्यपाल /  सांसद /विधायक /  आई ए एस अफसर जैसे शब्द पढ़ने /सुनने को मिलते हैं। “दलित” शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के “दल्” धातु से हुई है  जिसका अर्थ पीड़ित ,शोषित ,दबा हुआ ,दला हुआ , कुचला हुआ  ,पीसा हुआ ,मसला हुआ  है। इस प्रकार यदि “दलित” शब्द का अर्थ तलाशें तो पाएँगे कि इसका अर्थ पीड़ित , शोषित , दबा हुआ ,रौंदा हुआ , दला हुआ ,कुचला हुआ  होता है।   अगर इस पर गौर करें तो हमारे देश का प्रथम  नागरिक अर्थात राष्ट्रपति एवं  मुख्यमंत्री /  मंत्री / राज्यपाल /  सांसद /विधायक / आई ए एस /आई पी एस अफसर दलित कैसे हुए ?  बल्कि,  मेरे विचार से  इन सभी माननीयों को  दलित कहना न केवल आश्चर्य की बात है बल्कि,  इन सबों का अपमान करना भी है I

सर्व श्री राजेश सरैया , नत्था राम , रवि कुमार नर्रा ,कल्पना सरोज ,मिलिंद कांबले ,राजा नायक ,सारथबाबू इल्यूमलाई , अशोक खाडे ,भगवान गवई आदि सैकड़ो अनुकरणीय नाम आपको भारत के पूंजीपतियों की लिस्ट में मिल जायेंगे जिन्होंने    न केवल अपने विवेक एवं लगन से यह मुकाम हासिल किया अपितु  समाज के उत्थान  में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वर्तमान में इन्हें  शोषित /दबा हुआ /कुचला हुआ किस प्रकार कहा जा सकता है ?

जे एन यू के प्रोफेसर विवेक कुमार के अनुसार दलित शब्द का जिक्र सबसे पहले वर्ष 1831 की मोल्सवर्थ डिक्शनरी में पाया जाता है। दलित शब्द का भारत के संविधान में भी कोई जिक्र नहीं है। वर्ष 2008 में नेशनल ऐस सी कमीशन ने सारे राज्यों को यह निर्देश भी दिया था कि राज्य अपने आधिकारिक दस्तावेजों में ‘दलित’ शब्द का प्रयोग न करे।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने का भी आदेश माननीय न्यायालय  ने दिया है I  राजनितिक विश्लेषक मनीषा प्रीतम का कहना है कि ‘ दलित ‘ शब्द लोकभाषा के शब्द दरिद्र से आया है । किसी जाति विशेष से यह शब्द नहीं जुड़ा है . 1939 में राष्ट्रकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘ निराला ‘ ने भी एक कविता में ‘ दलित ‘ शब्द का प्रयोग किया था जो इस बात कि पुष्टि करता है कि यह शब्द प्रचलन में तो था परन्तु बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता था ।

दलित जन पर करो करुणा ।

दीनता पर उतर आये प्रभु ,

प्रभु, तुम्हारी शक्ति वरुणा ।

यह कविता ‘ अणिमा ‘ नामक काव्य संग्रह में 1943  में छपी थी ।

बाबा भीमराव आंबेडकर ने भी इस शब्द का प्रयोग बाद में अपने भाषणों में ‘depressed classes ‘ कहकर प्रचालित किया था। अफ्रीकी -अमेरिकी ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रभावित होकर संभवतः वर्ष 1972 में महाराष्ट्र में नामदेव ढसाल ,राजा ढाले  और अरुण कांबले आदि नेताओं ने दलित पैंथर्स नाम की एक सामाजिक -राजनीतिक संगठन बनाया। उत्तर भारत में माननीय काशीराम ने इस शब्द को डी एस 4 जिसका अर्थ ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समीति ‘ बनाकर प्रचालित किया जिसे बाद में बहुजन समाज पार्टी का नाम दिया गया।

“दलित” शब्द का विलोम अदलित , शोषक,फलित  होता है। क्या आज हमारे देश  में सभी सामान्य अथवा पिछड़ी जाति के लोग, चाहे वह किसी कार्यालय में चपरासी अथवा किसान या दैनिक मजदूर ही क्यों न हो , को अदलित अथवा शोषक अथवा फलित  माना जा सकता है ? उपरोक्त शाब्दिक अर्थों से यह स्वयं स्पष्ट  है कि दलित और फलित शब्द किसी जाति विशेष के लिए नही होना चाहिए बल्कि दलित और फलित कोई भी हो सकता है चाहे वह किसी भी जाति अथवा धर्म का हो । यहाँ तक कि भारत सरकार अधिनियम 1935 एवं संविधान के अनुच्छेद 341 तथा 342 में भी अनुसूचित जाति /जनजाति शब्द का प्रयोग हुआ है ,न कि दलित शब्द का।

परन्तु आज कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञों एवं उनके द्वारा पोषित कुछ  मीडिया वालों ने अनुसूचित जाति के स्थान पर दलित शब्द का प्रचार -प्रसार करना शुरू कर दिया है। इन्हीं  गलत लोगों ने समाज को हिन्दू , मुस्लिम के नाम पर बांटा और अब जाति के नाम पर बाँटना शुरू कर दिया है। ऐसे लोग अपने गलत मकसद में कामयाब न हों , इसके लिए सबसे अधिक गावों एवं कस्बों के सवर्णों को अपने मन से अस्पृश्यता की भावना को दूर करना होगा और अनुसूचित जाति के लोगों को भी यह ध्यान में रखना होगा कि वे किसी भी स्वार्थी राजनीतिज्ञों के बहकावे में न आएं।

आजादी के 70 वर्षों के बाद भी अनुसूचित जाति /जनजाति की सामान्य स्थिति डॉ आंबेडकर  के स्वप्न के अनुसार जितनी बेहतर होनी चाहिए , वह आज नहीं है। डॉ आंबेडकर ने गाँधी से कहा था कि सामाजिक आंदोलन का वर्चस्व राजनितिक आंदोलन पर होना चाहिए। राजनितिक आंदोलन से सत्ता सुख तो मिल जाएगा परन्तु   समाज में ऐच्छिक बदलाव नहीं आ पायेगा। इसलिए यदि समाज बदलना है तो सामाजिक आंदोलन अत्यंत आवश्यक है। उचित सामाजिक आंदोलन से जन-मानस में जो बदलाव आता है, उसका असर समाज के सभी वर्ग, धर्म एवं जातियों पर देखा जा सकता है।

वास्तव में सामाजिक परिववर्तन की कोशिश  बुद्ध ,गाँधी ,आंबेडकर ,ज्योतिबा फूले आदि महान आत्माओं ने किया था। इन लोगों ने सामाजिक आंदोलन के माध्यम से मानसिक परिवर्तन की बात की थी। आज अनुसूचित जाति /जनजाति के जीवन स्तर में आप जो   कुछ भी परिवर्तन देख रहे हैं वह इन्ही महान आत्माओं के प्रयास का फल है।

आंबेडकर ने वर्ष 1936 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी बनाई थी। बाद में वर्ष 1942 में उन्होंने Scheduled Casts Federation की स्थापना की। फिर उन्होंने आजादी के बाद 1956 में फेडरेशन को भंग करके रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना की। उनके निर्वाण के उपरांत यह पार्टी कई गुटों में बँट गयी। उसके बाद तो दलित राजनीति   की आड़  लेकर कई राजनीतिक पार्टियाँ बनी। आंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले इन दलों ने दलितों को वास्तव में वह फायदा नहीं पहुँचाया जिसके वे वास्तविक हक़दार थें।

दलित के नाम पर राजनीति करने वाले इन दलों ने दूसरे दलों के साथ गठजोड़ /समर्थन करने से भी परहेज नहीं किया चाहे उनकी विचारधारा एक दूसरे से मेल नहीं खाती हो। उनका एकमात्र मकसद सत्ता सुख को प्राप्त करना है। डा 0 आंबेडकर व्यक्ति पूजा के खिलाफ थें। वे कहते थें कि मुझे भक्त नहीं , अनुयायी चाहिए। परन्तु इन पार्टियों में तो भक्तजनों की भरमार है। डा0 आंबेडकर राजनीतिक पार्टी में लोकतंत्र के प्रबल पक्षधर थें परन्तु वर्तमान दलित पार्टियों में तो घोर व्यक्तिवाद और अधिनायकवाद है। अब तो राजनीति में दलित नहीं बल्कि महागठबंधन की तर्ज पर महादलित जैसे  शब्दों का भी प्रयोग होने लगा है।

अगर कुछ सीखना ही है तो जापान जैसे राष्ट्र से सीखना चाहिए।  जापान भी कभी हमारी तरह वर्ण व्यवस्था ,ऊंच -नीच , छुआ -छूत के रोग से ग्रसित था।  परन्तु , आज वे इन बुराइयों को दूर कर कितनी उन्नति कर चुका है।

आज के समय में जातिवादी पार्टियों की जरुरत देश के उत्थान के लिए बिल्कुल नहीं है बल्कि अगर वास्तव में हमारे नेता समाज एवं देश की उन्नति  चाहते हैं तो सबके सहयोग से जाति -व्यवस्था विरोधी एक  मोर्चा बनाकर समाज के उत्थान के विषय में सोचते। अन्यथा, जाति एवं धर्म की राजनीति हीं मजबूत होंगी जो वर्तमान लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

दरअसल आज के समय में सत्ता प्राप्ति के लिए अधिकतर राजनेताओं को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि समाज एवं देश का उत्थान हो। उन्हें तो बंटवारे के वोट  द्वारा सिर्फ सत्ता चाहिए और इसके लिए जाति एवँ धर्म के नाम पर लोगों में वैमनस्य पैदा करना उनकी आदत सी हो गई है। इस कार्य के लिए उनके पास सबसे बड़ा एक हथियार आरक्षण भी है।

आज आरक्षण अनुसूचित जाति /जनजाति के उत्थान के लिए नहीं बल्कि जाति व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रयोग हो रहा है। समाज में बहुत से लोग अच्छे साधन सम्पन्न हो गए हैं। उनलोगों को जाति आरक्षण का लाभ स्वतः त्याग देना चाहिए ताकि यह लाभ वास्तविक बचे हुए जरूरतमंद और गरीब को मिल सके।

डा ० आंबेडकर ने स्वयं कहा था कि दस वर्षों के बाद यह समीक्षा हो कि जिनको आरक्षण दिया जा रहा है क्या उनकी स्थिति में सुधार हुआ या नहीं ? उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से कहा था कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग का विकास हो जाता है तो उसके आगे की पीढ़ी को इस व्यवस्था का लाभ नहीं देना चाहिए क्योंकि आरक्षण का मतलब बैसाखी नहीं है जिसके सहारे आजीवन जिंदगी जिया जाए , यह तो मात्र एक आधार है -विकसित होने का। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा था कि आरक्षण लोगों के बीच दरार पैदा करेगी।

आज के कुछ स्वार्थी नेताओं की सोंच इस सन्दर्भ मेँ तो अंग्रेजों से भी गिरी हुई निकली। अब तो आरक्षण के नाम पर अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति , ओ बी  सी , अत्यंत पिछड़ा वर्ग , क्रीमी लेयर और  अल्पसंख्यक के नाम पर समाज का बंटवारा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। कुछ उपजातियाँ तो सिर्फ इसलिए उग्र आंदोलन कर रही हैं कि उन्हें भी ओ बी सी मानते हुए आरक्षण का लाभ मिले तो कुछ उपजातियाँ इसका विरोध कर रही है।  ऐसे लोग सिर्फ अपनी कुर्सी चाहते हैं।

मुझे अस्सी के दशक की एक बात अभी भी याद है। बात बिहार के एक शहर मुजफ्फरपुर की है। उस समय के एक अत्यंत ही धनाढ्य नेता जी से उस समय की शिक्षा  तथा जाति व्यवस्था की कमियों के बारे में बातचीत हो रही थी तो उन्होंने कहा था –  “जब तक 100 बेबकूफ नहीं होंगे तब तक एक दिमाग वाले को कौन पूछेगा। ” इसी सन्दर्भ में मुझे लगता है कि आज भी अधिकतर स्वार्थी नेता वास्तव में न तो समाज में समानता चाहते हैं और न ही गरीब अथवा समाज के निचले पावदान के लोगों का उत्थान।

आंबेडकर चाहते थे कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को उचित प्रतिनिधित्व मिले जिससे कि देश के विकास में सबकी भागीदारी हो। शरीर को तभी स्वस्थ कहा जा सकता है , जब शरीर के सभी अंग स्वस्थ हों। उसी प्रकार यदि समाज का कोई भी वर्ग अथवा जाति समूह अथवा धर्म समूह मानसिक ,शारीरिक एवं आर्थिक रूप से सबल नहीं हो तो हमारा देश कभी भी स्वस्थ  नहीं हो सकता है।

एलजेपी नेता तथा जमुई से सांसद श्री चिराग पासवान ने भी कहा है कि ” मेरे विचार से सभ्य वित्तीय पृष्टभूमि से आने वाले लोगों को स्वतः आरक्षण का लाभ छोड़  देना चाहिए . इससे इस समुदाय के वास्तविक जरूरतमंद लोगों को आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे .

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसँख्या 1,210,854,977 अर्थात् 121 करोड़ से अधिक थी। इनमें अनुसूचित जाति का प्रतिशत् 16.6 %  अर्थात् 20 करोड़ से अधिक एवं अनुसूचित जनजाति का प्रतिशत् 8. 6 % अर्थात् 10 करोड़ से अधिक थी। आज 2018 में इस संख्या में और भी इजाफ़ा हुआ होगा। अनुसूचित जनजाति की समस्या सामाजिक शोषण का  नहीं बल्कि आर्थिक शोषण का है।

सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना 2011 के अनुसार 5. 37 करोड़ ग्रामीण भूमिहीन हैं जिनका मुख्य आय श्रोत दैनिक मजदूरी है। ग्रामीण भारत की 36 % आबादी अशिक्षित है। जो 64 % ग्रामीण आबादी शिक्षित है उनमें से प्रत्येक पांच  में से एक ने प्राइमरी स्कूल भी नहीं पास किया है। कुल 44. 72 करोड़ भारतीय अशिक्षित थे जो कुल आबादी का लगभग एक तिहाई है। यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि सात वर्ष या अधिक के उम्र का व्यक्ति जो किसी भी एक भाषा में पढ़  और लिख सकता हो , को शिक्षित माना जाता है। उपरोक्त से आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि हम आज कहाँ हैं।

बाबा साहेब ने कहा था – “जाति ईटों की दीवार या कांटेदार तारों की लाइन जैसी कोई भौतिक वस्तु नहीं है जो हिन्दुओं को मेल मिलाप से रोकती हो और जिसे तोड़ना आवश्यक हो। जाति एक धारणा है और यह एक मानसिक स्थिति है। अतः जाति को नष्ट करने का अर्थ भौतिक रुकावटों को दूर करना नहीं है ।”  इसका अर्थ विचारात्मक परिवर्तन से है।

वर्तमान राजनीति तो जातिवाद को और सबल बना रही है। आज के राजनीतिज्ञ जाति के आधार पर वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं। वे जाति व्यवस्था से जो बुराई उपजी है , उसमें खाद डालकर और सींच रहे हैं। समाज को जाति -जाति एवं धर्म -धर्म में बाँट कर/दूरियाँ पैदा कर वोट की राजनीति हीं कर रहे हैं।

समाज में व्याप्त छुआ -छूत /ऊंच -नीच एवं आपसी वैमनस्य को समाप्त कर गाँधी /आंबेडकर /ज्योतीबा आदि महापूरूषो के सपनों का समाज बनाने हेतु लेखक के कुछ निजी  विचार मनन हेतु प्रस्तुत है :-

  1. गरीबी रेखा से नीचे के अनुसूचित जाति /जन जाति के लोग आर्थिक रूप से सबल हो जाएं तो जाति के बंधन कुछ ढ़ीले हो सकते हैं।
  2. साधन सम्पन्न /समृद्ध आरक्षित वर्ग के व्यक्ति या तो स्वेच्छा से आरक्षण का लाभ त्याग दें अथवा सरकार कानून बनाकर सुविधासम्पन्न वर्गों का आरक्षण समाप्त करे। ऐसा करने से यह लाभ वास्तविक जरूरतमंद अनुसूचित जाति /जनजाति के लोगों को मिल सकेगा। अगर ऐसा हुआ तो आप स्वयं देखेंगे कि समाज में ऊँच -नीच की जो खाई है वह कितनी तेजी से समाप्त होगी।

3.गरीबी रेखा से नीचे के सवर्णों के आर्थिक उत्थान के लिए भी सरकार को विचार करना चाहिए। ऐसा करने से आपसी वैमस्य  की भावना भी नहीं पनपेगी।

  1. अन्तर्जातीय विवाह को सरकार एवं समाज द्वारा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। विभिन्न अवसरों पर सामूहिक भोजन का इंतजाम होना चाहिए। गुरुद्वारा के लंगरों में इसी प्रकार की व्यवस्था की जाती है। यहाँ बिना जाति और धर्म का भेदभाव किये सभी एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।
  2. समुचित शिक्षा व्यवस्था जाति व्यवस्था में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने में अहम् भूमिका निभा सकता है। इसके लिए स्कूली पाठ्यक्रम में भी छुआ -छूत /ऊंच -नीच जैसी कुरीतियों से समाज को होने वाले नुकसान तथा इस मानसिक विकृति को दूर करने से समाज एवं देश का किस प्रकार विकास संभव है ,बताया जाए। यह कार्य सरकार द्वारा किया जाना चाहिए। परन्तु , समाज के हर प्रत्येक नागरिक का भी व्यक्तिगत योगदान महत्वपूर्ण है।
  3. हालाँकि निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act )बना हुआ है परन्तु एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER ),2017 के अनुसार ग्रामीण प्राथमिक शिक्षा की स्थिति उत्साहजनक नहीं है। सरकार तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा मेरे विचार से ऐसी योजनायें बनानी चाहिए जिससे शिक्षा के साथ-साथ रोजगार भी मिले। कहने का अर्थ यह है कि इस प्रकार के स्कूल में जब शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करने जाये तो किताबी शिक्षा के साथ ही स्कूलों द्वारा संचालित गृह /कुटीर उद्योगों में भी कुछ घंटे तकनीकी शिक्षा लेकर कार्य करे और इन उद्योगों से होने वाली आय को उसी अनुसार बच्चों में बांटा जाए तथा साथ में मिड डे मील की भी व्यवस्था हो। । ऐसा होने से अत्यन्त गरीब /दैनिक मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी अपने बच्चे को स्कूल भेजेगा। इससे बाल -मजदूरी जैसे रोग से भी धीरे-धीरे निज़ात पाया जा सकता है। आज के समय में ज्यादातर गरीब अपने बच्चों को इसलिए भी स्कूल नहीं भेज पाते हैं क्योकि वे बच्चे रोज कुछ न कुछ कमा कर पैसा घर लाते हैं। अगर उन्हें स्कूल भेजेंगे तो यह तात्कालिक कमाई खत्म हो जाएगी I
  4. हर धर्म /समाज यहाँ तक कि कानून भी कहता है कि सज़ा उसी को मिलनी चाहिए जो गलती करे। भूतकाल में विकृत मानसिकता वाले सवर्णों (सभी नहीं ) द्वारा जो अत्याचार अछूतों पर हुआ था ,उसकी सजा आज के सवर्ण लोगों को नहीं मिलनी चाहिए। बल्कि इस विकृत सोंच वाली मानसिकता को समाप्त कर सभी को एक स्वस्थ विचारधारा में प्रवाहित करने का प्रयास होना चाहिए।

अगर इतिहास ही देखें तो पाएँगे कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के शिक्षक श्री महादेव आंबेडकर एक ब्राह्मण थे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को न केवल  उचित शिक्षा दी अपितु उनसे प्रभावित होकर अपना सरनेम “आंबेडकर “भी प्रदान किया। डाक्टर आंबेडकर की पत्नी डॉक्टर शारदा आंबेडकर भी एक ब्राह्मण महिला थीं। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय जो बड़ोदरा रियासत के राजा थे ,ने डा o आंबेडकर को उच्च  शिक्षा प्राप्ति में महत्वपूर्ण सहयोग दिया था।

  1. अगर राजनेता एवं मीडिया (प्रिंट तथा डिजिटल ) ईमानदारी से सोच ले तो इस समस्या से वास्तव में निज़ात पाया जा सकता है। इनके द्वारा यह कोशिश होनी चाहिए कि समाज के विभिन्न वर्गों में भाईचारा हो , न कि द्वेष। कुछ मीडिया द्वारा समाचारों को दलित के नाम पर इस तरह बेचा जा रहा है कि यह खाई बढ़ती ही जाए जिसे वोटबैंक के रूप में परिवर्तित किया जा सके। भारत के हर प्रबुद्ध नागरिकों को चाहिए कि इनका बहिष्कार करें।
  2. जातिगत भेदभाव एवं छुआछूत वाले मामले में दोषी को न्यायपालिका द्वारा कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए जिससे कि भविष्य में किसी को भी ऐसा घृणित कार्य करने का साहस न हो परन्तु साथ ही माननीय न्यायालय द्वारा यदि यह निर्णय होता है कि किसी सवर्ण को झूठा फसाने के लिए झूठा एफ आई आर लिखाया गया है तो गलत एफ आई आर लिखाने वाले पर भी कठोर कार्यवाही होनी चाहिए।

अंत में लेखक सिर्फ इतना कहना चाहता है कि अगर राजनीतिज्ञ समाज को बाँट कर वोटबैंक की राजनीति करना छोड़कर मोहल्ला ,गाँव ,समाज एवं देश का विकाश करने का सोचें तो भविष्य मेँ जाति द्वेष वास्तव में समाप्त हो जाएगा। लोगों को चाहिए कि ऐसी ओछी राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों  का बहिष्कार करना प्रारम्भ कर दें।  जिस दिन लोग अपने मताधिकार का उपयोग जाति एवं धर्म को छोड़ कर अपने विवेक से ऐसे उम्मीदवार के लिए करना शुरू कर दें जो वास्तव में समाज और देश के हित की सोचे , तो  इस समस्या के  समाधान स्वतः होना प्रारम्भ हो जाएगा।अगर देश की युवा पीढ़ी ( विशेषकर गावों और कस्बों में ) अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक हो जाए तो उम्मीद की जा सकती है अस्पृश्यता/छुआछूत का अभिशाप हमारे समाज से बहुत जल्द समाप्त हो जाएगा और हमारा देश समानता एवं भाईचारे के नये युग में प्रवेश करेगा जिसकी कल्पना गाँधी और आंबेडकर ने की थी।

(ये लेखक के निजी विचार हैं )

 

लेखक

डी पी खरे

 

 

 

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