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गठबंधन की राजनीति

Posted On: 5 Feb, 2019 Politics में

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गठबंधन की राजनीति

आजादी के बाद लगभग 30 वर्षों तक एक ही राजनितिक दल  ‘कांग्रेस’ का  हमारे देश में एकछत्र राज रहा । 25 जून 1975 की आधी  रात को इमरजेंसी लगाई गयी । जनता के सारे मूलभूत अधिकार छीन लिए गए । लोगों के बीच दुर्गा की छवि रखने वाली प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की छवि एक दमनकारी नेता के रूप में बदल गयी । इंदिरा गाँधी के इस फैसले के विरूद्ध उस समय पूरा विपक्ष एकजुट हो गया था । यही पहली बार था जब उस समय के सभी दलों ने गठबंधन बना कर केंद्र में 1977 में चुनाव लड़ा । इसमें मुख्य घटक दल – कांग्रेस (ओ), जनसंघ , भारतीय लोकदल  एवं समाजवादी पार्टी थे। इस चुनाव के बाद कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद प्रथम गठबंधन सरकार जनता पार्टी के नाम से बनाई । इस सरकार के  प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने 23 मार्च 1977 को शपथ ग्रहण किया । परन्तु , अल्प समय में ही दिनांक 28 जुलाई , 1979 को ही त्याग पत्र देना पड़ा। इसके बाद चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व की सरकार 28 जुलाई ,1979 से 14 जनवरी , 1980 तक ही चल पायी  । इसके बाद 1989 से 1999 के बीच आठ अलग – अलग सरकारें बनी जो गठबंधन के राजनीति की ही देन   थी ।

1998 के चुनाव के पहले 13 पार्टियों ने मिलकर नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स ( एन डी ए ) बना कर चुनाव जीता,  और  अटल बिहारी बाजपेई के नेतृत्व में सरकार बनाया जो AIDMK  के समर्थन वापस लेने के कारण महज 13 महीने तक ही चल पाई । आखिरकार,  1999 में NDA  को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिला और अटल बिहारी बाजपेई ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया । इसके बाद लेफ्ट एवं अन्य कई दलों के सहयोग से UPA  ने 2004 से 2014 तक दस वर्षों तक प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार चलाई । इस गठबंधन में भी कई दल ऐसे थे जो कभी NDA  में रह चुके थे और बाद में पुनः NDA में चले गए । फिलहाल  नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA की सरकार है जिसका कार्य काल इसी वर्ष पूरा हो रहा है ।

उपरोक्त चर्चा तो केंद्र के राजनीति की थी । जहाँ तक राज्य राजनीति की बात है तो भारत में पहली गठबंधन सरकार की स्थापना 1953 में आंध्र प्रदेश में हुई थी जो मात्र 13 माह की अल्प अवधि में ही टूट गयी । इसके बाद 1957 में उड़ीसा में गठबंधन की जो सरकार बनी वह भी अपना कार्यकाल पूरा किये बिना ही मात्र एक वर्ष पूर्व हीं विघटित हो गयी । 1967 में  पश्चिम बंगाल में भी गठबंधन की सरकार असफल हो गयी । आज तो ज्यादातर राज्यों में तो गठबंधन की ही सरकार है ।

2019  के आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कई न्यूज चैनलों द्वारा किये गए सर्वे के अनुसार भी NDA  अथवा UPA में से किसी भी दल को अकेले पूर्ण बहुमत नहीं मिल पा रहा है ।

गठबंधन शासन-व्यवस्था का मूल-मन्त्र सहमति एवं सहयोग होना चाहिए । परन्तु , इस समय हो रहे गठबंधन अथवा महागठबंधन में तो एक मंच पर आने वाले दलों में तो लेशमात्र भी सहमति अथवा वैचारिक समानता होने का तो प्रश्न ही नहीं है । इस समय वे दल भी गठबंधन अथवा महागठबंधन में एक साथ खड़े हैं जो कभी एक -दूसरे के विरुद्ध अभद्र भाषा का प्रयोग बेहिचक करते थें । एक दूसरे को सत्ता से हटाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे । वर्तमान राजनीति के इतिहास को देखें तो आप स्वयं समझ सकते हैं कि इनकी बार-बार कि दोस्ती, धोखाधड़ी, सौदेबाजी एवं ब्लैकमेलिंग गठबंधन राजनीति कि सच्चाई बन गई है ।

उपरोक्त से आप समझ सकते हैं कि इस तरह के गठबंधन की सरकार जनता के लिए कितनी सार्थक होगी ।इससे होने वाले नुकसान को तो आप पूरी तरह तो गिन भी नहीं सकते हैं । कुछ नुकसानों की चर्चा यहाँ की जा रही है :-

 

  1.  सरकार का अपना कार्य-काल पूरा न कर पाना । फलतः मध्यावधि चुनाव का अनावश्यक बोझ झेलना ।

2014 के लोकसभा चुनाव में सरकारी खजाने से 3870 करोड़ रूपए किये गए हैं । यह   खर्च स्पष्ट रूप से आम जनता को ही वहन करना पड़ता है । इसके अतिरिक्त भी राजनितिक दलों द्वारा कितने पैसे खर्च किये जाते हैं , इसका अनुमान तो पाठक स्वयं लगाएं तो बेहतर होगा । ये खर्च तो लोकसभा चुनाव का दर्शाया गया है । इसके अलावा  राज्यों के विधान सभा चुनाव का खर्च अतिरिक्त है ।

  1. सदन ठीक से नहीं चलने देने के कारण कीमती समय तथा जनता के पैसे की बर्बादी :

कुछ माननीय सांसदों एवं विधायकों के गलत आचरण , जैसे कि सदन में अनावश्यक हंगामा करना , एक -दूसरे के विरुद्ध अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना , यहाँ तक कि तोड़-फोड़, हाथा-पायी करना आदि । सदन के एक मिनट की कार्यवाही पर ढाई लाख रूपए यानि प्रतिदिन 9 करोड़ खर्च होते हैं । पी आर लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार 16 वीं लोकसभा के शीतकालीन सत्र में अपने कार्य हेतु निर्धारित समय में से सिर्फ 14% एवं राज्य सभा में 5% हीं समय का उपयोग हो सका है ।

इससे आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि हमारे-आपके द्वारा चुनाव में अपने मताधिकार का उचित प्रयोग न करने के फलस्वरूप हमारे द्वारा ही चुने गए हमारे भाग्य-विधाताओं द्वारा किनता कीमती समय और जनता के हजारों करोड़ का अपव्यय किया जा रहा है ।

स्पष्ट है कि गठबंधन की एक मिली-जुली सरकार को ही जन्म देती है जो चुनाव से पहले घनिष्ट मित्र तथा सरकार बनाने तक सिर्फ मित्र नजर आते हैं ।परन्तु , कुछ अवधि के बाद हीं ब्लैकमेलिंग, सौदेबाजी, जाति, धर्म, एवं क्षेत्रीय संकीर्णताओं के कारण हीं या तो सरकार गिरने की स्थिति हो जाती है अथवा ऐसे भी बिल पास कराने की स्थिति हो जाती है जो भविष्य में देश की अखंडता, एकता, एवं विकास में रोड़ा साबित हो जाता  है ।

 

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