blogid : 488 postid : 1149323

धार्मिक आयोजनों में समरसता

Posted On: 1 Apr, 2016 Others में

***.......सीधी खरी बात.......***!!!!!!!!!!!! मेरी हर धड़कन भारत के लिए है !!!!!!!!!!

डॉ आशुतोष शुक्ल

2164 Posts

790 Comments

कर्नाटक के पुत्तुर जिले के एक धार्मिक रथयात्रा कार्यक्रम उपयुक्त का नाम छापे जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अजीब शक्ल लेता हुआ नज़र आ रहा है. पूरे मामले में इस मंदिर की वार्षिक यात्रा के समय बनते गए आमंत्रण पत्रों पर उपयुक्त एबी इब्राहिम का नाम छपा गया जो कि कर्नाटक के हिंदू रिलेजियस इंस्टीट्यूशंस एंड चैरिटेबल एनडाउमेंट ऐक्ट १९९७ की धारा ७ के अनुसार मुरजई मंदिर के निमंत्रण पत्र पर किसी गैर-हिंदू शख्स का नाम नहीं हो सकता. इस कानून के अनुसार तो जिसकी हिंदू धर्म में आस्था नहीं है, उस व्यक्ति का नाम भी निमंत्रण पत्र पर नहीं छापा जा सकता है. सरकार की तरफ से इस तरह के निमंत्रण छापे जाने विरुद्ध कुछ लोग इस मामले को उच्च न्यायालय तक ले गए जिसके बाद और भी अजीब स्थिति बन गयी क्योंकि एक तरफ चीफ जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी ने इसे अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा के सन्दर्भ में भी लिया और स्पष्ट किया कि वहां मुस्लिम समुदाय के लोग भी हर स्तर पर मिलजुल कर विभिन्न धार्मिक त्यौहार मनाते हैं साथ ही उन्होंने इस पूरे विवाद को ही मूर्खता पूर्ण भी कहा पर साथ ही कानूनी बाध्यता के चलते सरकार को उपायुक्त को मौके पर मौजूद न रहने के लिए व्यवस्था करने को भी कहा.
इस पूरे प्रकरण में यह बात तो स्पष्ट हो ही गयी है कि हमारी विधायिका भी कानून बनाते समय किस तरह का व्यवहार करती और और कई बार कुछ ऐसा कदम भी उठा लेती है जिनके चलते इस तरह का भ्रम भी पैदा हो जाता है. कर्नाटक में १९९७ का विधेयक कुछ इस तरह की बातों को संरक्षण देता है कि हिन्दुओं के धार्मिक कार्यक्रमों में राज्य का कोई मुस्लिम इस तरह से भी शामिल नहीं हो सकता है जो कि स्पष्ट रूप से भविष्य में सरकार चलाने में एक बड़े अवरोध के रूप में काम करने वाला है. सरकार का कहना है कि सामान्य प्रोटोकॉल और शिष्टाचार के चलते ही उपायुक्त का नाम इस पत्र पर छपा गया था और उपायुक्त जिले की कानून व्यवस्था के लिए हर स्तर पर ज़िम्मेदार होता है इस परिस्थिति में अब सरकार के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं क्योंकि कोर्ट ने उपायुक्त को मौके पर न भेजने की बात कही है तो क्या आने वाले समय में किसी हिन्दू धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन से पहले अब सरकार यह भी सुनिश्चित करने लगेगी कि उस क्षेत्र में कोई गैर हिन्दू अधिकारी भी तैनात न हो ? फिर ऐसा भी हो सकता है कि आने वाले समय में यही बात देश के अन्य धार्मिक समूह भी ऐसी ही मांग करने लगेंगें तो उस स्थिति से आखिर किस तरह से निपटा जायेगा ? आज देश में जिस धार्मिक आधार पर बंटवारा किया जाता रहता है उस परिस्थिति में क्या सरकारी आयोजनों में इस तरह के तुगलकी विधेयकों के द्वारा कोई निर्णय लिए जाएंगें जो सामाजिक समरसता को पूरी तरह से छिन्न भिन्न करने वाले ही अधिक हैं ? क्या कम पुलिस बल से जूझ रहे राज्य आने वाले समय में पुलिस की तैनाती भी धार्मिक आयोजनों के आधार पर करने के लिए बाध्य किए जाएंगें और समाज के बीच की खाई को पाटने के स्थान पर उसे और भी गहरा करने का काम किया जाने लगेगा ?
राजनैतिक रूप से धार्मिक आधार पर बेहद संवेदनशील यूपी में एक मुस्लिम, चर्चित और मुखर नगर विकास मंत्री मो० आज़म खां के कारण कभी भी आज तक इस बात के कोई आरोप नहीं लगे कि उनकी तरफ से इलाहाबाद के कुम्भ या वार्षिक माघ मेले में व्यवस्था के स्तर पर कोई भेदभाव गया था ? यदि ऐसा होता तो यूपी में १९७७ की जनता सरकार में सीएम रामनरेश यादव के मंत्रिमंडल के मंत्री हाजी आबिद अली अंसारी हिन्दुओं के पवित्रतम नैमिषारण्य चक्र तीर्थ और मिश्रिख में दधीच कुंड का जीर्णोद्धार क्यों करवाते ? आज यूपी में एक तेज़ तर्रार मुस्लिम डीजीपी होने के कारण क्या उनको किसी बड़े हिन्दू धार्मिक आयोजन की तैयारियों से इसलिए वंचित किया जा सकता है कि वे मुस्लिम हैं ? यह सब बातें कुछ इस तरह से लगती हैं जैसे हम मध्ययुगीन राजाओं के समय में वापस लौट रहे हैं जहाँ बिना कुछ सोचे समझे कुछ भी कहने और करने के लिए राजाज्ञा जारी कर दी जाती है. अच्छा हो कि कर्नाटक के इस बिल को सुशासन के लिए एक बाधा मानते हुए अविलम्ब समाप्त किया जाये और इस मामले में खुद चीफ जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी को ही पहल करनी चाहिए और जनहित में स्वतः संज्ञान के माध्यम से कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी कर इसे समाप्त करने के लिए आगे आना चाहिए.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग