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डा श्याम गुप्त के अगीत .....

Posted On: 6 Oct, 2014 Others में

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drshyamgupta

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डा श्याम गुप्त के  अगीत

अगीत

१.टोपी

वे राष्ट्र गान गाकर
भीड़ को देश पर मर मिटने की,
कसम दिलाकर;
बैठ गए लक्सरी कार में जाकर ;
टोपी पकडाई पी ऐ को

अगले वर्ष के लिए

रखे धुलाकर |

२.

प्रकृति सुन्दरी का यौवन….

कम संसाधन

अधिक दोहन,

न नदिया में जल,

न बाग़-बगीचों का नगर |

न कोकिल की कूक

न मयूर की नृत्य सुषमा ,

कहीं अनावृष्टि कहीं अति-वृष्टि ;

किसने भ्रष्ट किया-

प्रकृति सुन्दरी का यौवन ?

 3.

माँ और आया

” अंग्रेज़ी आया ने,
हिन्दी मां को घर से निकाला;
देकर, फास्ट-फ़ूड ,पिज्जा, बर्गर –
क्रिकेट, केम्पा-कोला, कम्प्यूटरीकरण ,
उदारीकरण, वैश्वीकरण 
का  हवाला | “

४.

लयबद्ध अगीत

तुम जो सदा कहा करती थीं 

मीत सदा मेरे बन रहना |

तुमने ही मुख फेर लिया क्यों

मैंने  तो कुछ नहीं कहा था |

शायद तुमको नहीं पता था ,

मीत भला कहते हैं किसको |

मीत शब्द को नहीं पढ़ा था ,

तुमने मन के शब्दकोश में ||

५.

   प्रश्न
कितने शहीद ,
कब्र से उठकर पूछते हैं-
हम मरे किस देश के लिए ,

अल्लाह के, या-

ईश्वर के |

६.

बंधन
वह बंधन में थी ,
संस्कृति संस्कार सुरुचि के
परिधान कन्धों पर धारकर  ;
अब वह मुक्त है ,
सहर्ष , कपडे उतारकर ||

लना निश्चित |

.

लयबद्ध षटपदी अगीत

१.

 पुरुष-धर्म से जो गिर जाता,

अवगुण युक्त वही पति करता;

पतिव्रत धर्म-हीन, नारी को |

अर्थ राज्य छल और दंभ हित,

नारी का प्रयोग जो करता;

वह नर कब निज धर्म निभाता ?

२.

जग की इस अशांतिक्रंदन का,
लालच लोभ मोहबंधन का |
भ्रष्ट पतित सत्ता गठबंधन,
यह सब क्यों, इस यक्षप्रश्न का |
एक यही उत्तर सीधा सा ;
भूल गया नर आप स्वयं को || ”

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