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बौद्धिकता परे भारतीय राजनीति

Posted On: 9 Apr, 2016 Others में

वंदे मातरम्''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

अभिषेक

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किसी भी विकासशील राष्ट्र के मूल समस्या में उस देश के धार्मिक,सांप्रदायिक अथवा जातीय विभेदों के नाम पर होने वाले संघर्ष शामिल नहीं होते न ही ऐसे विषय राष्ट्रीय चिंतन का केंद्र बिंदु बनने योग्य होते हैं किन्तु संयोग से भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय चिंतन के ये एकमात्र केंद्रबिंदु बन गए हैं.”असहिष्णुता, अमानवीयता और असंवेदनशीलता पूरे विश्व में समापन की ओर है किन्तु भारत में उत्थान की ओर” यह एक आम धारणा बन गयी है लगभग-लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों की जिनके मतभेद भारतीय जनता पार्टी से हैं.भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक दलों के नेताओं के बयान भी ऐसे अर्थहीन और अप्रासंगिक होते हैं जिनका उल्लेख करना भी किसी शिक्षित व्यक्ति की बौद्धिकता पर सवाल उठा सकता है.
कभी-कभी लगता है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी ने लोगों को इतना अमर्यादित कर दिया है कि इस अधिकार के सामने देश की एकता और अखंडता की कोई कीमत नहीं रह गयी है.अभिव्यक्ति के नाम पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंडियन आर्मी मुर्दाबाद, और कश्मीर की आज़ादी तक जंग जारी रहेगी ‘ जैसे जुमले क्षमा योग्य हैं क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्र सबको मिली हुई है. वाह क्या अधिकार है अभिव्यक्ति का अधिकार भी. जिस राष्ट्र द्वारा संचालित विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उसी राष्ट्र कि गरिमा को तार-तार किया जा रहा है ऐसी सहिष्णुता विश्व में कहाँ मिलेगी?
देश का एक बड़ा तबका प्रगतिवादी सोच की भेंट चढ़ रहा है. ये प्रगतिवादी आचरण से नहीं हैं अपितु सोच से हैं. प्रगतिवाद की परिभाषा इन्होने नयी बनायीं है. प्रगतिवाद के दायरे में क्या-क्या आता है यह भी उल्लेखनीय है, जैसे- देश को गाली देना,सत्तारूढ़ सरकार को गाली देना, भारत मुर्दाबाद के नारे लगाना, महिषासुर जयंती मनाना, अफ़ज़ल,कसाब और याकूब की बरसी मनाना, तिरंगा फाड़ना ये सब प्रगतिवाद है.
भारत में विचारधाराओं के साथ सबसे ज्यादा छेड़-छाड होती है. यहाँ हर महान व्यक्तित्त्व के नाम को भुनाया जाता है.हर विचारधारा पर चलने का एकमात्र उद्देश्य राजनीती की रोटी सेंकनी होती है.राजनीतिक पार्टियां और इन पार्टियों के नेताओं का एकमात्र उद्देश्य जनता के बीच मतभेद कराकर वोट बैंक तैयार करना है.जनता भी फायदेमंद खेती है, नफरत बो कर मलाई काटी जाती है.
रोहित वेमुला के आत्महत्या का जिस तरह से तमाशा खड़ा किया गया की जैसे लग रहा था सभी राजनीतिक पार्टियों में करुणा,दया, वात्सल्य और वीभत्स रस प्रदर्शित करने का दौर चल पड़ा हो. सभी संवेदनशील हो गए थे रोहित के लिए.कितनी असीम संवेदना उस मासूम के लिए सबके ह्रदय में थी. कोई पागल व्यक्ति भी इन राजनीतिक पार्टियों के ढोंग को भांप लेता पर भारतीय जनता और मिडिया दोनों को इन सबकी आदत बन गयी है. एक के आँख पर तो पट्टी पड़ी है और एक को तो हर न्यूज़ में मसाला मार के अपनी टी.आर.पी बढ़ानी है.
आत्महत्या पर प्राइम शो चलने का क्या मतलब होता है? आत्महत्या का भी विज्ञापन? लोगों में जीने की जिजीविषा पैदा करना साहित्यकारों,पत्रकारों का काम है पर ये लोग आत्महंता से भी सहानभूति रखने लगे? रोहित की मौत को सही ठहराने लगे..कैसी बौद्धिकता है इस देश की?
विदेशी दर्शन और विदेशी विचारकों से प्रभावित होना भारतियों की एक और विशेषता है.कुछ अच्छी चीज़ें सीखें या न सीखें बुरी चीज़ें पहले सीख लेते हैं. भारत में प्रगतिवादियों के कुछ ख़ास चेहरे हैं जिनके पदचिन्हों पर चलना एक ख़ास बौद्धिक वर्ग को अधिक अभीप्सित है. उन चेहरों के नाम हैं- ”कार्ल मार्क्स, लेनिन,रूसो और माओत्से तुंग”.
ये सारे चेहरे परिस्थितिजन्य थे और अब ये कहीं से भी किसी भी लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए प्रासंगिक नहीं रहे हैं.इनके रास्तों पे चलकर गृहयुद्ध,कलह और अराजकता के अतिरिक्त और कुछ हासिल नहीं किया जा सकता.जिन देशों में इन चेहरों का जन्म हुआ वहीँ ये विचारधाराएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं किंतु भारत में जूठन ढ़ोने की परंपरा रही है.
क्या चीन की मासूम जनता माओवाद से मुक्ति नहीं चाहती? क्या उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं चाहिए? क्या अभिजात्यवर्ग के सशन की अपेक्षा लोकतंत्र जनता को नहीं प्रिय होगा? हाँ! प्रिय है किन्तु जिन विचारधारों को भारतीय प्रगतिवादी ओढ़ रहे हैं उन्ही से चीन की मासूम जनता मुक्ति चाहती है. लेकिन भारतीय मार्क्सवादियों को ये कब समझ में आएगा…उन्हें तो बस अंधानुकरण की आदत है.
कुछ ऐसे भी बुद्धिजीवी मिले जिन्होंने ‘शहीद भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद’ तक को कम्युनिस्ट बता दिया.शायद उन्हें राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद के बीच का अंतर नहीं पता है.
जे.एन.यू में जो कुछ भी हुआ या एन.आई.टी.श्रीनगर में जो किया गया क्या यह भारतियों के मूल भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है? हाय! अब पाकिस्तान भी रहने योग्य हो गया…जय हो बौद्धिक आतंकवाद की.
इन दिनों भारतीय राजनीति में जो उथल-पुथल मची है उसे देख कर लग रहा है कि बहस के विषय बड़े संकीर्ण हो गए हैं.किसी को भी मुद्दों पर बात नहीं करनी है केवल बकवास पर सारा ध्यान केंद्रियत करना है.
किसी भी पार्टी या न्यूज़ चैनल वालों के बहस का विषय गरीबी,बेरोजगारी, भूखमरी, बीमारी, भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि मोहन भागवत, आदित्यनाथ, ओवैसी या दो चार और चिरकुट नेताओं ने क्या बयान दिए, कौन भारत माँ की जय नहीं बोला , कौन बोल रहा है या कौन नहीं बोलेगा? ये बहस का विषय है.
आज जितनी भटकी शैली मे मैंने लिखा है उससे कहीं ज्यादा भटकी भारतीय राजनीति है .राजनीती इतनी गन्दी हो गयी है कि सत्तापक्ष का विरोध करना विपक्ष का मौलिक कर्तव्य और विपक्ष की आलोचना करना सत्तारूढ़ पार्टी का मूल कर्तव्य हो गया है. इस तरह की विचारधारों से यदि देश बहार नहीं निकलता है तो भारत का भविष्य कभी भी स्वच्छ लोकतंत्र की ओर नहीं बढ़ सकता.
इन परिस्थितियों से उबरने के लिए जनता और मिडिया दोनों को पहल करनी होगी.जो ख़बरें धार्मिक,जातीय,सांप्रदायिक तनाव पैदा करें उनका प्रसारण न किया जाए.देश में और भी कई समस्याएं हैं उनपर ध्यान केंद्रित करना अधिक उचित होगा अपेक्षाकृत ”किसने क्या कहा?” इस पर शो बनाने से.
जनता को भी समझदारी दिखानी चाहिए की देश धर्म,जाती या संप्रदाय से परे होता है,यदि सब साथ मिलकर नहीं चलेंगे तो बिखर जाएंगे, फिर जो लोग इस देश के उज्जवल भविष्य का सपना लिए शहीद हुए उन्हें अपने बलिदान पर पश्चाताप होने लगेगा….कृतघ्न नहीं कृतज्ञ बनिए और संवैधानिक मूल्यों पर चल कर देश को प्रगति के पथ पर अग्रसर कीजिये…यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किये बिना हँसते-हँसते मौत को गले लगा लिया..आपके लिए..हमारे लिए..अपने सपनों के भारत के लिए…
जय हिन्द…वन्दे मातरम!

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