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समता का ढोंग

Posted On: 12 Dec, 2015 Others में

वंदे मातरम्''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

अभिषेक

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जब कभी सितारों के सितारे गर्दिश में आते हैं और वे किसी विवाद में पड़ते हैं तो कई बार लगता है कि वे कानून से परे हैं क्योंकि वे जनता के चहेते चेहरे होते हैं और सरकार के भी क्योंकि सितारे आम चुनावों मे भारी भीड़ इकठ्ठा करते हैं।आरोप तो न्यायधीशों पर भी लगता है कि वे भी सितारों के सेलिब्रिटी स्टेटस से अछूते नहीं रहते और अक्सर अपराधिक मामलों में भी पक्षपात कर बैठते हैं।
आरोप लगाने का एक कारण भारतीय न्यायालयों की शिथिलता भी है। अपराधिक मामलों में शिथिलता ठीक नहीं है पर न्यायालयों पर आवश्यकता से अधिक बोझ भी है। हाँ! अलग बात है ये बोझ हल्का हो जाता है जब कोई ऊँची रसूख वाला व्यक्ति वहां पहुँचता है। एक बात समझ में नहीं आती कि जब कोई फिल्मस्टार या बड़ा नेता किसी अपराधिक मामलों में फंसते हैं तो उनके साथ इतनी रियायत क्यों बरती जाती है? कई बार लगता है कि इन्हें कानून की गिरफ़्त में भी विशेषाधिकार मिल जाता है और निर्णय भी इन्हीं के पक्ष में आ जाता है। ऐसे निर्णय कानून की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं। विश्वास नहीं होता कि एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र में न्यायालयों का निर्णय अमीर बनाम गरीब देख कर आता है। पक्षपात पूर्ण निर्णय आते हैं। गरीबों को अनदेखा किया जाता है।
कारागारों में ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें कैदियों का अपराध अभी तक सिद्ध नहीं हुआ है फिर भी कारावास झेल रहे हैं क्योंकि अपनी बात उन्हें माननीय न्यायलय में रखने के लिए उनके पास वकील नहीं हैं। हालांकि हमारे संविधान में इसकी व्यवस्था की गई है।अनुच्छेद 21 में विधिक सहायता का भी अधिकार सन्निहित है किन्तु वास्तविकता की धरातल पर विधिक सहायता सरकार की ओर से केवल कुछ भाग्यशाली व्यक्तियों को ही मिल पाती है। इसका कारण यह भी है कि मुकदमों की संख्या अधिक है और अदालतों की संख्या कम किन्तु लोग अपने अधिकारों से वंचित तो हो रहे हैं इसपर सरकार का ध्यान नहीं जाता।
कई बार लगता है न्यायपालिका भी अमीरों की आवाजें जल्दी सुन लेती है और गरीबों की आवाजें देर से पहुँचती है।
दृष्टान्त भी कई हैं। सलमान खान को सज़ा मिली नहीं कि जमानत मिल गई। उनके पास पैसा है तो उनके लिए अलग से प्रोटोकॉल निर्धारित हैं। यह कैसी विधि के समक्ष समता है कि कोई वही अपराध करे तो जेल में रहे और किसी को सज़ा मिलते ही ज़मानत मिल जाये। यह कैसा लोकतंत्र है?
ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनमें कैदियों द्वारा नशे की हालत में या गाड़ी अनियंत्रित हो जाने से, या उपेक्षा से मृत्यु कारित हो जाने की वज़ह से जेल हुआ पर ज़मानत तक नहीं मिली क्योंकि ये लोग अपने लिए वकील नहीं रख सकते।
कुछ फैसलों पर गौर करें तो लगता है देश में समता का ढोंग किया जाता है। मेरी न्यायपालिका में पूर्ण आस्था है किन्तु यह आस्था कई बार डगमगाती है। तब डगमगाती है जब आसाराम के केस में गवाहों की हत्या हो जाती है फिर भी अदालत मौन रहती है, तब डगमगाती है जब व्यापम घोटाले में दर्जनों मौत होती हैं पर सुप्रीम कोर्ट के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती।
सलमान की गाड़ी से बर्बाद हुए लोगों की ज़िन्दगी को, उनके परिवारों को क्या सलमान के दोषरहित बरी हो जाने से राहत मिल गई है? क्या जिस बेचारे की मौत हुई है उसके परिवार को न्याय मिल पाया। इस बार के फैसले ने तो भ्रमित कर दिया कि मामला क्या था। कहीं गाड़ी खुद ही नशा करके फूटपाथ पे सोये लोगों को कुचल तो नहीं दी? बहुत हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण लगता है कि फैसले भी ख़रीदे जा सकते हैं बस एक बार वकील ढंग का मिल जाए।
लालू यादव जिन्हें सुप्रीम कोर्ट अपराधी मान चुका है, सज़ा दे चुका है वो बिहार में गठबंधन सरकार के विजय का जश्न मना रहे हैं । हद है जिसे जेल में होना चाहिए वो बिहार में सरकार बना रहा है…सज़ा पर क्या खूब तमाचा मारा है लालू ने। कुछ भी करो पर आज़ाद रहो इस सिस्टम से।
एक आम आदमी अगर समय से बैंक का लोन न चुका पाये तो उसके सम्पत्ति की नीलामी हो जाती है,जेल हो जाती है और दिवालिया घोषित कर दिया जाता है पर बड़े-बड़े उद्दोगपतियों को एक नोटिस तक नहीं भेजी जाती। ये अरबों का घोटाला करके निर्दोष रहते हैं और सरकार के गिरफ़्त से कोसों दूर भी। कैसी समता है इस देश में?
कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश में दो अलग-अलग कानून साथ चलते हैं। गरीबों के लिए अलग कानून और अमीरों के लिए अलग। मन व्यथित हो जाता है ऐसी परिस्थितियां देखकर। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक राष्ट्र तो बन गए पर संविधान के मूल उद्देश्यों को न समझ सके। मौलिक अधिकारों,राज्य के निति निर्देशक तत्वों, मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या ठीक ढंग से नहीं कर पाए। कहीं न कहीं हमारे विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका में दोष है तभी ऐसी स्थितियां जन्म ले रही हैं। यदि ये दोष दूर नहीं किये गए तो लोकतंत्र से भारतीय जनमानस का भरोसा उठेगा और हम संवैधानिक मूल्यों से दूर होते चले जायेंगे। एक बार फिर से संविधान को हमें समझना होगा, मंथन करना होगा शायद तभी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से अलोकतांत्रिक विसंगतियां दूर हो सकेंगी।

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