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मंदिर धनवान जनता निर्धन - सार्थक विमर्श !!

Posted On: 11 Jul, 2011 Others में

जागरण जंक्शन फोरमदेश-दुनियां को प्रभावित करने वाले ज्वलंत और समसामयिक मुद्दों पर जनता की राय को आवाज देता ब्लॉग

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केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर से मिले खजाने पर भारत सहित पूरी दुनियां में हलचल और गहमा गहमी का माहौल है. हालांकि मंदिर से अब तक मिला खजाना कितने मूल्‍य का है, अभी तक रहस्य ही बना हुआ है. मीडिया में तहखाने से मिली वस्तुओं की कीमत 1 लाख करोड़ रुपये से भी ज्‍यादा बताई जा रही है. लेकिन केरल के पूर्व मुख्‍य सचिव सीपी नायर के अनुसार, खजाना करीब पांच लाख करोड़ रुपये का हो सकता है. यह तो मंदिरों और धार्मिक संस्थानों में इकट्ठा हुए धन की एक बानगी भर है. यदि भारत के मशहूर मंदिरों में आने वाले चढ़ावे सहित संपत्ति के अन्य स्रोतों की जांच-पड़ताल की जाए तो शायद इतनी दौलत सामने आएगी कि भारत के कई वर्षों का वित्तीय बजट भी फीका पड़ जाएगा.


कुछ ऐसा ही हाल संतों-महंतों की कमाई का भी है. अभी हाल ही में श्री सत्य साईं की मृत्यु के पश्चात भी, उनकी संपत्ति की विरासत किसके हाथ में हो, इसे लेकर काफी बवाल मचा है. श्री श्री रविशंकर हों या आचार्य रजनीश, आशाराम बापू हों या मां अमृतानंदमयी, सभी को अकूत संपदा, उनके भक्तों से प्राप्त होती रही है. बाबा रामदेव जैसे योगाचार्य तक ने हजारों करोड़ की संपत्ति जमा कर रखी है, भले ही इसके पीछे उनके व्यापारिक कार्यों का योगदान रहा हो.


मंदिर में मिले खजाने पर किसका अधिकार हो? यह बड़ा सवाल बनता जा रहा है. मंदिर के तहखानों से अरबों रुपये का खजाना मिलने के बाद यह मुश्किल खड़ी हो गयी है कि इसका इस्तेमाल लोक कल्याण के लिए किया जाए या फिर यह संपत्ति मंदिर प्रशासन के पास रहे. कई वरिष्‍ठ नौकरशाहों, प्रख्‍यात इतिहासकारों और धार्मिक नेताओं का मानना है कि अब तक खोले गए मंदिर के तहखाने से मिले खजाने पर भगवान विष्‍णु का हक है और इस पर दूसरा कोई अपना दावा नहीं जता सकता है. यहां तक कि सरकार भी नहीं. जबकि कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि इस खजाने का इस्तेमाल लोगों की भलाई के काम में होना चाहिए.


उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्णयों के मुताबिक भी किसी मंदिर के देवता उस मंदिर से जुड़ी संपत्ति के मालिक होते हैं. अगर कोई व्यक्ति मंदिर से जुड़ी संपत्ति पर अपना दावा करता है तो वह इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ सकता है. ऐसे मामलों में अदालत में मंदिर के देवता का प्रतिनिधित्व मंदिर के ट्रस्ट का कोई सदस्य करता है.


कुछ विशेषज्ञ दलील देते हैं कि भारत जैसा देश, जिसकी अधिकांश आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है और जिसे दो जून की रोटी के लाले पड़े होते हैं, वहॉ मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं और धर्म से जुड़े संतों-महंतों के पास भारी मात्रा में धन-संपत्ति का जमा होना एक आश्चर्य का विषय होने के साथ-साथ अवसाद जनक भी है. ऐसी संपत्तियों का अधिकतर कोई उपयोग नहीं किया जाता और यदि उपयोग होता भी है तो उसकी मात्रा बहुत कम होती है. यानि एक प्रकार से ऐसा धन ‘निष्प्रयोज्य’ होता है और खजानों की शोभा बढ़ाने से ज्यादा उनका कोई अन्य इस्तेमाल नहीं. ऐसे बौद्धिकों का मानना है कि सरकार को ऐसे धन को अपने अधिकार में लेकर उसे जनहितार्थ व्यय करना चाहिए ताकि देश का दारिद्रय दूर हो सके.


वहीं दूसरी ओर तमाम लोगों का मानना है कि मंदिरों और धर्मार्थ ट्रस्टों से जुड़ी संपत्ति का मामला संवेदनशील होता है और इसमें सरकार को अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. ऐसे लोग कहते हैं कि धर्मार्थ संपत्तियों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि वे मूल रूप से लोगों की आस्था के प्रतीक हैं इसलिए उनका कोई और उपयोग सोचना भी ‘महापाप’ की श्रेणी में शामिल माना जाएगा.


उपरोक्त के आलोक में तमाम ऐसे प्रश्न जन्म लेते हैं, जिन पर राष्ट्रहित और जनहित में स्वस्थ बहस परमावश्यक है. ऐसे प्रश्नों में निम्नलिखित शामिल हैं यथा:


1. क्या मंदिर और धर्मार्थ संस्थाओं की संपत्ति का नियंत्रण सरकार को अपने हाथ में ले लेना चाहिए?

2. क्या ऐसी संपत्तियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करके उनका जनहित कार्यों में इस्तेमाल जायज होगा?

3. ऐसी संपत्ति का प्रबंधन उस संस्थान से जुड़े लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए?

4. भारत जैसे देश में, जहॉ आज भी 70 फीसदी आबादी अत्याधिक गरीबी में जीवन-यापन कर रही है, वहॉ किसी भी धार्मिक समुदाय के मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं के पास अकूत दौलत का निष्प्रयोज्य रूप से इकट्ठा होना कहॉ तक उचित माना जा सकता है?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से राष्ट्रहित और व्यापक जनहित के इसी मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है. इस बार का मुद्दा है:


मंदिर धनवान जनता निर्धनसार्थक विमर्श !!


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जारी कर सकते हैं.


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें. उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “मंदिर धनवान जनता निर्धन” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व मंदिर धनवान जनता निर्धन – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें.

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गयी है. आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं.


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


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