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सजा-ए-मौत कितना प्रासंगिक!

Posted On: 5 Sep, 2011 Others में

जागरण जंक्शन फोरमदेश-दुनियां को प्रभावित करने वाले ज्वलंत और समसामयिक मुद्दों पर जनता की राय को आवाज देता ब्लॉग

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मृत्यु दंड को जारी रखा जाए या इसे समाप्त कर उम्र कैद की सजा में बदल दिया जाए, यह भारत में बहुत ही विवाद और विचार-विमर्श वाला मुद्दा रहा है। हाल ही में ये मुद्दा एक बार फिर चर्चा में तब आ गया जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के आरोपियों मुरुगन, संतन और पेरारीवलन को 9 सितंबर को दी जाने वाली फांसी पर मद्रास उच्च न्यायालय ने 8 हफ्ते की अंतरिम रोक लगा दी। इसी बीच, तमिलनाडु विधानसभा ने आम सहमति से एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति से राजीव गांधी हत्याकांड में मृत्यु दंड का सामना कर रहे तीनों लोगों की पुनरीक्षण याचिका पर विचार करने की अपील भी की है।


मौत की सजा कानून के द्वारा दी जाने वाली सबसे बड़ी अंतिम सजा है लेकिन न्याय के मूल्य उद्देश्यों को देखें तो मृत्यु दंड के मामले में कई विसंगतियां हैं। सजा का मूल उद्देश्य अपराध निषेध, सामाजिक सुरक्षा तथा भय के साथ-साथ अपराधी का सुधार भी है किंतु मृत्यु दंड की स्थिति में अपराधी ही समाप्त हो जाता है तो सुधार की गुंजाइश कहां होगी?


अब तक लगभग सौ देशों ने इस मामले में गंभीर विचार कर संगीन अपराध के दोषी को आजीवन कारावास की सजा को बनाए रखा है लेकिन मौत की सजा खत्म कर दी है। ब्रिटेन की संसद ने भी मृत्यु दंड को अनुचित मानते हुए वर्ष 1998 से फांसी की सजा पर रोक लगाई है। उल्लेखनीय है कि भारतीय दंड संहिता, ब्रिटिश कानून के अनुसार बनाई गई है, अतएव तर्क यह है कि जब वहां फांसी की सजा पर रोक लगा दी गई है तो भारत में भी इस सजा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।


हालांकि कई विचारकों ने इस सजा का भरपूर समर्थन किया है, लेकिन कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे खत्म करने के लिए लगातार अभियान चलाते रहे हैं। जे.एस. मिल मृत्यु दंड के बडे़ समर्थक थे। उनका मानना था कि इसके बिना समाज में अराजकता फैल जाएगी। एक अमेरिकी न्यायाधीश के अनुसार, फांसी की सजा खत्म करने का अर्थ हत्यारे को एक तरह की गारंटी देना होगा कि वह चाहे जितनी भी हत्याएं करे या जैसे भी अपराध करे, उसकी जिंदगी सुरक्षित रहेगी।


हालांकि भारत में फांसी की सजा ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मामलों में ही दी जाती है। लेकिन जब भी मृत्यु दंड की बात सामने आती है तो विवाद होना स्वाभाविक है। यह विवाद तब ज्यादा उठता है, जब उसके साथ कोई राजनीतिक पहलू भी जुड़ा हो। ऐसे में, भारत में मौत की सजा बनाई रखी जाए या समाप्त कर दी जाए, यह एक जटिल मुद्दा बन जाता है। इस बहस में कई सवाल उठते हैं, जैसे कि-


1. क्या भारत में मृत्यु दंड को समाप्त कर देना सही होगा?

2. मृत्यु दंड खत्म करने से आपराधिक मनोवृत्ति के लोग निर्भय तो नहीं हो जाएंगे?

3. क्या मृत्यु दंड मानवता के विरुद्ध है?

4. यदि मृत्यु दंड समाप्त कर दिया जाए तो अपराध पर कैसे नियंत्रण होगा?


जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से इस बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है। इस बार का मुद्दा है:


सजा-ए-मौत कितना प्रासंगिक!


आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जाहिर कर सकते हैं।


नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें। उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “सजा-ए-मौत की प्रासंगिकता” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व सजा-ए-मौत की प्रासंगिकता – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें।

2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गई है। आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं।


धन्यवाद

जागरण जंक्शन परिवार


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